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राजपाट: सियासत, सियासतदान और सियासी गतिविधियां

इस चुनाव की एक खासियत यह दिखी कि तेजस्वी ने चुनाव प्रचार में कहीं भी अपने पिता लालू यादव का न नाम इस्तेमाल किया और न प्रचार में फोटो। चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने के मामले मेंं तो खैर युवा तेजस्वी अपने विरोधियों पर लगातार इक्कीस नजर आए ही।

बिहार के सीएम नीतीश कुमार तथा यूपी की पूर्व सीएम और बीएसपी सुप्रीमो मायावती।

चुनावी रंग
बिहार में चुनावी नतीजे चाहे जिसके पक्ष में जाएं पर प्रचार के दौरान नेताओं के रंग खूब दिखे। दो चरण का मतदान निपट जाने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक एलान कर दिया कि यह उनके सियासी जीवन का आखिरी चुनाव है। इसके बाद वे राजनीति से सन्यास ले लेंगे। पर नीतीश को अचानक इसकी जरूरत क्यों पड़ी? क्या पहले दो चरण के मतदान में उन्हें हवा अपने पक्ष में नजर नहीं आई और तीसरे चरण में भावनात्मक कार्ड सोच समझकर उछाल दिया।

विरोधियों ने इस एलान का भी अपने तईं विश्लेषण करने में चूक नहीं की। तेजस्वी को तो जैसे मुददा मिल गया। तपाक से बोले कि वे तो शुरू से ही कह रहे हैं कि नीतीश कुमार थक चुके हैं। उन्हें रिटायर हो ही जाना चाहिए। अब उन्होंने इस बात को खुद मान लिया है। थके न होते तो कोरोना संक्रमण के शुरूआती चार महीने अपने घर में कैद क्यों रहते। सूबे के परेशान लोगों के पास जा जाकर उनका हालचाल जानने की कोशिश करते।

ऐसा ही बयान लोजपा के चिराग पासवान का भी आ गया। लोजपा ने तो नीतीश की विश्वसनीयता और साख पर ही सवाल उठा दिया। याद दिलाया कि 2014 में जब भाजपा से गठबंधन तोड़ा था तो कैसी-कैसी कसम खाई थी। जीवन में दोबारा भाजपा से कभी हाथ न मिलाने का दावा किया था। उस दावे का जो हुआ वही आखिरी चुनाव संबंधी दावे का होगा। बिहार के मतदाता भी इसे खूब समझते हैं। भाजपा-जद (एकी) गठबंधन के अंतरविरोध भी चुनाव प्रचार में छिपे न रह पाए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिहार में सरकार बनने पर घुसपैठियों को बाहर निकाल देने का एलान किया तो नीतीश कुमार के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी। योगी के दावे को नकारने में देर नहीं लगाई।

एक चुनावी सभा में सफाई दी कि उनके रहते बिहार से किसी को बाहर निकालने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता। इस चुनाव की एक खासियत यह दिखी कि तेजस्वी ने चुनाव प्रचार में कहीं भी अपने पिता लालू यादव का न नाम इस्तेमाल किया और न प्रचार में फोटो। चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने के मामले मेंं तो खैर युवा तेजस्वी अपने विरोधियों पर लगातार इक्कीस नजर आए ही।

रस्साकसी
मुख्यमंत्री केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के हों या विरोधी पार्टी के, राजभवनों से उनकी पटरी कम ही खाती है। उत्तराखंड में सरकार भाजपा की है, फिर भी राज्यपाल बेबी रानी मौर्य के साथ मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के रिश्ते मधुर नहीं। कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर लगभग सभी राज्यों में मुख्यमंत्री और राज्यपाल का अहम टकराता ही रहता है। राजभवन का स्टाफ भी अब तो ज्यादातर राज्यपाल अपनी पसंद का रखने लगे हैं। उत्तराखंड में सरकार ने कुलपतियों की नियुक्ति के राज्यपाल के अधिकार से छेड़छाड़ की तो राज्यपाल को अखरना ही था। नतीजतन राज्यपाल ने भी सरकारी कामकाज की समीक्षा शुरू कर दी। ठीक उसी तरह जैसे आजकल पश्चिम बंगाल में राज्यपाल जगदीप धनखड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की रस्साकसी चल रही है। भाजपा शासित किसी अन्य राज्य में तो राज्यपाल सरकारी काम की समीक्षा नहीं कर रहे।

उत्तर प्रदेश में आनंदी बेन पटेल से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कोई शिकायत नहीं। बहरहाल राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने नैनीताल के जिला कलेक्टर को निर्देश देकर जता दिया कि वे महज रबड़ स्टांप नहीं हैं। राज्यपाल ने तेवर दिखाए तो मुख्यमंत्री की अकड़ भी सामने आ गई। राज्यपाल से मधुर रिश्ते रखने वाली अपर मुख्य सचिव मनीषा पंवार के पर कतर दिए। उद्योग जैसा अहम विभाग उनसे वापस ले लिया। रूद्रप्रयाग की जिला कलेक्टर वंदना का भी तबादला कर दिया। वंदना और मनीषा दोनों पिछले दिनों मुख्यमंत्री की बैठक में नहीं पहुंच पाई थीं। नाराज राज्यपाल ने अब अपने सचिव के माध्यम से संदेश भिजवा दिया है कि वे सूबे के हर जिले के विकास कार्यों की खुद समीक्षा करेंगी। गोवा के भाजपाई मुख्यमंत्री ने राज्यपाल सत्यपाल मलिक की टोकाटाकी की केंद्र से शिकायत की थी तो मलिक का तबादला कर दिया गया था। बेबी रानी मौर्य अंजाम से वाकिफ न हों, कैसे मुमकिन है।

विचलित बहिन जी
मायावती विचलित हैं। याद कीजिए 2007 में चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं तब बसपा सुप्रीमो। लेकिन स्पष्ट बहुमत पाकर अपने बूते पहली बार। इससे पहले 1995, 1997 और 2002 में भाजपा से गठबंधन करके मिली थी यूपी की कुर्सी। चौथी बार अपने बूते बहुमत लाई तो दिल्ली की सत्ता का सपना देखने लगी थीं। बहुजन समाज छोड़ सर्वजन हिताय का नारा अपना लिया था। दलितों, मुसलमानों और पिछड़ों के साथ-साथ ब्रह्मणों का भी समर्थन मिला था। लेकिन 2012 में अखिलेश यादव ने ऐसी पटखनी दी कि तब से उबर नहीं पाई हैं। समझ नहीं आ रहा कि कौन सी राह चलें।

पूर्णबंदी में सबसे ज्यादा परेशान गरीबों यानि दलितों और पिछड़ों पर मायावती ने हमदर्दी के दो बोल भी नहीं बोले। विरोधियों ने तो भाजपा से गुप्त समझौता करने का आरोप तभी लगा दिया था जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आते ही उन्होंने सपा से नाता तोड़ लिया था। राज्यसभा की एक सीट पाने की चाहत में अजीबो गरीब बयान दे बैठीं। यह सीट भाजपा की मेहरबानी से बसपा की झोली में आई है। सपा के उम्मीदवार का नामांकन रद्द हो गया था।

भाजपा से पींगें बढ़ती देख उनके कई मुसलमान विधायक बागी हो गए। बयान ही ऐसा था कि प्रतिक्रिया तय थी। फरमाया था कि सपा को हराने के लिए भाजपा से हाथ मिलाने से भी नहीं चूकेंगी। बाद में गलती का अहसास हुआ कि दलित और मुसलमान का समीकरण टूट जाएगा तो सफाई देती नजर आई कि भाजपा से कभी हाथ नहीं मिलाएंगी। सपा ही क्यों कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद की भीम आर्मी ने ऐसे वार किए और सियासी भविष्य खटाई में दिखने लगा तो रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे डाली। (प्रस्तुति: अनिल बंसल)

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