ताज़ा खबर
 

राजपाट: बदले रंग और ढंग

भाजपा के भीतर अब मुख्यमंत्री पद की वसुंधरा इकलौती दावेदार नहीं हैं। सूबेदार सतीश पूनिया और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के अलावा अर्जुन राम मेघवाल भी दलित के नाते मुख्यमंत्री पद का ख्वाब देख रहे हैं।

Rajpaatवसुंधरा राजे, बीएस येदियुरप्पा और के कामराज।

राजस्थान में भाजपा के भीतर गुटबाजी और छत्रपों की आपसी कलह स्तर पर है। सत्ता की भूख से व्याकुल नेता कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार से लड़ने के बजाए आपस में ही उलझे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री वसुुंधरा राजे को दरकिनार करने की कोशिशें कर रहा है उनका विरोधी गुट। ताजा विवाद गहलोत सरकार के एक मंत्री परसादी लाल मीणा के दौसा में दिए एक बयान से उभरा है। उन्होंने फरमाया कि राजस्थान में वसुंधरा के बिना भाजपा उसी तरह शून्य है जिस तरह अशोक गहलोत के बिना कांग्रेस।

भाजपा वसुंधरा की अनदेखी करेगी तो अपना ही नुकसान करेगी। इससे भाजपा खेमे से प्रतिक्रिया होती ही। हालांकि पहल भाजपा की तरफ से ही हुई थी जिन्होंने 2018 के चुनाव से पहले कांग्रेस को मजबूत करने वाले पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट का मान सम्मान नहीं करने की बात कही थी। कांग्रेस के मंत्री का पलटवार भाजपाई सह न पाए।

भाजपा के भीतर अब मुख्यमंत्री पद की वसुंधरा इकलौती दावेदार नहीं हैं। सूबेदार सतीश पूनिया और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के अलावा अर्जुन राम मेघवाल भी दलित के नाते मुख्यमंत्री पद का ख्वाब देख रहे हैं। यह महत्वाकांक्षा तो तब है जबकि ज्यादातर फैसले दिल्ली से आलाकमान कर रहा है। सतीश पूनिया के समर्थक तो व्हाटसऐप पर ग्रुप बनाकर उनके पक्ष में मुहिम चला रहे हैं। हालांकि पूनिया ऐसे प्रयासों से अपना कोई लेना-देना न होने की बात कह चुके हैं। वसुंधरा राजे चुपचाप देख रहीं हैं कि आलाकमान की शह पर विरोधी खेमा लगातार ताकतवर हुआ है।

पार्टी के पोस्टरों तक पर अब उनका नाम नहीं होता। पिछले महीने सतीश पूनिया ने घनश्याम तिवारी की भी पार्टी में वापसी करा दी। जो वसुंधरा के मुख्यमंत्री रहते भी उनके धुर विरोधी थे। विधायक मदन दिलावर और सांसद दिया कुमारी को पूनिया के साथ संगठन में महासचिव का पद मिलना भी वसुंधरा को चिढ़ाने की कवायद है। हालांकि अभी भी सूबे में सबसे ज्यादा लोकप्रिय भाजपा नेता वसुंधरा ही मानी जाती हैं।

छह बार से लगातार विधायक प्रताप सिंह सिंघवी का यही दावा है। जो मानते हैं कि चुनाव में वसुंधरा ही जीत दिला सकती हैं। अतीत में राजस्थान भाजपा में या तो भैरो सिंह शेखावत का एकछत्र दबदबा रहा या फिर वसुंधरा का। पर अब आलाकमान फैसले अपनी मर्जी से ले रहा है। तभी सूबेदार पूनिया दावा कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री पद का चेहरा अगले चुनाव में कौन होगा, यह पार्टी का संसदीय बोर्ड तय करेगा।

जूतों में दाल
उत्तराखंड में सत्ता का ख्वाब देख रहे कांग्रेसी गुटबाजी में मशगूल हैं। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश और पार्टी के सूबेदार प्रीतम सिंह दोनों को ही पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत फूटी आंखों नहीं सुहाते। पार्टी के जो कार्यक्रम प्रीतम सिंह जारी करते हैं, रावत उनमें शिरकत नहीं करते। अलबत्ता अपने समर्थकों के साथ अपने अलग कार्यक्रम करते हैं। जिनमें हृदयेश और प्रीतम सिंह व उनके समर्थक नहीं पहुंचते।

पार्टी के प्रभारी देवेंद्र यादव के सामने भी गुटबाजी छिप न सकी। वे दो दिन के दौरे पर आए थे। इंदिरा हृदयेश के क्षेत्र हल्द्वानी में रावत समर्थकों ने यादव की मौजूदगी में ही जमकर हंगामा किया। देहरादून में पार्टी की सभा हुई तो उसमें भी हरीश रावत गैर हाजिर रहे। किसी भी बैनर-पोस्टर पर अपना नाम और तस्वीर न देख हरीश रावत तमतमाए हुए थे। यादव ने भी उनकी अनदेखी की। यादव के वापस जाते ही हरीश रावत ने आलाकमान से मांग कर डाली कि मुख्यमंत्री का चेहरा विधानसभा चुनाव से पहले ही घोषित करे पार्टी। उनके समर्थकों ने तो इसके लिए उन्हीं का नाम भी सुझा दिया।

इससे खफा इंदिरा हृदयेश ने याद दिलाया कि पिछले चुनाव में रावत को ही मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया था। सत्ता तो गंवाई ही, दो सीटों से लड़कर भी रावत सदन में नहीं पहुंच पाए। पार्टी 70 में से 11 सीटों पर सिमट गई। विरोधी खेमा रावत पर गुटबाजी कर परोक्ष रूप से भाजपा के हाथों में खेलने का आरोप लगा रहा है।

कुनबे का असंतोष
सत्रह महीने के इंतजार के बाद मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार तो जरूर कर लिया पर उससे विधायकों में असंतोष घटने के बजाए और बढ़ गया लग रहा है। यतनाल उपनाम से चर्चित बीजापुर शहर के विधायक बीआर पाटिल तो मुख्यमंत्री के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। केंद्र में मंत्री रह चुके हैं वे पर अब येदियुरप्पा राज्य में भी मंत्री बनाने को तैयार नहीं।

पाटिल ने येदियुरप्पा पर प्रधानमंत्री की सराहना के बहाने फिर हमला बोल दिया। फरमाया कि प्रधानमंत्री का सपना है विकास। वंशवाद की राजनीति का खात्मा और भ्रष्टचार मुक्त सरकार। फिर उन्होंने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से गुहार लगाई कि भाजपा में एक परिवार के एक सदस्य को ही राजनीति में पद मिले। उन्होंने 75 की उम्र पार कर चुके लोगों को पद न देने की नीति को भी सराहा।

येदियुरप्पा पर इन दिनों वंशवाद के आरोप भाजपा वाले ही लगा रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री हैं तो एक बेटा सांसद। दूसरा बेटा प्रदेश भाजपा का उपाध्यक्ष बना है। भाजपा आलाकमान येदियुरप्पा से मुक्ति तो चाहते हैं पर उनकी पुख्ता सियासी जमीन को देख उन्हें छेड़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहे।

राजनीति में ‘किंग मेकर’ की अवधारणा
आजादी के बाद भारतीय राजनीति में ‘किंग मेकर’ की अवधारणा की बात की जाए तो सबसे पहला नाम के कामराज का ही आता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में जनकल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत करने वाले कामराज ने कांग्रेस की छवि सुधारने की जो योजना बनाई उसके तहत बड़े नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने अपने पद को छोड़ पार्टी के लिए काम किया। इसे ‘कामराज प्लान’ के रूप में जाना जाता है।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

Next Stories
1 राजपाट: शह और मात
2 राजपाटः सियासी दांवपेच
3 राजपाट: खौफ किसानों का
ये पढ़ा क्या?
X