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राजपाट: बिहार का चुनाव और लोजपा की रणनीति

नीतीश के उम्मीदवारों को हरवाकर चिराग भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं। कमाल तो यह है कि जद (एकी) के हिस्से में आई सीटों के कद्दावर भाजपा नेता लोजपा में शामिल हो रहे हैं।

बीजेपी नेता सुशील मोदी और ज्योतिरादित्य सिंधिया।

दाल में काला

बिहार भाजपा के कद्दावर नेता सुशील मोदी और पार्टी के सूबेदार संजय जायसवाल लाख दावा करें कि विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के नाम और पोस्टर का इस्तेमाल भाजपा, जद (एकी), हम और वीआइपी इन चारों के अलावा कोई और पार्टी करेगी तो उसकी शिकायत चुनाव आयोग से की जाएगी। अजीबोगरीब गठबंधन की सियासत दिख रही है बिहार में। भाजपा ने कहा है कि वह नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। नीतीश का गठबंधन भाजपा के साथ बिहार तक सीमित है। उनकी पार्टी केंद्र सरकार में शामिल नहीं है।

उधर, चिराग पासवान की लोजपा केंद्र सरकार में तो शामिल है पर बिहार में बने जद (एकी) व भाजपा के मोर्चे में नहीं। चिराग ने पहले ही घोषित कर दिया था कि लोजपा 243 में से 141 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। लोजपा के नारों पर गौर कीजिए-नीतीश की खैर नहीं, मोदी से कोई बैर नहीं। बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट। नीतीश समझ तो चुके होंगे कि दाल में काला है। भाजपा ने कहीं चिराग पासवान के बहाने उन्हें निपटाने का सियासी दांव तो नहीं चल दिया। पर ऐन चुनाव के वक्त वे कर भी क्या सकते हैं? महाराष्ट्र और पंजाब के उदाहरण सामने हैं। जब सबसे पुराने सहयोगियों शिव सेना और अकाली दल से ही भाजपा का मोह टूटते देर नहीं लगी तो जद (एकी) के साथ रिश्ते सनातन रहने की गारंटी कौन दे सकता है।

नीतीश ने तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने के भाजपा के ऐलान के बाद बिहार में भाजपा कार्यकारिणी के लिए तय रात्रि भोज ही रद्द कर दिया था। सुशील मोदी से ऐसी नादानी भरे बयान की उम्मीद नहीं थी कि वे चिराग पासवान को चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम का सहारा नहीं लेने देंगे। चिराग अगर प्रधानमंत्री की सराहना करेंगे तो भला चुनाव आयोग उन्हें कैसे रोक लेगा। सियासी पंडित बेशक कहें कि चिराग ने जोखिम भरा कदम उठाया है। पर याद कीजिए कि रामविलास पासवान ने क्या कहा था। उन्होंने कहा था कि लोजपा की नजर 2025 के चुनाव पर है। वैसे भी नीतीश चिराग को उनकी मांग के मुताबिक 36 सीटें देने को राजी कहां थे। अभी लोजपा के दो ही तो विधायक हैं।

नीतीश के उम्मीदवारों को हरवाकर चिराग भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं। कमाल तो यह है कि जद (एकी) के हिस्से में आई सीटों के कद्दावर भाजपा नेता लोजपा में शामिल हो रहे हैं। रामेश्वर चौरसिया, राजेंद्र सिंह और ऊषा विद्यार्थी आ चुके हैं। सिलसिला अभी जारी रहेगा। साफ है कि भाजपा की रणनीति नीतीश विरोधी लहर और नरेंद्र मोदी की छवि का फायदा उठाकर बिहार में सबसे बड़ी पार्टी के नाते उभरने की है।

जुझारू थे पासवान
रामविलास पासवान का पश्चिमी उत्तर प्रदेश से विशेष लगाव था। बिजनौर के कांग्रेस सांसद गिरधारी लाल का निधन हो गया तो यहां 1985 में उपचुनाव हुआ। पासवान तब चौधरी चरण सिंह की पार्टी लोकदल में थे। आरक्षित सीट पर उन्होंने उपचुनाव लड़ने की इच्छा जताई तो चरण सिंह ने उनके बिहारी होने का वास्ता दिया और कहा कि कांग्रेस बाहरी होने को मुद्दा बना सकती है। पर कांग्रेस ने खुद विदेश सेवा से इस्तीफा देकर राजनीति में आईं बाबू जगजीवनराम की बेटी मीरा कुमार को यहां उम्मीदवार बनाया तो चरण सिंह मान गए। मीरा कुमार भी बिहारी थी। बसपा ने मायावती को मैदान में उतारा। तिकोने मुकाबले में बाजी मीरा कुमार के हाथ लगी। लेकिन पासवान तब मायावती से दोगुना वोट पाने में कामयाब हो गए थे। तब से बिजनौर के लोगों से उनका संपर्क सतत बना रहा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लगाव था तभी पासवान 1987 में हरिद्वार की आरक्षित लोकसभा सीट के उपचुनाव में भी कूद पड़े। हरिद्वार तब यूपी के सहारनपुर जिले का एक शहर था। कांग्रेस ने रामसिंह माड़ेबांस को उम्मीदवार बनाया था। केंद्र और यूपी दोनों जगह कांग्रेस का ही राज था। पासवान तब चंद्रशेखर की जनता पार्टी में थे। चंद्रशेखर ने उन्हें न केवल उम्मीदवार बनाया बल्कि खुद हफ्ते भर हरिद्वार में ही रह उनका प्रचार भी किया। बसपा से यहां फिर मायावती उम्मीदवार थीं। पासवान के समर्थन में तमाम विपक्षी दलों के नेता भी प्रचार करने पहुंचे। फिर भी जीत कांग्रेस की ही हुई। पासवान रेल मंत्री बने तो मेरठ-बिजनौर और हरिद्वार को रेल मार्ग से जोड़ने की पुरजोर कोशिश की पर संयुक्त मोर्चे की सरकार ज्यादा दिन सत्ता में रह ही नहीं पाई।

लघु महाभारत
मध्यप्रदेश में उपचुनाव की जंग जोर पकड़ गई है। एक साथ 28 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव अतीत में किसी सूबे में पहले तो कभी हुआ नहीं। भाजपा ने सभी सीटों के उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। इनमें से 2018 के आम चुनाव में कांग्रेस ने 27 सीटें जीती थी। भाजपा की इकलौती सीट आगर थी, जिस पर मनोहर ऊंटवाल के निधन के कारण उपचुनाव हो रहा है। मजे की बात तो यह है कि 28 में से 16 सीटें अकेले ग्वालियर-चंबल अंचल की ठहरी। साफ है कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर है। इन्हीं सीटों के नतीजे सूबे की भाजपा सरकार का अस्तित्व भी तय करेंगे। इस समय भाजपा के 107 और कांग्रेस के 88 विधायक हैं।

भाजपा को सरकार बचाए रखने के लिए कम से कम नौ सीटों पर जीत की दरकार है। प्रचार में दोनों ही दलों ने न केवल पूरा दमखम लगाया है बल्कि आरोप-प्रत्यारोप की भी सारी सीमाएं लांघी हैं। आमतौर पर उपचुनाव में उम्मीदवार उतारने से परहेज करने वाली मायावती ने भी यहां उम्मीदवार उतारे हैं। कांग्रेस के पक्ष में छत्तीसगढ़, राजस्थान और महाराष्टÑ के मुख्यमंत्री प्रचार करेंगे। कोरोना को देखते हुए हालांकि चुनाव आयोग ने सभी दलों को स्टार प्रचारकों की संख्या सीमित रखने की हिदायत दी है। बिहार से कम दिलचस्पी नहीं है सियासी दलों की इन 28 सीटों के उपचुनाव के नतीजों में। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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