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राजपाट – दूर की कौड़ी

लगातार चौथी बार अध्यक्ष बनवाने के लिए नीकु ने पार्टी के संविधान में संशोधन कराया था। पर यादव को याद रखना चाहिए कि उन्हें पार्टी की कमान थमाने के चक्कर में नीकु ने जार्ज फर्नांडीज को पद छोड़ने को मजबूर किया था।
Author नई दिल्ली | April 18, 2016 01:17 am
पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मीडिया से बात करते हुए। (पीटीआई फाइल फोटो)

दोनों हाथों में लड्डू हैं नीकु के। नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। अभी तक तो मुख्यमंत्री ही थे। अब अपनी पार्टी जद (एकी) के अध्यक्ष भी बन गए। बिहार में तो खूंटा पहले ही गाड़ दिया था। अब केंद्र की राजनीति में भी खूंटा गाड़ने की तैयारी है। अभी तक शरद यादव थे पार्टी के मुखिया। उन्होंने मियाद पूरी होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। राजनीति में मजबूरी कई बार समझौते करा देती है। लगातार चौथी बार अध्यक्ष बनवाने के लिए नीकु ने पार्टी के संविधान में संशोधन कराया था। पर यादव को याद रखना चाहिए कि उन्हें पार्टी की कमान थमाने के चक्कर में नीकु ने जार्ज फर्नांडीज को पद छोड़ने को मजबूर किया था। जैसा बोओ वैसा ही काटने के लिए भी तो तैयार रहो। यादव का राज्यसभा का कार्यकाल पूरा हो गया था। अध्यक्ष पद से न हटते तो राज्यसभा में कैसे आते। नीकु ने साफ संकेत दे दिया था। यादव को राज्यसभा ज्यादा उचित लगी। हालांकि पद छोड़ते वक्त आंखों में आंसू साफ दिखे। ऊपर से नीकु ने दुहाई दी कि उन्हें अध्यक्ष बनाने की मंशा शरद यादव की ही थी। नीकु अब अपनी पार्टी को दूसरे राज्यों में मजबूत करने की मुहिम चलाएंगे। इसके लिए वहां के क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करेंगे। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और अजित सिंह तो झारखंड में बाबूलाल मरांडी की पार्टी फिलहाल उनकी वरीयता है। कोशिश तीसरे मोर्चे की तरह केंद्र में भाजपा के विकल्प को उभारने की है। सियासत में सपने तो सभी देखते हैं। किसी का सपना साकार हो जाता है तो किसी का अधूरा ही रह जाता है। फिर नीकु तो डंके की चोट पर कहते रहे हैं कि वे आशावादी हैं। कोई उन्हें यह कह कर कुरेदे कि वे प्रधानमंत्री पद का दावा कब करेंगे तो नीकु का जवाब नपातुला होता है, लोगबाग जानते हैं कि प्रधानमंत्री पद के लायक कौन है और कौन नहीं? राजनीति तो की ही जाती है शीर्ष पद पर पहुंचने के लिए।

खुन्नसी लालू
लालू यादव ने कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। दुखती रग पर हाथ रखने की कला में माहिर हैं। शरद यादव के बारे में जो कुछ कहा, वह अनायास नहीं था। उन्होंने सोच-समझ कर ही कहा होगा कि शरद यादव का राजनीतिक भविष्य अब खत्म हो गया। यादव के बारे में यही राय उनके विरोधियों उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान की भी है। वे तो खैर राजग में ठहरे। लेकिन लालू प्रसाद बेशक शरद यादव के प्रतिद्वंद्वी हो गए हों लेकिन थे तो बेहद करीबी। यह बात अलग है कि जनता दल का अध्यक्ष बनने के चक्कर में दोनों के बीच भिडंत हुई थी। नतीजतन लालू को अपनी अलग पार्टी बनानी पड़ी थी। उसके बाद मधेपुरा में दोनों लोकसभा चुनाव में आमने-सामने हो गए। कभी शरद ने उन्हें पटखनी दी तो कभी लालू ने उन्हें चित कर दिया। इस बार विधानसभा चुनाव के मौके पर दोनों एक साथ आए थे। उसका फायदा भी मिला। लेकिन जद (एकी) के भीतर ऐसी उथल-पुथल मची कि शरद को पद छोड़ना पड़ गया। हैरत की बात तो यह है कि शरद यादव के बारे में लालू ने जो टिप्पणी की, उस पर न नीतीश ने कोई सफाई दी और न लालू ने कोई प्रतिक्रिया। लालू ने तो शरद यादव के जले पर यह कह कर नमक और छिड़क दिया कि छोटा भाई नीकु पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर बखूबी सफल होगा। सियासी हलकों में इसे लालू की मजबूरी बताया जा रहा है।

चल गया चाबुक
आखिर कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार को हटा ही दिया चुनाव आयोग ने। एक तरह से दीदी के लिए इसे तगड़ा झटका ही मानना चाहिए। ढाई महीने पहले ही तैनात किया था पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने अपने इस चहेते को कोलकाता में। पर चुनाव की तारीखों के एलान के बाद से आयोग पर विपक्ष की तरफ से लगातार दबाव डाला जा रहा था उन्हें हटाने के लिए। पूर्व में इस तरह किसी पुलिस प्रमुख को उसके पद से नहीं हटाया गया सूबे में। राजीव कुमार से भी वरिष्ठ सोमेन मित्र बन गए हैं अब कोलकाता के पुलिस आयुक्त। कोलकाता में मतदान 21 और 30 अप्रैल को होना है। पूर्व में कोलकाता के विशेष पुलिस आयुक्त थे राजीव कुमार। इससे पहले चुनाव आयोग ने पांच जिलों के पुलिस कप्तानों को चुनाव ड्यूटी से हटाने का फरमान सुनाया था। उधर, भाजपा के पूर्व सूबेदार राहुल सिन्हा का आरोप था कि कोलकाता की खुफिया पुलिस के दो लोगों के जरिए उनका स्टिंग आपरेशन करने की कोशिश हुई थी। जिसकी साजिश का आरोप उन्होंने राजीव कुमार पर ही लगाया था। उसके बाद ही तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से लेकर कांग्रेस और वाममोर्चे के बड़े नेताओं ने खटखटाया था चुनाव आयोग का दरवाजा। खबर तो यहां तक है कि राजीव कुमार को हटाने का फैसला तो आयोग ने मार्च के आखिरी हफ्ते में ही कर लिया था। पर फ्लाईओवर हादसे के मद्देनजर अपने आदेश को जारी नहीं किया था तब। यों दीदी ने अभी तक आयोग के इस फैसले पर कोई सीधी टिप्पणी तो नहीं की है पर तेवर उनकी नाराजगी को ही जता रहे हैं। ममता की चुनावी रणनीति को झटका देने वाले इस फैसले का विपक्ष तो स्वागत करता ही।

चूहे-बिल्ली का खेल
सरकार और आरएसएस के रिश्तों में पनपी खटास को दूर करने की चिंता सता रही है अब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को। वसुंधरा सरकार के कामकाज से संघी खेमा नाराज तो शुरू से ही रहा है। चुनाव में भाजपा को मिले बंपर बहुमत की एक वजह तो संघ के जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत भी थी ही। बेशक सत्ता में आने के बाद भाजपा मंत्रियों ने संघ के स्वयं सेवकों की अनदेखी कर दी। जयपुर स्थित संघ के दफ्तर भारती भवन में सरकारी अफसरों के बारे में शिकायतें तभी तो आईं। कलेक्टर और पुलिस कप्तान पार्टी के पदाधिकारियों, विधायकों और सांसदों को कोई तवज्जो दे ही नहीं रहे थे। उन्होंने तो सीधे मुख्यमंत्री दफ्तर से अपने तार जोड़ लिए। ऊपर से जयपुर में मंदिरों को तोड़ा गया तो संघी खूब आग बबूला हुए थे। मंदिर बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले हुए आंदोलन के पीछे योजना तो संघियों की ही थी। घनश्याम तिवाड़ी जैसे कद्दावर नेता ने न केवल विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया था बल्कि आरोप भी लगाया था कि ऐसी ज्यादती तो जुल्म के लिए कुख्यात रहे मुगल शासक औरंगजेब ने भी नहीं की थी। मुख्यमंत्री दफ्तर के एक बड़े अफसर को जिम्मेदार ठहराया था उन्होंने। जांच की मांग करने से भी नहीं हिचके थे तिवाड़ी। यों जयपुर शहर के दूसरे भाजपा विधायक भी इस मुद्दे पर संघ के सुर में सुर मिलाते रहे हैं, भले खुल कर आलोचना करने से घबराते हों। उस समय तो आरएसएस के क्षेत्र प्रचारक दुर्गादास ने भी सरकार के कामकाज पर असंतोष जताया था। तभी तो वसुंधरा ने उन्हें आमंत्रित कर लंबी मंत्रणा की थी। इतना ही नहीं पार्टी के सूबेदार अशोक परनामी को भी डैमेज कंट्रोल में लगा दिया था। संघी खेमा अमित शाह को भी आगाह कर चुका है कि राजस्थान में सरकार के कामकाज का ढर्रा नहीं बदला तो अगले चुनाव में गत दिल्ली और बिहार सरीखी हो सकती है। बेशक वसुंधरा खुद संघ के पदाधिकारियों को खूब भाव देने लगी हैं पर उनके आला अफसर उन्हें कतई तवज्जो नहीं दे रहे। वे तो यही मान कर चल रहे हैं कि मुख्यमंत्री संघियों को खुश रखने भर के लिए उनसे गुफ्तगू करती हैं। अन्यथा सरकारी कामकाज में उनकी सलाह को वे कोई महत्व नहीं देतीं।

हवाई ख्वाब
विजय सांपला पंजाब में भाजपा के सूबेदार बन तो गए पर उनकी सफलता सहयोगियों के रवैए से भी तय होगी। पूर्व सूबेदार कमल शर्मा और उनका खेमा शायद ही करे सहयोग। अपने उत्तराधिकारी को बधाई देने तक की फुर्सत तीन दिन बाद मिली शर्मा को। वह भी मजबूरी में। पद सौंपने के लिए तो आना ही पड़ता। विधानसभा चुनाव से पहले अपनी छुट्टी की आशंका नहीं रही होगी शर्मा को। जो भी हो प्रकट तौर पर तो सांपला के साथ सहयोग का वादा किया है। हालांकि समर्थकों को फिलहाल चुप्पी साधने की सलाह दी बताते हैं। पंजाब में भाजपा पर अकाली दल की पिछलग्गू होने के आरोप विपक्ष कम भाजपाई ही ज्यादा लगाते रहे हैं। कमल शर्मा की सूबेदारी में तो भाजपा की राय का कोई महत्व ही नहीं बचा था। तभी तो पार्टी का नाम अकाली दल की बी टीम पड़ गया था। सांपला को आलाकमान ने दलितों में पैठ बढ़ाने के मकसद से सौंपी है सूबेदारी। मुख्यमंत्री पद का दावेदार तो बना नहीं सकते थे। अकाली दल के साथ गठबंधन है और चुनाव प्रकाश सिंह बादल की अगुवाई में ही लड़ने की मजबूरी ठहरी। पंजाब से जिस तरह की सूचनाएं मिल रही हैं, वे अकाली दल के अनुकूल तो कतई नहीं जंचती। साफ है कि घाटा सहयोगी के नाते भाजपा को भी उठाना पड़ सकता है। ऐसे में सांपला अगर 35 फीसद दलित वोट बैंक में थोड़ी भी सेंध लगा पाए तो उनकी पार्टी की लाज बच सकती है। हालांकि सत्ता में आने को आतुर कांग्रेस ने तो पहले ही सौंप दी थी दलित को विधानसभा में दल के नेता की कुर्सी। कहने को सांपला गठबंधन सहयोगी अकाली दल से ज्यादा सीटों की मांग कर सकते हैं, पर उसे शायद ही गंभीरता से लेगा अकाली दल। सिद्धू दंपत्ति पहले ही नाराज है। ऐसे में अकाली दल के प्रति सांपला ने भी अगर कमल शर्मा जैसा ही रुख दिखाया तो विधानसभा चुनाव में भट्ठा बैठ सकता है पार्टी का।

कब टूटेगा छींका
राजनीति में अटकलों और कयासों के भी मायने होते हैं। हिमाचल में आजकल यही कयास लग रहे हैं कि कहीं कांग्रेस आला कमान सरकार का नेतृत्व तो नहीं बदल दे। कौल सिंह ठाकुर ढाई साल पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी के समीप तो जरूर पहुंच गए थे पर आखिर में बैरंग ही लौटना पड़ा था। आलाकमान ने वीरभद्र सिंह को ही सौंप दिया था नेतृत्व। जबकि केंद्रीय मंत्री के पद से आरोपों के चलते कुछ दिन पहले ही इस्तीफा देना पड़ा था वीरभद्र को। इस बार फिर वीरभद्र सिंह आरोपों के चक्रव्यूह में फंसते दिख रहे हैं। आलाकमान की दुविधा बढ़ गई है। न उगलते बन रहा है और न निगलते। वीरभद्र के पक्ष में पार्टी विधायकों का बहुमत आलाकमान को छेड़छाड़ नहीं करने दे रहा। यह बात अलग है कि घोषित तौर पर समर्थक माने जाने वाले कई नेता कुर्सी का ख्वाब देख रहे हैं। लाबिंग करने वालों में वरिष्ठता के नाते दावा कौल सिंह ठाकुर का ही मजबूत लगता है। आठ बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। आलाकमान पर भरोसा भी है उन्हें। वीरभद्र के खिलाफ कभी खुल कर कुछ कहा भी नहीं। आनंद शर्मा के समर्थन से राह आसान भी हो सकती है बशर्ते वीरभद्र के पद छोड़ने की नौबत तो आए।

सब पर भारी
अरुण धूमल पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे हैं तो क्या हुआ। भाजपा में तो किसी पद पर हैं नहीं। हां, उनके बड़े भाई अनुराग ठाकुर जरूर न केवल लोकसभा सदस्य हैं, पार्टी के युवा मोर्चे के मुखिया भी हैं। लेकिन हिमाचल में वीरभद्र सिंह के खिलाफ दमदार भूमिका अरुण धूमल की ही रही है। घोषित आय से ज्यादा संपत्ति जुटाने के जिस आरोप का वीरभद्र पिछले काफी अरसे से सामना कर रहे हैं, उसका खुलासा सबसे पहले अरुण ने ही तो किया था। तब विधानसभा में खूब हंगामा बरपा था। अब पार्टी के तेवर वीरभद्र के प्रति नरम देख अरुण ने फिर मोर्चा खोल दिया है। शिमला में आरोप लगा कर ही संतुष्ट नहीं हुए। अब धमकी दी है कि अगला हमला ऊना में करेंगे। आरोप लगाया है कि 1973 में वीरभद्र ने अपनी जमीन कुछ लोगों को पांच हजार रुपए में बेची थी। शायद इतनी मामूली रकम भी मायने रखती होगी तब उनके लिए। 2007 में मुख्यमंत्री बने तो इस जमीन का अधिग्रहण करा दिया। दावा किया कि वन विभाग पेड़ लगाएगा। यह बात अलग है कि नौ साल बीत गए पर पेड़ तो दूर एक पौधा तक नहीं लगा इस जमीन पर। जहां तक नियमों का सवाल है तो हर कोई जानता है कि अधिग्रहण के तीन साल के भीतर जमीन का घोषित मकसद के लिए उपयोग नहीं हो तो उसे भूमालिकों को लौटाना पड़ता है। पर उन बेचारों को तो कोर एरिया बता कर उनकी ही जमीन पर एक ईंट तक नहीं लगाने दी। जबकि अपने बेटे को गेस्टहाउस बनाने की इजाजत देने में कतई देर नहीं लगाई वीरभद्र ने। साफ है कि वीरभद्र को यह गवारा ही नहीं कि उनके घर-होली लॉज के आसपास कोई और अपना घर बसाए। वीरभद्र इस आरोप से कैसे निपटेंगे, नहीं पता पर एक सवाल तो उठता ही है कि जो खुलासे भाजपा नेताओं को करने चाहिए, अरुण धूमल क्यों कर रहे हैं उनका खुलासा?

लुका-छिपी
उनकी कुर्सी पर चाहे जिसकी नजर टिकी हो पर फिलहाल तो हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को थोड़ी राहत मिल ही गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश जारी नहीं किया है। सीबीआइ तो इसी फिराक में थी। हिमाचल भाजपा ने तो योजना भी बना ली थी कि वीरभद्र की गिरफ्तारी का अदालत से आदेश आते ही संवैधानिक संकट के बहाने सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा देंगे। लेकिन फिलहाल मध्यावधि चुनाव की संभावना कमजोर पड़ी है। कांग्रेस के भीतर भी वीरभद्र के खिलाफ कोई असंतोष अभी तक सतह पर तो नजर आया नहीं है। हां, उनके हक में वीरभद्र ब्रिगेड जरूर बनाई है कांग्रेस सेवा दल से जुड़े रहे बलदेव ठाकुर ने। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष कुलदीप पठानिया ने इस ब्रिगेड से अपना नाम जोड़े जाने पर खूब नाक-भौं सिकोड़ी। हालांकि वीरभद्र के प्रति भरोसा भी जताया लगे हाथ। वीरभद्र को भी ठाकुर का कदम बचकाना लगा होगा। तभी तो ब्रिगेड को भंग करा दिया।

बढ़ा गए कलह
राजनीति में पैंतरे भी खूब कमाल दिखाते हैं। उत्तराखंड की राजनीति इस मामले में और भी अनूठी ठहरी। कांग्रेस से भाजपा में आए सतपाल महाराज ने बैसाखी के मौके पर सद्भावना सम्मेलन की तैयारी की थी हरिद्वार में। अमित शाह को बतौर खास मेहमान बुलाया था। लेकिन पार्टी के दूसरे गुट ने विरोध किया तो मजबूरी में महाराज को सद्भावना सम्मेलन आंबेडकर जयंती से जोड़ना पड़ गया। समरसता सम्मेलन बना दिया उसे। हालांकि पार्टी के विधायक आदेश चौहान, संजय महंत और स्वामी यतीश्वरानंद ने फिर भी मुंह फुलाए रखा। अमित शाह के लिए बने मंच पर अपने लिए जगह न देख उन्हें रूठना ही था। पार्टी सूबेदार अजय भट्ट से जमकर शिकवे शिकायत की। उधर अमित शाह ज्वालापुर में आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने तो जरूर पहुंचे लेकिन वहीं दलित समाज की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में मंच पर चढ़ना तक जरूरी नहीं समझा। इससे कांग्रेस को मुफ्त में मुद्दा मिल गया। राष्ट्रपति शासन में पहला दौरा था यह अमित शाह का। तो भी भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चंद खंड़ूड़ी और राजलक्ष्मी तीनों ही सांसद नदारद दिखे। कांग्रेस ने तो दलितों की उपेक्षा के बहाने अमित शाह का पुतला फूंकने में भी देर नहीं लगाई।

मजलूम परिंदे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बड़ा चर्चित नारा है, सबका साथ, सबका विकास। पर मध्य प्रदेश में नौकरशाही इसे जमकर पलीता लगा रही है। सूबे के मदरसों को मिलने वाली करीब पांच करोड़ रुपए की अनुदान राशि लापरवाही के चलते वापस हो गई। हर मदरसे को रख-रखाव के लिए हर साल दिए जाते हैं 25 हजार रुपए। 18 सौ मदरसों में 432 तो केवल राजधानी भोपाल में हैं। शासन से अनुदान का आदेश ही वित्तीय वर्ष खत्म होने से एक दिन पहले यानी 30 मार्च को निकला। तमाम जिला शिक्षा अधिकारियों को हिदायत मिली कि 31 मार्च तक रकम बांट दें। अन्यथा वापस चली जाएगी। 24 घंटे में कैसे हो सकता था यह काम। अब मदरसा संचालकों ने यह मुद्दा उठाया है तो सामने आई है नौकरशाही की लापरवाही। बेचारे 30 मार्च को तो खुशी से झूम उठे थे पर अगले ही दिन रकम वापस हुई तो लटक गए चेहरे। याद आया उन्हें भोपाल में ही बस गए मेरठ के मशहूर शायर बशीर बद्र का यह शेर, खुशबू की तरह आया वो तेज हवाओं में, मांगा था जिसे हमने दिनरात दुआओं में। भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली, मजलूम परिंदों की मासूम सभाओं में।

जलवा रहा न जलाल
मध्य प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री अरविंद मेनन की अचानक हुई विदाई से मुख्यमंत्री शिवराज चौहान और उनके करीबी सूबेदार नंदकुमार सिंह सकते में हैं। दोनों के साथ बेहतर तालमेल था मेनन का। इससे उनके चंपुओं की ही खूब पौ बारह हो रही थी। पर अब विरोधी खेमा सक्रिय हुआ तो मेनन की छुट्टी हो गई। जाहिर है कि गाज अभी उनके दूसरे करीबियों पर भी पड़ सकती है। भाजपा संगठन में बदलाव की यह शुरुआत और आगे बढ़ेगी ही। साफ है कि तलवार युवा मोर्चे के सूबेदार अमरदीप मौर्य और महिला मोर्चे की सूबेदार लता वानखेड़े पर भी लटक रही है। इस बदलाव के पीछे अहम भूमिका पार्टी के प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे की आंकी जा रही है। महाराष्ट्र के विनय ने एक झटके में संकेत दे दिया कि कोई उन्हें कमजोर समझने की चूक न करे। अरविंद मेनन की छुट्टी को सहस्त्रबुद्धे का मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं भाजपाई। पांच साल तक पद पर रहे मेनन की छुट्टी की वजहों को तलाश रहे हैं सियासी कारिंदे। लेकिन उनकी जगह तैनात किए गए सुहास भगत ने ऐसा रहस्यमय माहौल रचा है कि पार्टी दफ्तर में सन्नाटा है। भगत कब आएंगे, कोई नहीं जानता। अलबत्ता मेनन ने दिल्ली रवाना होने में देर नहीं लगाई। जबकि उनकी गणेश परिक्रमा करने वाले अब कोरे लिफाफे की तरह जहां-तहां भटकने को मजबूर हो गए हैं।

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