ताज़ा खबर
 

राजपाट: बिहार चुनाव और उत्तराखंड की राजनीति

बादल परिवार भाजपा से नाता नहीं तोड़ना चाहता था पर सूबे के किसानों की नाराजगी को देख हरसिमरत कौर ने इस्तीफा दिया। वे प्रधानमंत्री से मिलकर विधेयकों को प्रवर समिति में भिजवाना चाहती थी। लेकिन संसद में होते हुए भी प्रधानमंत्री उनसे नहीं मिले।

राजपाटबिहार विधानसभा चुनाव में एलजेपी नेता चिराग पासवान के जदयू के खिलाफ बयान से संकट खड़ा हो सकता है। वहीं उत्तराखंड में सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के सहयोगी ही उनका विरोध करने लगे हैं।

सियासी दांवपेच
बिहार चुनाव के लिए सियासी दल तैयारी में जुटे हैं। पर अभी यही तय नहीं हो पा रहा कि कौन किसके साथ रहेगा और किसे बंटवारे में कितनी सीटें मिलेंगी। ज्यादा कयास चिराग पासवान की भूमिका को लेकर लग रहे हैं। जिन्हें घोषित तौर पर तो भाजपा के साथ माना जा रहा है पर नीतीश सरकार की आलोचना करने से कोई भाजपाई नहीं रोक रहा उन्हें। चिराग अपने पिता रामविलास पासवान के गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के कारण भी मानसिक रूप से तनाव में हैं। उधर जद (एकी) की रणनीति भाजपा से ज्यादा सीटें लेने की है तो चिराग भी सौदेबाजी कर ही रहे हैं। लोकसभा में अपनी छह सीटों के अनुपात में वे कम से कम छत्तीस सीटों की मांग कर रहे हैं। भाजपा की तरफ से पच्चीस से ज्यादा सीटें नहीं दे पाने की मजबूरी भूपेंद्र यादव उन्हें बता चुके हैं।

पार्टी की बैठक में चिराग 143 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की हेकड़ी जता रहे थे। अकेले लड़कर रामविलास पासवान ने 2005 में जिस तरह 29 सीटें जीती थी और दलित-मुसलमान-भूमिहार का वोट बैंक बनाया था, चिराग को भी उसी राह पर चलने की सलाह देने वाले भी कम नहीं। जो भी हो तस्वीर अगले एक हफ्ते में और साफ होनी चाहिए। पर पासवान के लिए मायावती और चंद्रशेखर आजाद भी मुश्किल पैदा करना चाहेंगे।

बिहार में न बसपा का कोई जनाधार है और न भीम आर्मी का। उधर एमआईएम के ओवैशी ने भी बिहार में ताल ठोकने का ऐलान कर रखा है। किशनगंज लोकसभा सीट के उपचुनाव में उनके उम्मीदवार की जीत से सारे सियासी पंडित चकित रह गए थे। राजद-कांग्रेस-वामपंथी महागठबंधन हालांकि उन्हें राजग द्वारा प्रायोजित और वोट कटवा पार्टी से ज्यादा कुछ मानने को तैयार नहीं। भूमिका सीमित ही सही पर रालोसपा (उपेंद्र कुशवाहा), हम (माझी), जाप (पप्पू यादव) व विकासशील इंसान पार्टी (मुकेश सहनी) की भी कुछ तो रहेगी ही।

खतरे की घंटी
सहयोगी दलों के भीतर अब भाजपा को लेकर राजग में डर का माहौल है। महाराष्ट्र में जब शिव सेना से पार्टी का गठबंधन टूटा था तो हर कोई हैरान हुआ था। वाजपेयी जी ने जब 1996 में सबसे बड़े दल के नेता के नाते बहुमत के बिना ही प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो शिव सेना के अलावा उसका सबसे भरोसेमंद सहयोगी शिरोमणी अकाली दल ही था। कृषि संबंधी विधेयकों के विरोध में हरसिमरत कौर ने मोदी मंत्रिमंडल से जब इस्तीफे का एलान किया तभी साफ हो गया था कि भाजपा की तरफ से अकाली दल की मनुहार की कोई कोशिश नहीं होगी। मानो भाजपा तो अपने इस सबसे पुराने सहयोगी दल से पीछा छुड़ाने की फिराक में ही थी। अकाली दल से नाता तोड़ने की मांग पंजाब के भाजपा नेता पहले से ही कर रहे थे।

नवजोत सिंह सिद्धू ने तो बगावत ही अकाली दल के साथ पार्टी के गठबंधन से नाराज होकर की थी। पर तब भाजपा में अरुण जेटली का भी प्रभाव था। बादल परिवार से जेटली की निकटता जगजाहिर थी। बादल के कहने पर ही जेटली ने जीवन का पहला लोकसभा चुनाव दिल्ली छोड़ अमृतसर से 2014 में लड़ा था और कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह से हार गए थे। जेटली के बाद पार्टी में एक तो अकाली दल की महत्ता वैसे ही कम हो गई थी ऊपर से 2017 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को करारी हार का मुंह देखना पड़ा।

बादल परिवार भाजपा से नाता नहीं तोड़ना चाहता था पर सूबे के किसानों की नाराजगी को देख हरसिमरत कौर ने इस्तीफा दिया। वे प्रधानमंत्री से मिलकर विधेयकों को प्रवर समिति में भिजवाना चाहती थी। लेकिन संसद में होते हुए भी प्रधानमंत्री उनसे नहीं मिले। सहयोगियों ने जेपी नड्डा से मिलने की सलाह दी। नड्डा से ही मिलना पड़ा हरसिमरत कौर को। जिन्होंने दो टूक कह दिया कि इस्तीफा दिया तो स्वीकार होने में देर नहीं लगेगी और हुआ भी ऐसा ही। अकाली दल अब दुविधा में है। सुखदेव सिंह ढींढसा की बगावत का घाव अभी ताजा था कि भाजपा से रिश्तों की तल्खी ने और बढ़ा दिया दर्द।

खिल गए गुल
उत्तराखंड विधानसभा के सत्र को कोरोना के भय ने एक दिन तक ही सीमित कर दिया। पर उसी दिन गुल खूब खिले। कांग्रेसी विधायकों से ज्यादा सरकार की लानत मलानत भाजपा के ही विधायक कर बैठे। पूरनचंद फर्त्याल ने तो अपनी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ही रख दिया। भाजपा के ही राजेश शुक्ला ने अवमानना प्रस्ताव तो एक आइएएस अफसर के खिलाफ रखा पर खरी खोटी अपने मंत्री मदन कौशिक को सुनाई। फरमाया कि नैनीताल की बैठक में अफसर ने उनकी तौहीन की पर कौशिक कान में तेल डाले सब अनसुना करते रहे।

विधायक ही क्यों नौकरशाही के प्रति गुस्सा तो महिला कल्याण राज्यमंत्री रेखा आर्य ने भी कम नहीं निकाला। अपने ही विभाग के एक अफसर के खिलाफ पुलिस में गुमशुदगी की शिकायत कर दी। लेकिन नौकरशाही को ही अपने आंख कान मान सरकार चला रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत पर अपने विधायकों के गिले शिकवों का कोई असर नहीं दिखा। सत्र में कांग्रेस की इंदिरा हृदयेश और करण मेहरा संक्रमित होने के चलते गैर हाजिर थे। नतीजतन नेता और उपनेता दोनों की गैर मौजूदगी ने कांग्रेस के विधायकों को भी वाचाल बना दिया। भाजपा विधायकों की सनातन पीड़ा अफसरों द्वारा भाव नहीं दिया जाना है। रही रेखा आर्य की बात तो भाजपाई ही उन पर आरोप लगा रहे हैं कि चहेतों को टेंडर नहीं देने के कारण वे अपने महकमे के ईमानदार अफसर के पीछे पड़ी हैं। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजपाट: नेता और सत्ता
2 राजपाट: राजनीति और धर्म
3 राजपाट: नई मुसीबत
ये पढ़ा क्या?
X