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राजपाटः अदालती नसीहत

पश्चिम बंगाल में पानीपत की लड़ाई जैसा हाल दिख रहा है। भाजपा जहां ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करने के लिए हर हथकंडा अपना रही है वहीं ममता बनर्जी भी आसानी से हार मानने वाली नहीं हैं।

राजपाटयूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और बंगाल की सीएम ममता बनर्जी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नसीहत दी है। संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को लोकतंत्र की रीढ़ बताते हुए राज्य पुलिस द्वारा दर्ज किए गए एक मामले को रद्द कर दिया है। रमाबाईनगर जिले के यशवंत सिंह ने ट्वीट कर सूबे की योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज की तीखी आलोचना की थी। गंभीर अपराध के कुछ मामलों का हवाला देते हुए टिप्पणी की थी कि इस सरकार ने कानून के शासन के बजाय जंगलराज कायम किया है। यह एक बेहद आम आलोचना है।

पर सरकार और उसके नेताओं के बारे में किसी को भी अपनी धारणा व्यक्त नहीं करने देने पर उतारू सरकार ने यशवंत सिंह के खिलाफ दो अगस्त को मानहानि और धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर दिया। यशवंत सिंह को हाई कोर्ट में दस्तक देनी पड़ी। दो जजों के एक पीठ ने एफआईआर को रद्द कर पुलिस की कार्रवाई को असंवैधानिक करार दिया। साथ ही स्पष्ट कर दिया कि असहमति और असंतोष जताना मौलिक अधिकार है, गुनाह नहीं।

दूसरा झटका मथुरा के जिला जज की अदालत से लगा होगा सरकार को। याद कीजिए हाथरस कांड। दिल्ली से हाथरस जा रहे चार लोगों को मथुरा पुलिस ने रास्ते में ही पकड़कर उन पर इलाके में अशांति फैलाने की साजिश और कोशिश का आरोप लगा दिया। केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन भी इन्हीं में एक थे। पर पत्रकार कप्पन को सूबे की पुलिस ने केरल के संगठन पीएफआई का सक्रिय कार्यकर्ता बता दिया। चारों अभी तक जेल में हैं। तीन की तरफ से इलाहाबाद हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका विचाराधीन है तो चौथे कप्पन का मामला केरल श्रमजीवी पत्रकार संघ सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहा है।

मथुरा के जिला जज यशवंत मिश्र ने अब फैसला सुनाया है कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा इन चारों को रिमांड देकर सूबे की एसटीएफ को सौंपना गैरकानूनी था। इस मामले में रिमांड कोई विशेष अदालत ही दे सकती थी। बहरहाल इस मामले में पांच जनवरी को हाई कोर्ट में सुनवाई होगी। तीसरा झटका लव जेहाद के नाम पर बनाए गए कानून का उपहास उड़ने से लगा है। मुरादाबाद के जिस दंपति पर अंतर मजहबी विवाह के कारण सूबे की पुलिस ने यह कानून थोपा था, उसे हाई कोर्ट से संरक्षण मिल गया। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि दो वयस्क लोग अपनी मर्जी से विवाह भी कर सकते हैं और धर्म परिवर्तन भी। सारे देश में आलोचना हो रही है उत्तर प्रदेश सरकार की।

विस्तार की आस
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में भाजपा को विधानसभा में तो औकात बता दी पर लोकसभा में उसकी दाल दोनों बार नहीं गल पाई। विधानसभा चुनाव में 2013 में दिल्ली में मिली कामयाबी से अरविंद केजरीवाल भाजपा को बिना सांगठनिक ढांचे के ही राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने की चूक तो कर ही बैठे थे, नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी में लोकसभा चुनाव लड़ने भी पहुंच गए थे। पर बुरी तरह असफलता हाथ आई। पंजाब में लोकसभा की चार सीटें मिल गई थी। उसके बाद तो घोषित कर दिया था कि दिल्ली पर ही फोकस करेंगे।

हालांकि पंजाब में जरूर पिछले विधानसभा चुनाव में सत्ता का ख्वाब पाल लिया था। पर बाजी कांग्रेस के हाथ लगी। अब केजरीवाल की महत्वाकांक्षा फिर उभरी है। एलान किया है कि 2022 में यूपी और उत्तराखंड दोनों जगह उतारेंगे अपने उम्मीदवार। आम आदमी पार्टी को उम्मीद है कि कांग्रेस और भाजपा से खफा मतदाता उसकी झोली में आ जाएंगे। सपा और बसपा की जमीन खिसकने से भी इसकी संभावना बढ़ी है। सिसौदिया ने त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार पर तीखा हमला बोला। भाजपा का असंतुष्ट खेमा सिसौदिया के आरोपों से बम-बम नजर आया। अजय भट्ट, रमेश पोखरियाल निशंक, हरक सिंह रावत, सतपाल महाराज व विजय बहुगुणा जैसे नेता पार्टी में त्रिवेंद्र सिंह के वर्चस्व के चलते अपने भविष्य को अंधकारमय मान रहे हैं तो इसमें अटपटा तो कुछ है भी नहीं।

पानीपत की लड़ाई
पश्चिम बंगाल में पानीपत की लड़ाई जैसा हाल दिख रहा है। भाजपा जहां ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करने के लिए हर हथकंडा अपना रही है वहीं ममता बनर्जी भी आसानी से हार मानने वाली नहीं हैं। पहले उनके कुछ वरिष्ठ आइपीएस अफसरों की जबरन केंद्र में तैनाती का आदेश हुआ। फिर राज्यपाल की रिपोर्ट के हवाले से हवा चली कि राष्ट्रपति शासन लगेगा। ममता फिर भी टस से मस नहीं हुई। अब कैलाश विजयवर्गीय उनकी पार्टी में सेंध लगा रहे हैं।

विधायकों, सांसदों और दूसरे नेताओं का पार्टी छोड़कर जाना किसी भी तरह सुखद संकेत तो नहीं माना जा सकता पर केवल दल बदलुओं के बूते भाजपा भी अगर 200 सीटें जीतने का दम भर रही है तो इसे अभी तो दिवास्वप्न ही माना जाएगा। ममता जुझारू नेता हैं। लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतने से भाजपा की आस जगी है। पर 2016 में भी ममता ने विधानसभा चुनाव में भाजपा को बुरी तरह मात दी थी। दिल्ली में भी सामने आ चुका है कि लोकसभा जीतने का यह निश्चित नतीजा नहीं हो सकता कि विधानसभा में भी वैसा ही परिणाम आएगा। (प्रस्तुति: अनिल बंसल)

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