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राजपाट: कांग्रेसी कसरत के मायने

राहुल गांधी ने यह भी सुनिश्चित किया है कि कांग्रेस अध्यक्ष तय करने की प्रक्रिया में उनके परिवार के किसी भी सदस्य की किसी भी रूप में भागीदारी नहीं होगी। यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है लेकिन वास्तव में कांग्रेस का वजूद गांधी परिवार के अलावा कुछ लोगों में सिमट कर रह गया है।

Author नई दिल्ली | July 20, 2019 10:36 AM
कांग्रेस नेता राहुल गांधी। (Source: Express file photo by Prashant Nadkar)

अब तो लगभग तय सा हो गया है कि लंबे अंतराल के बाद कांग्रेस की बागडोर गांधी परिवार से अलग किसी नेता को मिलेगी। राहुल गांधी ने यह भी सुनिश्चित किया है कि कांग्रेस अध्यक्ष तय करने की प्रक्रिया में उनके परिवार के किसी भी सदस्य की किसी भी रूप में भागीदारी नहीं होगी। यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है लेकिन वास्तव में कांग्रेस का वजूद गांधी परिवार के अलावा कुछ लोगों में सिमट कर रह गया है। सालों सत्ता में रगने के चलते कांग्रेस में कार्यकर्त्ता बनने का प्रक्रिया बंद सी हो गई है। कांग्रेस में जुड़ने वाला कुछ ही दिनों में टिकट और पद के जुगाड़ में लग जाता है और कांग्रेस में चाटूकारिता सबसे ज्यादा असरदार है। कांग्रेस के आम जनें की धारणा है कि गांधी परिवार के चलते वे सत्ता में आते रहेंगें, उनका काम केवल अपना संपर्क बढ़ाना रह गया है। इसी चाटूकारिता में पार्टी में गैर गांधी नेता को उभरने नहीं दिया।यह परंपरा नई नहीं है सालों में पीवी नरसिंह राव और सीताराम केसरी गांधी परिवार से अलग पार्टी के मुखिया बने थे। उनकी विदाई ऐसा हुई कि दोबारा कोई पार्टी प्रमुख बनने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।सीताराम केसरी के दफ्तर के सामान सड़क पर फंके गए, नेम प्लेट तोड़ा गया। केसरी यह कहते विदा हुए कि अगर सोनिया जी ईशारा भर कर देंती तो उसी दिन मैं पद छोड़ देता। कहा गया कि लोगों को संदेश देने और गांधी परिवार में अपना नंबर बढाने के लिए कुछ नेताओं कुछ नेताओं ने जानबूझकर ऐसा कराया। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लोकतांतिक करवाने के चक्कर में जितेन्द्र प्रसाद ने सोनिया गांधी के सामने पर्चा क्या भरा, उनका राजनीतिक जीवन ही सिमट कर रह गया। ऐसे में यह तो तय है कि चाहे जिस तरह से नाम तय होगा जो बनेगा वह नाम का ही अध्यक्ष होगा। पार्टी में तो वही होगा जो गांधी परिवार को ठीक लगेगा। कांग्रेस उसी परिवार के भाग्य के भरोसे चलेगी, जो दाएं बाएं करेगा उसे गांधी परिवार तो बाद में पहले उनका वफादार बनने वाले नेता नया केसरी बना देंगे।

घर वापसी पर बवाल
पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों के विधायकों, पाषर्दों और नेताओं में भाजपा की नाव पर सवार होने की होड़ मच गई थी। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुकुल राय और बंगाल मामलों के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय को इस जोड़-तोड़ की राजनीति का सूत्रधार माना जा रहा था। लेकिन दो महीना बीतते न बीतते अब पलायन की धारा उल्टी दिशा में बहने लगी है। हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में जाने वाले दजर्नों पार्षद एक बार फिर तृणमूल में लौट आ गए हैं। तृणमूल कांग्रेस की इस घरवापसी से भाजपा को करारा झटका लगा है। हालांकि उसका कहना है कि कुछ लोगों के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर ऐसे कुछ लोगों की वापसी के साथ ही अगर हाथ से निकली हुई कई नगरपालिकाएं दोबारा तृणमूल के कब्जे में आ जाएं तो भाजपा के राजनीतिक हितों पर फर्क तो पड़ता ही है। इस बीच, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सलाह पर अमल करते हुए तृणमूल का शीर्ष नेतृत्व दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए फूंक-फूंक कर कदम उठा रहा है। बीते सप्ताह ऐसी कम से कम तीन नगरपालिकाओं पर तृणमूल कांग्रेस का दोबारा कब्जा हो गया जो पाषर्दों के पाला बदलने की वजह से भाजपा की झोली में चली गई थीं। भाजपा को तो इससे झका लगा ही है, मुकुल राय के लिए अपनी लाज बचाना मुश्किल हो रहा है। उन तीनों नगरपालिकाओं में राय का खासा असर था। इसी शर्म से बचने के लिए राय ने हाल में दावा किया था कि तृणमूल कांग्रेसए कांग्रेस व माकपा के 107 विधायक पार्टी के संपर्क में हैं और वह लोग शीघ्र भाजपा में शामिल हो जाएंगे। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा ने इन पाषर्दों को डरा-धमका कर तृणमूल कांग्रेस से नाता तोड़ने पर मजबूर किया था। अब गलती सुधारने के लिए यह लोग घरवापसी कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सांसद भतीजे अभिषेक बनर्जी ने तो मुकुल राय को चाइना मेड चाणाक्य करार दिया है। शहरी विकास मंत्री फिरहाद हकीम का आरोप हैं कि ज्यादातर विधायकों और पाषर्दों को बंदूक की नोंक पर भाजपा में शामिल होने पर मजबूर किया गया है।

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