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राजपाटः लाचार माकपा

डूबते को तिनके का सहारा, कहावत बड़ी सधी हुई है।

डूबते को तिनके का सहारा, कहावत बड़ी सधी हुई है। कभी तीन दशक तक झंडा बुलंद था पश्चिम बंगाल में माकपा और उसके सहयोगी दलों का। लेकिन आजकल तो अस्तित्व पर ही संकट मंडरा रहा है। सो, सहारा चाहिए। जैसे डूबते को तिनके का सहारा भी चमत्कार लगता है। उसी तरह डेढ़ दशक के दौरान हुए हर चुनाव में रसातल की तरफ खिसकती माकपा अपनी खोई जमीन को हासिल करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। दो हफ्ते का व्यापक जनसंपर्क अभियान इसी मकसद से शुरू किया है। तीन नवंबर तक चलेगा यह अभियान। बीपीएमओ के बैनर तले केवल वाम दल ही नहीं उनसे जुड़े तमाम संगठन भी केंद्र और राज्य दोनों सरकारों की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं।

नजर अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव पर लगी है। सूबे की राजनीति में पांव जमाने की एक मजबूत सीढ़ी समझा जाता है पंचायत चुनाव को। पंचायत के 2008 के चुनाव में दुर्गति के बाद ही सूबे में शुरू हुआ था वाम मोर्चे के पतन का सिलसिला। सो, उसी चुनाव के जरिए अपने उत्थान का मंसूबा पाला है उन्होंने। बीपीएमओ के संयोजक श्यामल चक्रवर्ती का दावा है कि सूबे के सभी 77 हजार मतदान केंद्रों तक जाएंगे वे। रैलियां और जनसभाएं चल रही हैं। हालांकि अतीत में चलाए गए ऐसे सभी अभियानों का नतीजा शून्य ही रहा। वामदलों के वोट फीसद में भी तो हर चुनाव में गिरावट ही आ रही है। देखना है कि इस बार का अभियान उनके लिए संजीवनी बन पाएगा या नहीं।

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