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राजपाट : गुजरात का घमासान

भाजपा पार्टी के अपने सर्वेक्षण में भी अगले गुजरात चुनाव में जीत की उम्मीद पर पानी ही फिरता दिखा है।

Author नई दिल्ली | August 8, 2016 1:06 AM
Vijay Rupani, indian economy, Vijay Rupani news, Gujarat Vijay Rupaniगांधीनगर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ विजय रुपानी। (PTI File Photo)

विजय रूपानी गुजरात के भाजपाई दुर्ग को कैसे बचा पाएंगे? अमित शाह ने अपने चहेते रूपानी को गुजरात का ताज धींगामुश्ती से दिला तो जरूर दिया है पर क्या उनमें नरेंद्र मोदी जैसी सियासी कुशलता और प्रशासनिक क्षमता है। यह सवाल गुजरात में ही नहीं, गुजरात के बाहर भी पूछा जा रहा है। मोदी तो दो धुर विरोधियों अमित शाह और आनंदी बेन पटेल को एक साथ साधने का माद्दा रखते थे। पर रूपानी पर तो पहले दिन से ही अमित शाह का पिछलग्गू होने का ठप्पा लग चुका है। पार्टी विधायक दल का बहुमत भी उनके पक्ष में नहीं था। तभी तो अमित शाह से उलझ गईं आनंदी बेन पटेल। उनको हटाने की पटकथा अमित शाह उनकी ताजपोशी के बाद से लगातार तैयार कर ही रहे थे। हार्दिक पटेल का आरक्षण आंदोलन और दलितों की पिटाई के मुद्दे तो महज बहाना बन गए। अन्यथा गुजरात में गुटबाजी भाजपा को नुकसान जरूर पहुंचाएगी। पार्टी के अपने सर्वेक्षण में भी अगले चुनाव में जीत की उम्मीद पर पानी ही फिरता दिखा है। नितिन पटेल और विजय रूपानी की आपसी खींचतान में सरकार भले चलती रहे पर पार्टी में गुटबाजी थमने से रही। यानी जिस गुजरात ने भाजपा को देश भर में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा कर मोरारजी देसाई के बाद दूसरी बार दिल्ली की सत्ता पर आधिपत्य जमाया है, वही भाजपा के कथित विकास मॉडल की जगहंसाई करा सकता है। रूपानी पार्टी को विधानसभा चुनाव जिता देंगे तो अमित शाह की तूती और ताकत बोलेगी। अन्यथा मोदी उन्हें भी आनंदी बेन पटेल की राह दिखाने से गुरेज नहीं करेंगे।

हाथी के दांत
राहुल गांधी से मिलते ही गद्गद् हो गए कैप्टन अजय यादव। भूपिंदर सिंह हुड्डा पर हमला बोलते हुए पार्टी से इस्तीफा दिया था हरियाणा के पूर्व मंत्री यादव ने। इस्तीफे का एलान भी खुद ही फेसबुक के जरिए कर दिया था। नेतृत्व की आलोचना मकसद रहा होगा तभी तो लिख मारा कि उनका जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी में भरोसा रहा है। राहुल को भनक लगी थी कि वे भाजपा के जाल में फंस सकते हैं। तभी तो बुलावा भेज दिया। कैप्टन साहब तो तैयार बैठे थे। फौरन हाजिर हो गए दिल्ली दरबार में। अपने पार्टी उपाध्यक्ष से मुलाकात हुई तो हृदय परिवर्तन भी तपाक से कर बैठे। बाहर आकर एलान कर दिया कि राहुल के कहने पर वापस ले रहे हैं अपना इस्तीफा। चार दिन में ही निकल गई कैप्टन के दिमाग से हुड्डा के विरोध की हवा। अब तो हर कोई यही कह रहा है कि गीदड़ भभकी दी थी यादव ने। राहुल गांधी के बुलावे का इंतजार ही कर रहे होंगे। लेकिन पार्टी के भीतर पनप रही जिन परिस्थितियों के विरोध में बगावत की सोची थी, उनमें तो कोई बदलाव दिख नहीं रहा। तो क्या खुद ही शिकार हो गए बेचारे अपने छोड़े हुए तीर से।

खतरे की घंटी
पंजाब में आम आदमी पार्टी ने विधानसभा चुनाव के अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की तो असंतोष सतह पर आ गया। मंशा यही होगी केजरीवाल की कि उम्मीदवारों को तैयारी के लिए अच्छा वक्त मिल जाएगा। लोगों के बीच पहचान के संकट का सामना करने से बच जाएंगे। पर जिनके नाम नदारद थे वे आपा खो बैठे। हरदीप सिंह कंगड़ा ने तो पैसे के बदले टिकट देने तक का आरोप लगा दिया। और तो और पंजाब के समन्वयक सुच्चा सिंह छोटेपुर भी खफा नजर आए। इससे तो यही संकेत मिला कि चुनावी नजरिए से दौड़ में सबसे आगे दिख रही पार्टी भी गुटबाजी से अछूती नहीं है। भविष्य में और सूचियां आएंगी तो यह असंतोष भी और बढ़ेगा। तो क्या सूबे में तीसरे विकल्प का सपना संजो रही पार्टी के लिए असली चुनौती का वक्त अब आया है। नेताओं में एका नहीं और प्रभारी संजय सिंह दिल्ली में बैठ कर सूबे की जमीनी हकीकत का सही आकलन कैसे कर सकते हैं। हां, प्रचार और हवा बनाने के मामले में जरूर ऊंचे पायदान पर दिख रही है केजरीवाल की पार्टी। पर चुनाव तक कैसे कायम रहेगा यह माहौल, इसी दुविधा में चैन से सो भी नहीं पा रहे पार्टी के क्षत्रप।

विवाद दर विवाद
हरक सिंह रावत का विवादों से पुराना नाता रहा है। कभी भाजपाई थे रावत। फिर जयश्रीराम को भुला सत्ता के लिए जय भीम का नारा लगा बसपा के हाथी पर सवार हो गए। यह सवारी रास नहीं आई तो कांग्रेस का दामन थाम लिया। हरीश रावत की सरकार गिराने के खेल में शरीक होना भारी पड़ा। एक तो भाजपाई चोला फिर पहनना पड़ गया ऊपर से विधानसभा की सदस्यता भी गंवा बैठे। मंत्री पद तो खैर जाता ही। भाजपा ने मजबूरी में अपना तो लिया पर अब बोझ ही समझ रही होगी उन्हें। राम लहर में जब कल्याण सिंह 1991 में अविभाजित यूपी के मुख्यमंत्री बने थे तो हरक सिंह रावत को भी पर्वतीय राज्य मंत्री का ओहदा दिया था। पर विवादों में घिरने के कारण कुर्सी छिन गई और लाटरी खुली रमेश पोखरियाल निशंक की। पिछले 16 साल से कांग्रेस में थे और नारायण दत्त तिवारी की सरकार में भी मंत्री पद पा गए थे। यह बात अलग है कि 2003 में असम की एक युवती ने उन पर अपने बच्चे का बाप होने का आरोप लगा रावत की फजीहत करा दी। मंत्री पद से तो छुट्टी हुई ही, सीबीआइ जांच का शिकंजा भी कस गया। डीएनए जांच ने बरी कराया। पर तिवारी ने दोबारा मंत्री फिर भी नहीं बनाया। हां, 2007 में भाजपा की सरकार आई तो कांग्रेस विधायक दल के नेता जरूर बन गए। 2012 में विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने का विरोध किया था। पर वक्त का फेर देखिए कि अब उन्हीं के पिछलग्गू हैं। 2012 में जिस हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनवाने की पैरवी कर रहे थे अब उन्हीं के कट्टर विरोधी हैं। रावत ने उनके खिलाफ कई जांच तो बिठाई ही हैं, 2003 में यौन शोषण का आरोप लगाने वाली असम की युवती ने दिल्ली में फिर दर्ज करा दिया हरक सिंह के खिलाफ दुष्कर्म का मामला। गनीमत है कि अपनी तिकड़म से हफ्ते भर के भीतर ही रजामंद भी कर लिया आरोप लगाने वाली युवती को बयान बदलने के लिए। पर छवि पर लगे दाग तो और गहरे कर ही लिए।

हां में हां
लालू यादव की हां में हां क्यों न मिलाएं नीकु। नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री और लालू यादव के ‘छोटे भाई’ नीतीश कुमार। बड़े भाई की तो सलाह भी आदेश की तरह लेने की राय दे गए हैं अपने यहां सयाने। फिर नीकु को तो उनके बड़े भाई का आशीर्वाद भी है। अन्यथा बिहार का राजपाट कहां मिल सकता था। पिछले दिनों लालू ने बोल दिया कि बिहार में सरकारी नौकरी पहले बिहारियों को मिलनी चाहिए। कम से कम बीस फीसद तक तो जरूर। नीकु ने भी इसका समर्थन कर दिया। वैसे हकीकत भी यही है कि ज्यादातर राज्यों में सरकारी नौकरी स्थानीय लोगों को ही ज्यादा मिलती है। दूसरे सूबों के लोगों को कम। पर भेदभाव वाली यह हकीकत कोई अपनी जुबान पर नहीं लाता। लाएगा तो गलत संदेश जा सकता है। दूसरे सूबों में भी तो बिहारियों की कमी नहीं। वहां उन्हें क्यों मिलेगी फिर सरकारी नौकरी। बिहार में सबके लिए रोजगार होता तो बाहर जाना ही क्यों पड़ता? नीकु ने जब से सत्ता संभाली है बिहारियों का स्वाभिमान जगाने में जुटे हैं। एक दशक से कहते आ रहे हैं कि अब बिहारी कहलाने में शर्म नहीं गर्व होता है। बिहार में बदलाव आया है। विकास भी खूब हुआ है। ऐसे काम हुए हैं जिन्हें दूसरे सूबे भी करना चाहेंगे। दूसरे सूबे में रोजगार के लिए गए बिहारी वापस आ जाएंगे। लालू जब अपने छोटे भाई के विरोधी थे तो अक्सर सवाल पूछते थे कि कितने बिहारी वापस आए। नीकु के पास तब कोई जवाब नहीं होता था। अब लालू भी नीकु की भाषा बोलने लगे हैं तो नीकु का हौसला बढ़ा है। वे तो पहले से ही बिहारियों का स्वाभिमान जगा रहे हैं। लोकप्रियता पाने के लिए ऐसे मुद्दे बड़े कारगर साबित होते हैं।

बेबात बतंगड़
बड़ा मशहूर फिल्मी गीत है- नाम वाम में क्या रखा है? पर अपने राजनीतिकों को कतई नहीं समझ आया यह गीत। वे तो नाम के ही चक्कर में सारा गुलगपाड़ा करते हैं। कभी अपने नाम के लिए तो कभी पहले से चले आ रहे किसी नाम को बदलने के लिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपवाद नहीं हैं। सूबे में रोजगार के अवसर मुहैया कराने की चिंता छोड़ सूबे का नया नामकरण करने में ही जुट गईं। फिलहाल यही बहस अनवरत जारी है कि नाम पश्चिम बंगाल की जगह बंगो हो या बांग्ला। ममता के मंत्रिमंडल ने अलबत्ता नाम बदलने के फैसले पर तो मंजूरी की मुहर लगा ही दी है। हां, दोनों में से कौन सा नाम ज्यादा सटीक है, यह तय करने का जिम्मा ममता को ही सौंप दिया है। विवाद बंगला नाम को लेकर है। अन्यथा अंग्रेजी में तो नाम बंगाल तय हो ही गया है। यों नाम बदलने के पीछे बड़ा रोचक तर्क दिया है ममता ने। पश्चिम बंगाल हो या वेस्ट बंगाल, दोनों ही वर्णमाला में देर से शुरू होते हैं। लिहाजा जब भी दिल्ली में तमाम राज्यों के मसलों को लेकर कोई बैठक या सम्मेलन होता है तो वर्णमाला क्रम के हिसाब से सूबे की बारी देर से आती है। सिर्फ बंगाल रहेगा तो ए नाम से शुरू होने वाले सूबों के फौरन बाद आ जाएगी बी नाम वाले बंगाल की पारी। पर यह दलील किसी के गले नहीं उतर रही। देश के बंटवारे से पहले तो बंगाल एक ही था। बंटवारे के बाद पूर्वी बंगाल पाकिस्तान में चला गया। जो अब बांग्लादेश है। फिर क्यों भारत में बचे पश्चिम बंगाल नाम को अब तक ढोते रहे हुक्मरान। ममता की कवायद से भाजपा सहमत नहीं। उसने तो विरोध का एलान भी कर डाला है। नतीजतन ममता के सामने मुश्किल है। विधानसभा में नाम बदलने का प्रस्ताव पारित हो भी जाए तो क्या होगा? जब तक लोकसभा इसे अपनी मंजूरी नहीं देगी तो मामला अधर में ही रहेगा। हैरानी की बात तो यह है कि ममता के हर फैसले का अंधविरोध करने वाली माकपा को भी नाम बदलने के फैसले पर कोई एतराज नहीं। फिलहाल तो उन्हें बंगो और बांग्ला की दुविधा से उबरना है। रही केंद्र के सहयोग और समर्थन की बात तो मोदी सरकार के लाए जीएसटी के समर्थन की एवज में वे भी तो कुछ चाहेंगी ही। यह बात अलग है कि नाम बदलने से भी लोगों की आदत तो बदलती नहीं। कोलकाता तो वर्षों बाद भी नहीं चढ़ पाया है देश के लोगों की जुबान पर। ज्यादातर तो अब भी कलकत्ता ही कहते हैं।

बेबाकी बाबू की
नौकरशाही की सूरत बदलने का भरोसा दिया है राजस्थान के नए मुख्य सचिव ने। ओपी मीणा ठहरे खांटी मिजाज वाले नौकरशाह। जबकि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कार्यशैली ठहरी एकदम अंग्रेजी। लिहाजा नौकरशाही को अब डबल रोल की आदत डालनी पड़ेगी। मुख्य सचिव की बैठक में हिंदी में बोलने लगे हैं मुख्यमंत्री की बैठक में अंग्रेजी झाड़ने वाले अफसर। हालांकि ज्यादातर की इंग्लिश आमतौर पर हिंगलिश ही होती है। मुश्किल नए मुख्य सचिव के आने के बाद दक्षिण मूल वाले अफसरों को ज्यादा हो रही है। मीणा से पहले सीएस राजन थे सूबे की नौकरशाही के मुखिया। दक्षिण भारतीय होने के बावजूद हिंदी और अंग्रेजी दोनों पर ही थी उनकी अच्छी पकड़। पर मीणा तो देहाती ठहरे। राजस्थानी शैली में रखी गई उनकी बात पर एक बार तो मुख्यमंत्री लोटपोट हो गई थीं। बेबाकी से बोल दिया था- मैडम आप अफसरों को ऐसी अंग्रेजी में डांटती हो जो हमारी समझ में आती ही नहीं। समझने के लिए अफसर बाद में शब्दकोश खंगालते हैं तब समझ आती है बात। लिहाजा आप ऐसी अंग्रेजी में बात कहो जो सबको आसानी से समझ आ जाए। अपनी बात के समर्थन में कोई पुराना किस्सा भी दोहरा दिया। बैठक में मौजूद अफसर भी अपनी हंसी रोक नहीं पाए। पर मीणा की भी अपनी हैसियत है। दो भाई आईपीएस रह चुके हैं। जिनमें से एक नमो नारायण मीणा तो पिछली यूपीए सरकार में मंत्री भी रहे थे। दूसरे हरीश मीणा इस समय भाजपा के सांसद हैं। एक और भाई बीएस मीणा महाराष्ट्र कैडर के आईएएस थे। अखिल भारतीय सेवाओं में रिश्तेदारों की तो खैर भरमार है ही।

जी का जंजाल
हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर संकट और गहरा गया है। पत्नी प्रतिभा सिंह को प्रवर्तन निदेशालय ने पूछताछ के लिए बुला भेजा है। इस हिसाब से तो अगले कुछ दिन दिल्ली में ही होगा वीरभद्र का पड़ाव। मुश्किल उनके एलआइसी एजंट की गिरफ्तारी ने बढ़ाई है। यह एजंट काफी समय से न्यायिक हिरासत में है। अदालत ने उसकी जमानत अर्जी को कई बार खारिज कर दिया है। इसी से व्यग्र हैं प्रतिभा सिंह। गिरफ्तारी की आशंका ने पंडितों की शरण में पहुंचा दिया है। पूजापाठ से लेकर टोने-टोटके तक का सहारा लिया जा रहा है। पर प्रवर्तन निदेशालय के बुलावे को कब तक अनदेखा करेंगी। तीन बार तो कर दिया। इस बार अदालत की हिदायत ने टालमटोल मुश्किल बना दी है। जांच कार्य में सहयोग देने और नौ अगस्त को निदेशालय के सामने पूछताछ के लिए पेश हो जाने का फरमान भी सुनाया है। लिहाजा अब बहानेबाजी से पासा उलटा पड़ सकता है। हां, प्रवर्तन निदेशालय ने पूछताछ के बहाने बुला कर गिरफ्तार किया तो सूबे में कोहराम मच सकता है। सियासी समीकरण तो खैर प्रभावित होंगे ही, बेशक प्रतिभा अभी किसी पद पर नहीं हैं। पर उनके बहाने उनके मुख्यमंत्री पति की घेरेबंदी तो करेगा विपक्ष। लिहाजा तमाम कानूनी दांवपेचों पर माथा-पच्ची चल रही है। आय से ज्यादा संपत्ति के इस मामले से अब आसानी से पीछा छूटता नजर नहीं आता मुख्यमंत्री और उनके परिवार का।

सियासी पैंतरे
तो क्या प्रेम कुमार धूमल को भी आनंदी बेन पटेल की राह चलने को मजबूर किया जाएगा। हिमाचल के भाजपाई आजकल इसी सवाल को लेकर ऊहापोह में हैं। अगले विधानसभा चुनाव के वक्त हालांकि 74 के ही होंगे धूमल। पर विरोधी खेमा तो उम्र का पैमाना लिए खड़ा है। उन्हें किसी सूबे का राज्यपाल बना शिमला से रुखसत करने की अटकलें शुरू हो गई हैं। शायद इसी बहाने जगत प्रकाश नड्डा धुरी बन रहे हैं अब विधायकों की। कई भाजपा विधायकों ने तो आलाकमान को पत्र लिख सुझाव भी दे दिया है कि अगला चुनाव पार्टी को नड्डा के नेतृत्व में लड़ना चाहिए। धूमल इन हरकतों पर मौन हैं। अपने पराए की पहचान फिर भी कर ही रहे हैं। रहीम ने दुनियादारी को इन दो पंक्तियों में रेखांकित कर दिया था- रहिमन विपदा हो भली जो थोरे दिन होय, हित-अनहित या जगत में जान परत सब कोय। धूमल खेमा फिलहाल उम्र की अड़चन को यह कह कर नकार रहा है कि अभी तो बहत्तर ही पूरे किए हैं धूमल ने। फिर कैसे अभी से उन पर लागू हो जाएगा 75 के बाद संन्यास का अघोषित फैसला।

शेर की सवारी
तरक्की में आरक्षण का मुद्दा अब यूपी तक सीमित नहीं रह गया है। मध्यप्रदेश में भी हलचल बढ़ाई है सियासी हलकों में इस मुद्दे ने। मसलन, अमर सिंह पंजाब छोड़ इस सूबे में आ धमके हैं। दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते उनके प्रमुख सचिव थे। रिटायर होकर अपने वतन चले गए थे दस साल पहले। मुख्यमंत्री शिवराज चौहान खुद भी कूद पड़े हैं आरक्षण समर्थक अभियान के समर्थन में। लोगों को दिग्गी के दूसरे कार्यकाल की याद ताजा हो गई है। दिग्गी के दौर में दलित आईएएस अमर सिंह ने उठाया था तरक्की में आरक्षण का मुद्दा। अब दलित राजनीति की धुरी प्रमुख सचिव जेएन कंसोटिया बन गए हैं। पर इस चक्कर में सरकारी कर्मचारी भी दोफाड़ हैं। सामान्य जाति, पिछड़ा वर्ग अधिकारी कर्मचारी मोर्चा भी किसी आईएएस अफसर को नेतृत्व के लिए खोज रहा है। मुख्यमंत्री ने तरक्की में आरक्षण की मांग का समर्थन करने से पहले इस मामले में आए अदालती फैसलों को भी याद नहीं रखा। विज्ञान का नियम है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। फिर क्यों आग से खेलने का जोखिम उठाया है शिवराज चौहान ने। भूल रहे हैं कि दिग्विजय सिंह को महंगी पड़ गई थी आरक्षण की यह सियासत।

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