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राजपाट: सियासी उधेड़बुन

केंद्र सरकार का यह महज भ्रम है कि किसान आंदोलन केवल पंजाब और हरियाणा तक ही सीमित है। दिल्ली से सटे यूपी और राजस्थान जैसे राज्यों तक भी दिख रहा है शुरू से ही इसका प्रभाव। अब तो उत्तराखंड में भी सुनाई पड़ रहा है किसानों के असंतोष का स्वर।

RAJPAATबिहार के सीएम नीतीश कुमार और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ।

नीतीश कुमार की सियासी उधेड़बुन अचानक बढ़ गई है। नाराजगी में अलग हो गए अपने पुराने साथियों की वापसी के इच्छुक दिख रहे हैं। भाजपा के संख्या बल ने मनोबल गिराया था। दबाव में सरकार चलाने की धारणा आम हुई तो चौकन्ने हो गए। बसपा के इकलौते विधायक को तो पार्टी में ले ही लिया, निर्दलियों को भी पटा लिया हैै। और तो और अब उपेंद्र कुशवाहा को भी गले लगाने को तैयार दिख रहे हैं। कुशवाहा ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश का साथ छोड़ा था।

जद (एकी) के साथ-साथ नीतीश के रहमो करम से पाई राज्यसभा की सीट छोड़ने में भी देर नहीं लगाई थी। अपनी अलग पार्टी रालोसपा बनाने का फायदा भी मिला था। मोदी-प्रथम के दौरान केंद्र सरकार में मंत्री पद पा गए थे। तब नीतीश का राजद से गठबंधन था। लेकिन जैसे ही नीतीश ने 2017 में राजद को छोड़ फिर भाजपा से गठबंधन किया तो कुशवाहा की राजग में हैसियत घट गई। नतीजतन राजग छोड़ 2019 के लोकसभा चुनाव में तेजस्वी यादव के साथ चले गए। एक भी उम्मीदवार नहीं जीत पाया। सियासी वनवास से उकताकर वापस नीतीश की शरण में आना पड़ा।

नीतीश भी अपने जनाधार में कुशवाहा बिरादरी को जोड़ने के इच्छुक हैं। तभी तो चर्चा है कि कुशवाहा को मंत्रिपद मिल सकता है। चिराग पासवान के इकलौते विधायक पर भी आजकल नीतीश का जादू छाया है। इतना ही नहीं ओवैसी के विधायकों को भी तोड़ने की रणनीति बनाई है। और तो और अब तो तेजस्वी यादव के विधायकों पर भी डोरे डाल रहे हैं। अपनी स्थिति मजबूत होगी तभी तो भाजपा नेतृत्व से आंख में आंख डालकर बात कर पाएंगे। मंत्रिमंडल के विस्तार से लेकर विधान परिषद में सदस्यों की नामजदगी जैसे हर मामले में बराबर की हिस्सेदारी यों ही तो नहीं देगी भाजपा।

असंतोष का ज्वालामुखी
केंद्र सरकार का यह महज भ्रम है कि किसान आंदोलन केवल पंजाब और हरियाणा तक ही सीमित है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों तक भी दिख रहा है शुरू से ही इसका प्रभाव। अब तो उत्तराखंड में भी सुनाई पड़ रहा है किसानों के असंतोष का स्वर। बेशक पर्वतीय क्षेत्र अभी अछूते हैं पर मैदानी जिलों हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में यह आंदोलन अच्छी तरह पांव पसार चुका है। भारतीय किसान यूनियन के मुखिया और राकेश टिकैत के बड़े भाई नरेश टिकैत ने हरिद्वार जिले के मंगलौर कस्बे में गुरुवार को रैली की थी। उसमें आई भीड़ देख नरेश इस कदर उत्साहित हो गए कि एलान कर दिया कि किसानों की जमीन हरगिज नहीं बिकने देंगे।

इतना ही नहीं यह अल्टीमेटम भी दे दिया कि विवादास्पद कृषि कानून जब सरकार वापस ले लेगी तभी किसान अपने घरों को वापस जाएंगे। ऊधमसिंह नगर जिले में तो यों भी बहुतायत सिख किसानों की है। हरिद्वार के ग्रामीण इलाकों में किसान आंदोलन ने सांप्रदायिक विभाजन की रेखा को भी हल्का किया है। आंदोलन केवल जाट किसानों का नहीं है। गुर्जर, दलित और मुसलमान भी इसमें खुलकर शिरकत कर रहे हैं। असंतोष का ज्वालामुखी शांत न हुआ तो 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान हो सकता है। यही वजह है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भरपाई के बारे में अभी से सोच रहे हैं। वे सूबे के पर्वतीय इलाकों के दौरे पर हैं। पर्वतीय जिलों के विकास प्राधिकरण को समाप्त करने का एलान किया तो मैदानी जिलों में इसका विरोध नजर आया।

मैदानी इलाकों के नेताओं ने सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाया तो मुख्यमंत्री ने फैसले को बट्टे खाते में डाल दिया। कांग्रेस की तरह भाजपा भी सूबे में कुमाऊंनी और गढ़वाली के झगड़े में अलग उलझी है। कांग्रेस में चुनाव नजदीक देख हरीश रावत ने अपनी सक्रियता बढ़ाई है। मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने का मंसूबा लेकर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भी सभी सत्तर विधानसभा सीटों पर यात्रा शुरू कर दी है।

कशमकश में योगी
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने मंत्रिमंडल का विस्तार अब ज्यादा नहीं लटका पाएंगे। वहां अगले साल फरवरी में विधानसभा चुनाव हो जाएगा। इस नाते सरकार को चुनावी नजरिये से चाक चौबंद करना चाहेंगे। वाराणसी के सांसद होने के नाते अब प्रधानमंत्री भी सियासी नजरिये से तो उत्तर प्रदेश के ही हो गए हैं। दूसरे सूबों से कहीं ज्यादा प्रतिष्ठा उनकी उत्तर प्रदेश से जुड़ चुकी है। अपने पूर्व सचिव एके शर्मा को उन्होंने आईएएस से इस्तीफा दिला उत्तर प्रदेश विधान परिषद में निर्वाचित किसी रणनीति के तहत ही कराया है।

चर्चा गरम है कि योगी अपने मंत्रिमंडल में आधा दर्जन नए मंत्री शामिल कर सकते हैं। पर लगता है कि उन्हें अभी तक आलाकमान से हरी झंडी नहीं मिल पाई है। विस्तार के दौरान योगी खराब कामकाज वाले अपने कुछ मंत्रियों को हटा भी सकते हैं। मिशन 2022 के मद्देनजर योगी को जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों की चिंता भी करनी होगी। और अब तो किसान आंदोलन की भी चुनौती है। मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार की अटकलों के बीच मंत्री पद के दावेदार भाजपा विधायकों ने भी अपनी लाबिंग तेज कर दी है। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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