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राजपाटः गुटबाजी का अंजाम

पाठकों को बता दें कि नरेंद्र मोदी जब भाजपा के राष्ट्रीय सचिव थे तो वे हिमाचल और हरियाणा के प्रभारी थे। हिमाचल की स्थानीय राजनीति को वे गहराई तक समझते हैं। शांता कुमार की जगह प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री बनवाने में भी उनकी अहम भूमिका थी।

Author Published on: May 30, 2020 3:21 AM
राजीव बिंदल के इस्तीफे ने हिमाचल प्रदेश भाजपा के अंदरूनी घमासान और गुटबाजी को सतह पर ला दिया है।

राजीव बिंदल के इस्तीफे ने हिमाचल प्रदेश भाजपा के अंदरूनी घमासान और गुटबाजी को सतह पर ला दिया है। राजीव बिंदल ने एलान किया है कि प्रदेश भाजपा की सूबेदारी उन्होंने उच्च नैतिक मूल्यों के लिए छोड़ी है। अन्यथा भाजपा का स्वास्थ्य घोटाले से दूर तक भी लेना-देना नहीं है। पार्टी का दामन पूरी तरह पाक साफ है। इस भ्रष्टाचार में भाजपा को लपेटना सरासर अन्याय है। हैरानी की बात तो यह है कि कांग्रेस के किसी भी नेता ने राजीव बिंदल पर प्रत्यक्ष आरोप नहीं लगाया। बस यह सवाल जरूर पूछा कि पांच लाख रुपए के रिश्वत घोटाले के आरोपी डाक्टर अजय गुप्ता से उनका क्या रिश्ता है? पर सच सिर्फ वह नहीं है जो दिख रहा है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि इस घोटाले की शिकायत प्रधानमंत्री तक भी पहुंची थी। प्रधानमंत्री दफ्तर के हस्तक्षेप के बाद ही बिंदल ने इस्तीफा दिया। खुद नहीं बल्कि मांगने पर। तभी तो राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने इस्तीफा स्वीकार करने में देर भी नहीं लगाई। कहने को तो सोलन की स्थानीय राजनीति में बिंदल के विरोधी महेंद्रनाथ सोफत द्वारा मामले को तूल दिए जाने की बात कही जा रही है। पर इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि खुद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी अपने पार्टी अध्यक्ष से खुश नहीं थे। दोनों के रिश्ते मधुर होते तो ठाकुर उन्हें अपना विधानसभा अध्यक्ष न बनाते। मंत्री पद देते। बिंदल खुद मंत्री ही बनना चाहते थे। अपनी इच्छा उन्होंने नड्डा को भी बताई थी। पर नड्डा ने जयराम ठाकुर पर दबाव डालने के बजाए इस साल जनवरी में बिंदल को पार्टी का अध्यक्ष बनाकर उनका कद बढ़ा दिया था। बिंदल पहले प्रेम कुमार धूमल के खास थे। उनकी सरकार में मंत्री भी रहे। आजकल जेपी नड्डा से निकटता बढ़ा ली थी। दरअसल जयराम ठाकुर को जब 2017 में मुख्यमंत्री बनाया गया तब दौड़ में खुद नड्डा भी थे। पाठकों को बता दें कि नरेंद्र मोदी जब भाजपा के राष्ट्रीय सचिव थे तो वे हिमाचल और हरियाणा के प्रभारी थे। हिमाचल की स्थानीय राजनीति को वे गहराई तक समझते हैं। शांता कुमार की जगह प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री बनवाने में भी उनकी अहम भूमिका थी। जिससे शांता कुमार खेमा नाराज भी हुआ था। महेंद्र नाथ सोफत और माहेश्वर सिंह भी शांता खेमे में ही थे। सोफत और बिंदल दोनों सोलन के हैं, लिहाजा आपस में शुरू से लगती है।
डाक्टर अजय गुप्ता की घूस की आडियो सामने आने के बाद भाजपा सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा था। स्वास्थ्य महकमे के निदेशक पद से पहले तो गुप्ता को निलंबित किया गया। फिर उनकी गिरफ्तारी हुई। विपक्ष का तो यहां तक आरोप है कि अजय गुप्ता को राजीव बिंदल का वरदहस्त था। लिहाजा उन्हें सेवा विस्तार दिलाने की कोशिशें भी चल रही थी। राजीव बिंदल पूर्व में सूबे के स्वास्थ्य मंत्री भी रह चुके हैं। अतीत में भी उन पर भ्रष्टाचार के आरोप कई बार लग चुके हैं। पर इस बार मामला कोरोना महामारी से बचाव के लिए पीपीई किट्स की खरीद से जुड़ा था, सो भाजपा आलाकमान ने राजीव बिंदल की छुट्टी करने में पल भर की देर नहीं लगाई।

सियासी प्रकोप
कोरोना के कहर से कोई नहीं बच पाया धरती पर। जान माल की कितनी हानि हुई, पुख्ता लेखा-जोखा कभी नहीं आ पाएगा सामने। पर राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस के कुछ नेता तो कोरोना को पानी पी-पीकर कोस रहे हैं। जिन्हें अपने पुनर्वास की आस थी वे कुछ ज्यादा ही हताश और निराश दिख रहे हैं। विधानसभा के बजट सत्र के समापन का इंतजार था सबको। विधायकों को मंत्री पद पाने की उम्मीद थी क्योंकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्रिमंडल विस्तार के संकेत दिए थे। साथ ही कुछ लोगों को मलाईदार ओहदों पर नियुक्त करके सत्तासुख की अनुभूति करानी थी। जो तिकड़म और लाबिंग कर सकते थे वे दिल्ली और जयपुर की परिक्रमा कर चुके थे। चूंकि सूबे में कांग्रेस दो खेमों में बंटी है- गहलोत खेमा और सचिन पायलट खेमा। यानी जो जिस खेमे में है, वह उसी खेमे में जुगाड़ बिठा रहा था। बसपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए आधा दर्जन विधायकों के साथ ज्यादा ही बुरा बीता। मंत्री बनना तय था। पर कोरोना के प्रकोप ने सब कुछ गुड़ गोबर कर दिया। सारे अरमान धरे रह गए। कांग्रेस में भी कम से कम दो दर्जन नेता तो जरूर होंगे, जिन्हें मलाईदार कुर्सी के सपने आ रहे थे। इसमें गलत भी क्या था? पार्टी आलाकमान की हरी झंडी भी मिल चुकी थी। पर कोरोना महामारी के बाद तो मुख्यमंत्री और कांग्रेस पार्टी ही क्यों हर किसी की प्राथमिकता बदलेगी। एक तो अभी तक महामारी खत्म नहीं हुई है और जब होगी भी तो आर्थिक हालात चिंताजनक होंगे। इसमें संदेह नहीं। खुद रिजर्व बैंक ने कह दिया है कि चालू वित्तीय वर्ष में आर्थिक विकास दर नकारात्मक रहेगी। सरकारों को अपने खर्चों पर अंकुश लगाना पड़ेगा। यानी कोई भरोसा नहीं कि निकट भविष्य में सियासी पुनर्वास हो भी जाएगा या नहीं। सत्यानाश हो तेरा कोरोना।

कौन बनेगा मुख्य सचिव
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कहने को इन दिनों कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं। शुरू में उत्तराखंड में संक्रमित इक्का-दुक्का थे। पर अब संख्या बढ़ी है। मौजूदा मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह की छवि बेशक अच्छी है पर उनका सेवाकाल महज 31 जुलाई तक है। ऐसे में नए मुख्य सचिव की तैनाती करनी होगी। जिन्हें इस कुर्सी की दरकार है, वे अपनी लाबिंग कर रहे हैं। उत्पल कुमार सिंह के बारे में चर्चा है कि मुख्यमंत्री या तो कोरोना के मद्देनजर उन्हें तीन महीने का सेवा विस्तार दे सकते हैं और ऐसा नहीं हो पाया तो विद्युत नियामक आयोग का अध्यक्ष बना सकते हैं। उन्हें सेवा विस्तार न मिला तो 1987 बैच के ओमप्रकाश का दावा प्रबल होगा। जो अभी अपर मुख्य सचिव हैं। मुख्यमंत्री का उन्हीं को सबसे विश्वासपात्र भी माना जाता है। पर वे पर्वतीय मूल के नहीं हैं। वे ठहरे बिहारी। लिहाजा पर्वतीय मूल के अफसरों की लाबी उनका विरोध कर रही है। पर्वतीय मूल की राधा रतूड़ी उनसे एक बैच जूनियर होने के बावजूद मुख्य सचिव पद की दौड़ में हैं। वरिष्ठता की बात करें तो 1985 बैच के अनूप वधावन का दावा सबसे प्रबल है। पर वे केंद्र सरकार में हैं और शायद ही वापस आना चाहें। राधा रतूड़ी के ही बैच के एसएस संधू भी केंद्र में सेवारत हैं। मुख्यमंत्री को कहने को तो तीन अफसरों की सूची केंद्र को स्वीकृति के लिए भेजनी होगी। पर वहां भी सरकार भाजपा की है तो जिसे वे चाहेंगे, उसी के नाम की स्वीकृति मिलने में अड़चन शायद न आए।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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