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राजपाट: राजनीति और राजनेता

बिहार का चुनाव चर्चा का विषय है तो उत्तराखंड के सीएम के खिलाफ सीबीआई जांच का मुद्दा भी प्रमुखता से लोगों की जुबां पर है। इस बीच राज्यसभा चुनाव के समय बसपा में बगावत की आवाज उठने से पार्टी सुप्रीमो ने सपा के खिलाफ जोरदार विरोध जता दिया।

राजपाटबिहार और उत्तर प्रदेश में बदल रहे हैं राजनेताओं के बोल।

इस बार मायूस हैं सुशासन बाबू
लालू यादव जब नीतीश पर कटाक्ष करते थे तो उन्हें पलटू राम नाम से पुकारते थे। बेटे तेजस्वी यादव ने भी पलटू चाचा कहकर बिहार के मुख्यमंत्री पर खूब सियासी तीर चलाए। भले मजबूरी वश ही सही पर नीतीश ने खुद को बदला तो जरूर है। विधानसभा चुनाव में पहले दौर की 71 सीटों के मतदान के रुझान का डर कहें या अपनी अलोकप्रियता का अहसास, अपने सुशासन के बूते नहीं वे भी अब प्रधानमंत्री के नाम पर उसी तरह वोट मांग रहे हैं, जैसे भाजपाई मांगते हैं। मजबूरी यह है कि एक तरफ युवा चिराग पासवान उन पर हमलावर हैं तो दूसरी तरफ महागठबंधन से मुकाबला है ही।

भाजपा नीतीश की सरकार में तो हिस्सेदार है पर उनकी 15 साल की उपलब्धियों के नाम पर नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के चेहरे और उनकी लोकप्रियता के सहारे ही वोट मांग रही है। कोरोना के बावजूद पहले चरण में मतदान कम नहीं होना चुनावी पंडितों के लिए पहेली बना हुआ है। कोई राजग की वापसी का अनुमान जता रहा है तो किसी को तेजस्वी यादव के पक्ष में माहौल नजर आ रहा है। त्रिशंकु विधानसभा का अनुमान जताने वाले भी कम नहीं। हैरानी की बात तो यह है कि न जद (एकी) और न भाजपा अपने काम के आधार पर वोट मांग रहे हैं। वे बिहार के मतदाताओं को लालू राबड़ी राज के डेढ़ दशक का खौफ दिखाकर चौथी बार सत्ता में वापसी चाहते हैं।

प्रधानमंत्री ने तो तेजस्वी यादव को जंगलराज का युवराज नाम ही दे दिया। यह बात अलग है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से अपराध तो नीतीश के राज में भी कम नहीं हुए। तेजस्वी ने रोजगार और पूर्णबंदी के दौरान प्रवासी बिहारियों के साथ नीतीश सरकार के उपेक्षापूर्ण बर्ताव को मुद्दा बनाया है। चिराग पासवान के पास खोने के लिए तो कुछ नहीं है पर नीतीश कुमार का सियासी कद तराशने की अपनी मुहिम में भाजपा की सहमति होने का माहौल बनाने में वे सफल दिखते हैं।

दाल में काला
त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीबीआइ जांच का ऐसा क्या डर सता रहा था कि वे उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ चौबीस घंटे बीतने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को फिलहाल राहत तो जरूर दे दी पर पूरे प्रकरण से दाल में कुछ काला होने का संदेश जरूर गया है।

हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पत्रकार उमेश शर्मा के अतीत में झांकें तो इस खेल के पीछे भाजपाइयों का ही दिमाग होने की चर्चा को नकारा नहीं जा सकता। उमेश शर्मा ने ही 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तबके मुख्यमंत्री हरीश रावत का स्टिंग आपरेशन किया था। तब उन्हें भाजपाइयों के साथ-साथ विजय बहुगुणा से भी मदद मिलने के आरोप लगे थे।

भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय से उमेश शर्मा की निकटता जगजाहिर रही है। विजयवर्गीय पहले उत्तराखंड के पार्टी प्रभारी थे। त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार में एक बार शर्मा को जेल जाना पड़ा है। उत्तराखंड पुलिस ने उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज कर रखे हैं। जिस मामले में हाई कोर्ट ने सीबीआइ जांच का आदेश दिया है, उसमें शर्मा ने मुख्यमंत्री पर अपने एक कथित रिश्तेदार के माध्यम से झारखंड का भाजपा प्रभारी रहते 2016 में 25 लाख रुपए घूस लेने का आरोप लगाया है। यह रकम इस कथित रिश्तेदार के बैंक खाते में जमा कराए जाने की बात कही गई है।

त्रिवेंद्र सिंह रावत जब कृषि मंत्री थे तो यह रिश्तेदार उनके मंत्रालय में अहम पद पा गया था। इस कथित रिश्तेदार की तरफ से उमेश शर्मा के खिलाफ दर्ज मामले को पिछले दिनों हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया था। त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ उमेश शर्मा की याचिका के पीछे भाजपा के ही कई धुरंधरों की भूमिका होने के सूबे में चर्चे आम हैं।

रिश्तों की हकीकत
बसपा ने 1993 में सपा से मिलकर यूपी में चुनाव लड़ा था। उसके बाद तीन बार भाजपा से गठबंधन किया। चुनाव पूर्व लोकसभा चुनाव में गठबंधन 2019 में अपनी दुश्मन नंबर एक समाजवादी पार्टी से ही कर सबको फिर चौंकाया। भाई आनंद की कंपनियों पर केंद्रीय एजंसियों का शिकंजा कसा तो मायावती ने अखिलेश से गठबंधन तोड़ दिया। कांग्रेस और सपा पर ही बरस रही हैं लगातार मायावती। अलबत्ता केंद्र सरकार के हर कानून का समर्थन ही किया। अब राज्यसभा की एक सीट जिताने में भाजपा ने जिस अंदाज में बसपा की मदद की है, उससे दोनों की नजदीकियों को लेकर लगाई जा रही अटकलें हकीकत में बदलने लगी हैं।

बसपा के कुछ मुसलिम विधायकों पर सपा ने डोरे डाल दिए तो बहिनजी के सब्र का बांध टूट ही गया। गुरुवार को फिर कहा कि सपा से तालमेल करना उनकी भूल थी। सपा भरोसे लायक पार्टी है ही नहीं। इसे हराने के लिए भाजपा से भी हाथ मिलाने का संकेत तक दे दिया बहिनजी ने। बहिनजी का डर स्वाभाविक है। उन्हें अपने दलित वोट बैंक में सेंध का खतरा भाजपा से उतना नहीं है जितना कांग्रेस और भीम आर्मी से।
(प्रस्तुति: अनिल बंसल)

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