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राजपाट: कहां गए ज्योतिषी, बढ़ गई धड़कन

चुनावी नतीजे चाहे जो आएं पर प्रचार के मामले में उत्तर प्रदेश में मोदी ने अपने विरोधियों को बेशक पछाड़ा है।

उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में त्रिशंकु नतीजे आ सकते हैं।

कहां गए ज्योतिषी

चुनावी नतीजे चाहे जो आएं पर प्रचार के मामले में उत्तर प्रदेश में मोदी ने अपने विरोधियों को बेशक पछाड़ा है। चुनाव की अधिसूचना जारी होने के वक्त तक भाजपाई दुविधा में थे कि नोटबंदी से आजिज लोगों के बीच किस मुंह से मांगेगे वोट। नोटबंदी को तो मुद्दा बनाया ही था विरोधियों ने, साथ में मोदी सरकार के ढाई साल के कामकाज का हिसाब भी मांग रहे थे। अच्छे दिन के लोकसभा चुनाव के जुमले की खिल्ली तो खैर उड़ाते ही। पर शुरुआती दो चरणों के मतदान के बाद मोदी और अमितशाह की जोड़ी ने प्रचार की ऐसी आक्रामक रणनीति बनाई कि नोटबंदी का असर धुलता नजर आया। अपनी तय रणनीति के हिसाब से ही मोदी अब कारपोरेट के बजाए इंदिरा गांधी के 1971 वाले अवतार की तरह गरीबों के रहनुमा की भूमिका में सामने आए। न किसी गरीब के खाते में फूटी कौड़ी आई और न योजना के मुताबिक कालाधन ही पकड़ा गया। पर अपनी वाकपटुता, जुमलेबाजी और विरोधियों के पस्त मनोबल से मोदी आम आदमी तक यह संदेश देने में तो कामयाब हो ही गए कि उनकी निजी साख अब भी बेदाग है। लोगों में अपने प्रति तभी तो गुस्सा नहीं उभरने दिया उन्होंने।

इस बार के विधानसभा चुनाव के नतीजे बेशक हैरान करने वाले हो सकते हैं। ज्यादातर सियासी पंडित तो त्रिशंकु विधानसभा की ही भविष्यवाणी कर रहे हैं। एक्जिट पोल पर तो चुनाव आयोग ने पाबंदी लगा रखी है। पर ज्योतिषियों और भविष्यवाणी करने वालों को भी जैसे सांप संूघ गया है। कोई हौसला नहीं दिखा पाया छह चरणों का मतदान निपटने के बाद भी चुनाव बाद नई उभरने वाली सियासी तस्वीर के बारे में अपनी गणना बताने का। हां, सट्टा बाजार को लेकर जरूर मीडिया में खबरें आई हैं। पर जो धंधा गैरकानूनी हो, उसकी विश्वसनीयता पर कोई क्यों करेगा यकीन।

बढ़ गई धड़कन

पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा की भी अपनी अहमियत है पर हर किसी की निगाह लगी है यूपी के नतीजों पर। जुबानी जमाखर्च तेज हो गया है। कोई दावा कर रहा है कि सरकार किसी की बने पर बनेगी स्पष्ट बहुमत के साथ। तो कोई त्रिशंकु विधानसभा की आस लगाए है। निर्दलियों और छोटे दलों की लाटरी तो त्रिशंकु विधानसभा में ही लगती है। मसलन, अजित सिंह को ऐसी स्थिति में फायदा मिलेगा। बसपाई मान रहे हैं कि त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में भी मुख्यमंत्री मायावती ही होंगी। भाजपाई बसपा के तोड़ने से लेकर राष्ट्रपति शासन लागू करने जैसे विकल्प बता रहे हैं तो अमितशाह और केशव मौर्य तीन सौ सीटें जीतने के दावे करते नहीं अघा रहे।

सबसे ज्यादा दुविधा में तो सूबे के नौकरशाह हैं। जो सत्ता के समीप रह कर मलाई खाने के आदी हो चुके हैं, वे तीनों ही जगह अभी से फिट करने में जुट गए हैं अपना जुगाड़। यों तो हर कोई सत्ता की चाबी सूबे के 18 फीसद मुसलमान मतदाताओं के हाथ में समझता है।
पर इस चुनाव के नतीजों को अगड़ों का रुख भी तय करेगा। जिन्हें भाजपा ही नहीं कांग्रेस-सपा और बसपा भी जोड़ रहे हैं अपने खाते में।

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