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राजपाट : बेबात बतंगड़

विपक्ष चाहता है कि सरकार इन्हें प्रशिक्षण देकर पुलिस कांस्टेबल के स्तर पर लाए। अभी तक 812 करोड़ सालाना खर्च होता है इन वालंटियरों पर। वेतन बढ़ने के बाद आगामी अक्तूबर से यह रकम 1180 करोड़ बैठेगी। लेकिन विपक्ष आपा खो बैठा है।

Author May 26, 2018 4:36 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (एक्सप्रेस फोटो)

सूबे के सिविक वालंटियरों का वेतन बढ़ाना भारी पड़ गया दीदी को। पश्चिम बंगाल में जैसे ही पंचायत चुनाव के नतीजे आए, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विभिन्न जिलों में काम करने वाले 1.23 लाख वालंटियरों का वेतन बढ़ा दिया। एकमुश्त साढ़े पांच हजार से बढ़ा कर सीधे आठ हजार। लेकिन विपक्ष इस एलान के बाद ही पिल पड़ा तृणमूल कांग्रेस की सरकार पर। सीधे आरोप जड़ दिया कि पंचायत चुनाव में इन वालंटियरों ने तृणमूल कांग्रेस के लिए काम किया था, उसी का ईनाम दे दिया ममता ने। कानून व्यवस्था बनाए रखने में सक्रिय भूमिका अदा की थी इन वालंटियरों ने। विपक्ष चाहता है कि सरकार इन्हें प्रशिक्षण देकर पुलिस कांस्टेबल के स्तर पर लाए। अभी तक 812 करोड़ सालाना खर्च होता है इन वालंटियरों पर। वेतन बढ़ने के बाद आगामी अक्तूबर से यह रकम 1180 करोड़ बैठेगी। लेकिन विपक्ष आपा खो बैठा है। भाजपा नेता राहुल सिन्हा ने सफाई दी है कि वालंटियरों को ज्यादा वेतन मिलने से उन्हें कोई शिकायत नहीं है। वे तो यही चाहते हैं कि उनका वेतन और बढ़े। पर संदेह तो ममता ने खुद पैदा किया है। वेतन बढ़ाने का फैसला ऐसे वक्त पर किया, जो संदेह को जन्म देता है। इससे साफ निष्कर्ष निकलता है कि पंचायत चुनाव में मदद की थी। तो बतौर ईनाम बढ़ा दिया वेतन। माकपा विधायक सुजन चक्रवर्ती ने भी फरमाया है कि वालंटियरों पर पंचायत चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को जिताने का दबाव था। चक्रवर्ती तो इन वालंटियरों को कम से कम 11 हजार रुपए माहवार वेतन दिए जाने के हिमायती ठहरे। ममता ने शुरुआत में वादा भी इतनी ही रकम का किया था। हमला करने से कांग्रेस के अब्दुल मन्नान भी नहीं चूके। उन्होंने इसे ममता का नाटक बता दिया। रही बेचारे वालंटियरों की व्यथा-कथा तो कोई नहीं देखने वाला कि अब भी भविष्य निधि और चिकित्सा सुविधा से वंचित हैं वे।

बेजा उपेक्षा
पश्चिम बंगाल सरकार के नए फरमान ने झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के चेहरे की लकीरें गहरी कर दी हैं। ममता बनर्जी ने फरमान निकाला है कि अब उनके सूबे के सरकारी अस्पतालों में दूसरे सूबों के मरीजों का इलाज नहीं होगा। दरअसल झारखंड ठहरा ममता के सूबे का पड़ोसी। झारखंड के ज्यादातर लोग कोलकाता या पश्चिम बगाल के दूसरे शहरों में कराते रहे हैं अपना इलाज। रघुवर दास चाहते हैं कि ममता सरकार अपना फरमान वापस ले ताकि उनके सूबे के लोगों को असुविधा न हो। भूल रहे हैं कि ममता के साथ उनकी पार्टी और पार्टी की केंद्र में बैठी सरकार ने कब सद्भाव और दरियादिली दिखाई। जो बदले में उनसे अच्छे बर्ताव की आस लगा रहे हैं।

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