ताज़ा खबर
 

राजपाट: राजनीति के रंग

मुख्यमंत्री पद की रामविलास पासवान की हसरत तो अधूरी ही रह गई पर उनके बेटे चिराग 2025 के हिसाब से अपनी रणनीति बना चुके है।

Author Updated: October 17, 2020 4:07 AM
हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बीजपी में आईं साउथ इंडियन अभिनेत्री खुशबू और एलजेपी नेता चिराग पासवान।

ग्लैमर का आसरा
खुशबू सुंदर अब भाजपा में शामिल हो गई हैं। उसी भाजपा में जिसके नेता कल तक दक्षिण भारतीय फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री को उनके वास्तविक नाम नखत खान से बुलाते थे। खुशबू ने 200 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। वे महिलाओं के कौमार्य संबंधी विवादास्पद बयान से 2005 में पहली बार देश भर में सुर्खियों में आई थीं। सालों उन्हें कई मुकदमों से भी जूझना पड़ा। सियासी पारी की शुरुआत 2010 में करुणानिधि की द्रमुक से की थी। पर एमके स्टालिन से मतभेद के चलते द्रमुक छोड़ 2014 में कांग्रेस में शामिल हुई। छह साल तक सक्रिय भूमिका के बाद जब कांग्रेस में खुद को उपेक्षित पाया तो उसी भाजपा के झंडे तले आ गई जिसे कल तक पानी पी-पीकर कोसती थी। भाजपा को भी तो तमिलनाडु में पांव जमाने हैं।

कोयंबटूर से आगे कभी अपना विस्तार नहीं कर पाई इस सूबे में भाजपा। हां, 1998 में जयललिता से गठबंधन के चलते जरूर तीन लोकसभा सीटों पर जीत मिल गई थी। कोयंबटूर में सीपी राधाकृष्णनन का जलवा तो जरूर कायम रहा पर बाकी इलाकों में भाजपा की दाल कतई नहीं गल पाई। जयललिता के बाद अब भाजपा को उम्मीद जगी है कि वह द्रमुक को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में टक्कर देगी। पार्टी के सूबेदार एल मुरुगन ने 25 सीटों का लक्ष्य रखा है। पदाधिकारियों को उसी तर्ज पर लालच भी दिया है जैसे द्रमुक और अन्ना द्रमुक अपने पदाधिकारियों को देते आए हैं। जहां भाजपा जीतेगी वहां के पदाधिकारियों को पार्टी इनोवा कार भेंट करेगी। यानी तमिलनाडु की राजनीति के रंग में अब भाजपा भी खुद को रंगने की राह पर चल पड़ी।

द्रमुक से आए वीपी दुरैस्वामी को पहले ही उपाध्यक्ष का पद दे दिया था। दरअसल, भाजपा ने देश के बाकी सूबों में तो अपना खूब विस्तार कर लिया पर कर्नाटक को छोड़ दक्षिण के बाकी राज्योें में वह अभी कमजोर है। तमिलनाडु और केरल में तो उसका वजूद नाममात्र का ठहरा। तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में भी वह मुख्यधारा की पार्टी होने से अभी दूर है। ऐसे में खुशबू सुंदर के सहारे ही सही, उपस्थिति तो दिखेगी ही। यह बात अलग है कि कांग्रेस जैसी स्वच्छंदता और भूमिका तो भाजपा में भी मिलने से रही खुशबू को। कांग्रेसी अब यह कहकर खुशबू की खिल्ली उड़ा रहे हैं कि फायदा तो भाजपा को उनसे जरूर होगा। भले दो वोट का ही सही। यानी एक उनका और दूसरे उनके पति का।

एक अनार कई बीमार
उत्तराखंड की इकलौती राज्यसभा सीट के लिए सूबे के तमाम भाजपा नेताओं ने लाबिंग शुरू कर दी है। कांग्रेस के राज बब्बर का कार्यकाल पूरा हो जाने के कारण खाली हो रही इस सीट का चुनाव नौ नवंबर को होगा। जहां तक राज बब्बर का सवाल है 14 मार्च 2015 को उपचुनाव से राज्यसभा पहुंचने के बाद उन्होंने इस सूबे की कभी सुध ली ही नहीं। भाजपाइयों ने उनके लापता होने के पोस्टर भी लगाए पर कोई असर नहीं दिखा। राज बब्बर को यह सीट झोली में परोसकर तबके कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने धुर विरोधी विजय बहुगुणा का पत्ता साफ करने की मंशा से दी थी। नाराज बहुगुणा ने उसके बाद कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया था। इस बार फिर बहुगुणा की इस सीट पर नजर है।

बहुगुणा ही क्यों दावा तो सूबे के पार्टी प्रभारी रहे श्याम जाजू ने भी किया है। इच्छुक सूबे के कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक भी बताए जा रहे हैं। उनके दावे पर हर कोई हैरान है। पर करीबी बता रहे हैं कि सूबे की सरकार में तो ज्यादा दबदबा है नहीं उनका सो केंद्र का रुख करना चाहते हैं। उनकी हरिद्वार सीट से संसद में पहुंचे रमेश पोखरियाल निशंक केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री हैं। कौशिक ने लोकसभा के पिछले तीनों चुनाव में हरिद्वार से टिकट मांगा था पर नहीं मिला। चर्चा है कि मदन कौशिक की पैरवी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ही नहीं पार्टी के राष्टÑीय संगठन मंत्री शिवप्रकाश भी कर रहे हैं। उधर कांग्रेस की तरह भाजपा में भी अपनी उपेक्षा को बहुगुणा किस रूप में लेंगे, यह देखना रोचक होगा।

भितरघात की सियासत
जैसे-जैसे पहले चरण के मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, बिहार का चुनावी दंगल रोचक दिखने लगा है। राजद का कांग्रेस और वामपंथी दलों से गठबंधन है तो राजग में कुल चार दल हैं। मांझी की हिंदुस्तान अवाम मोर्चा ने जद (एकी) से सीटें ली हैं तो भाजपा ने वीआइपी पार्टी को साथ लिया है। लोजपा को नीतीश कुमार भले वोट कटवा पार्टी बताए पर चिराग पासवान ने सोच समझकर गोटियां बिछाईं हैं। पिछले दो चुनाव उनके पिता ने गठबंधन करके लड़े थे। एक बार दो सीटें हाथ आई तो एक बार महज तीन। लेकिन जब 2005 में अकेले 178 सीटों पर लड़े थे तो 29 सीटें पाई थी।

मुख्यमंत्री पद की रामविलास पासवान की हसरत तो अधूरी ही रह गई पर उनके बेटे चिराग 2025 के हिसाब से अपनी रणनीति बना चुके है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल रहे जबकि नीतीश कुमार पर तमाम वार कर रहे हैं। लोजपा का तो नारा ही है-मोदी से कोई बैर नहीं। नीतीश की खैर नहीं। ऊपर से खुलेआम यह दावा अलग कि चुनाव बाद भाजपा और लोजपा की साझा सरकार बनेगी। भाजपा और जद (एकी) साथ तो जरूर हैं पर दोनों ही नंबर वन की दौड़ में शामिल हैं। महाराष्टÑ में भाजपा ने शिवसेना के साथ जो बर्ताव किया, नीतीश उससे चौकस क्यों न होंगे?ं (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजपाट: बिहार का चुनाव और लोजपा की रणनीति
2 राजपाट: सियासतदानों की गतिविधियां
3 राजपाट: बिहार चुनाव और उत्तराखंड की राजनीति
IPL 2020
X