ताज़ा खबर
 

राजपाट: खौफ गंवाने का

नीतीश कुमार इस बार भाजपा के अहसान तले ऐसे दब गए हैं कि पत्रकारों के तीखे सवालों पर संयत रहकर जवाब देने के अपने स्वभाव को छोड़ आग बबूला होने लगे हैं।

Rajpaatबिहार के सीएम नीतीश कुमार और बीजेपी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया।

नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री तो जरूर बन गए पर अपनी इस पारी में वे पहले की तरह सहज नहीं दिख रहे। यों पहली बार वे 2005 में मुख्यमंत्री बने थे। पर इस बार भाजपा के अहसान तले ऐसे दब गए हैं कि पत्रकारों के तीखे सवालों पर संयत रहकर जवाब देने के अपने स्वभाव को छोड़ आग बबूला होने लगे हैं। दिखावा तो ऐसा करते हैं जैसे मुख्यमंत्री पद स्वीकार कर उन्होंने भाजपा पर अहसान किया है। पर दबाव से मुक्त नहीं हो पा रहे।

राजद के साथ गठबंधन सरकार के वक्त भी इतने असहज तो नहीं दिखते थे। कर्पूरी ठाकुर के जन्मदिन के अवसर पर पटना में अपनी पार्टी के दफ्तर में आयोजित कार्यक्रम में तो साफ बोल दिया कि उन्हें भी कर्पूरी ठाकुर की तरह ही वक्त से पहले पद छोड़ने को मजबूर किया जा सकता है। कारण भी बता दिया कि वे समाज के सभी वर्गों के हित में जो सोचते हैं। कर्पूरी ठाकुर अति पिछड़ी नाई जाति में जन्मे थे। वे खांटी समाजवादी थे। नीतीश भी खुद को उन्हीं का शिष्य मानते हैं। कर्पूरी ठाकुर पहली बार 22 दिसंबर 1970 को बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। पर छह महीने के भीतर ही उन्हें हटना पड़ा था।

दोबारा जनता पार्टी की सरकार बनने पर 1977 में मिली थी उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी। लेकिन इस बार भी वे दो साल पूरे नहीं कर पाए थे। नीतीश ने उनके जन्मदिन पर खुद के इस बार के मुख्यमंत्री काल को उनके दूसरे मुख्यमंत्री काल से जोड़ा। याद दिलाया कि कर्पूरी ठाकुर का जन्मदिन वे हर साल मनाते हैं। तब से जब वे पहली बार विधायक बने थे। उनके विचारों को लागू करने की पुरजोर कोशिश करते हैं। अच्छा होता कि नीतीश उन ताकतों का जिक्र भी कर देते जो उन्हें कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद से हटा देंगी। राजद के साथ तो साझा सरकार चला नहीं रहे हैं। भाजपा है उनकी साझेदार। जांची, परखी और खरी। ज्यादा सीटें जीतकर भी जिसने मुख्यमंत्री पद पर नीतीश को बिठाने का अपना चुनावी वादा निभा दिया। तो क्या भाजपा से ही डरे हैं इस बार सुशासन बाबू।

कांग्रेस का हिंदू प्रेम
कांग्रेसी दिग्गज हरीश रावत ने कुंभ के बहाने केंद्र और उत्तराखंड दोनों भाजपा सरकारों पर हमला बोला है। कोरोना संक्रमण के कारण सूबे की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने कुंभ की पारंपरिक चार महीने की अवधि को घटाकर दो महीने कर दिया है। हरीश रावत बुधवार को हर की पौड़ी पर जा धमके। गंगा में पहले तो डुबकी लगाई और फिर मोदी-योगी सरकारों की बुद्धि-शुद्धि के लिए किया गंगा पूजन। पंडों को प्रणाम भी किया और दक्षिणा भी दी।

उसके बाद हरिद्वार के साधुओं के अखाड़ों में जा पहुंचे मत्था टेकने। साधु संन्यासियों से कुंभ की बाबत चर्चा की। हालांकि कुछ अखाड़ों ने हरीश रावत से दूरी भी बनाई। मसलन जूना पंचायती अखाड़ा, अग्नि पंचायती अखाड़ा और आवाहन अखाड़ा आदि। तो भी हरीश रावत ने माया देवी मंदिर में मत्था टेका तो पुजारियों ने चुनरी ओढ़ाकर उनका स्वागत किया। स्वागत तो निरंजनी अखाड़े में महंत रविंद्रपुरी ने भी जरूर किया पर कुंभ के काम कायदे से नहीं होने के हरीश रावत के आरोप को नहीं स्वीकारा।

हरीश रावत ने अपनी दलीलें रखी कि बिहार में चुनाव हो सकता है और पश्चिम बंगाल में चुनाव की तैयारी तो हिंदुओं के कुंभ के आयोजन में ही केंद्र सरकार ने अवधि घटाने के लिए कोरोना को क्यों बहाना बनाया। इस दौरे में न कांग्रेस के सूबेदार प्रीतम सिंह साथ थे और न नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश। अपनी बेटी अनुपमा रावत को साथ लाए थे हरीश रावत। चर्चा तो यही है कि अनुपमा हरिद्वार से विधानसभा चुनाव लड़ने के सपने देख रही हैं।

उनके इस दौरे पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी चुप नहीं रहे। हरीश रावत पर हरिद्वार का माहौल खराब करने का आरोप जड़ दिया। यहां तक कह डाला कि कुछ लोग हरिद्वार को चीन का शहर वुहान (कोरोना का केंद्र) बनाना चाहते हैं। पर सरकार ऐसा नहीं होने देगी। कांग्रेस को धार्मिक पर्व कुंभ पर राजनीति न करने की नसीहत भी देना नहीं भूले वे।

रहस्य बरकरार
ज्योतिरादित्य सिंधिया आखिर कब तक सब्र करेंगे? उन्हें भाजपा में आए दस महीने बीत चुके हैं। कोरोना उनके सियासी मुकाम में बाधा बना है। पहले तो राज्य सभा का चुनाव देर से हुआ। अब मंत्रिमंडल का विस्तार लटका है। अभी मात्र 53 है मंत्रिपरिषद की संख्या। सिंधिया मंत्रिपद की आस वाले इकलौते नेता नहीं हैं। उम्मीद तो सुशील मोदी को भी जरूर होगी। जिन्हें पार्टी ने बिहार से हटाकर केंद्र की सियासत में ले लिया। असम से हिमंत बिस्वा शर्मा भी केंद्र में मंत्री बनने का सपना देख रहे हैं।

रामविलास पासवान की जगह उनके पुत्र चिराग पासवान ने भी मंत्रिपद की आस नहीं छोड़ी है। पर अब तो बजट सत्र शुरू हो चुका है। जाहिर है कि विस्तार होगा तो सत्र के मध्यांतर के दौरान या सत्र समाप्ति के बाद। बिहार में जद (एकी) के साथ गठबंधन सरकार है। ऐसे में नीतीश कुमार केंद्रीय मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी की पेशकश को स्वीकार कर सकते हैं। मई 2019 में प्रधानमंत्री पद की अपनी दूसरी पारी शुरू करने के बाद से अभी तक प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल का एक बार भी विस्तार नहीं किया है। (प्रस्तुति: अनिल बंसल)

Next Stories
1 राजपाट: बदले रंग और ढंग
2 राजपाट: शह और मात
3 राजपाटः सियासी दांवपेच
ये पढ़ा क्या?
X