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राजपाट: सियासी चालबाजी

निर्दलीय, बसपा और सपा के बाकी विधायकों को जोड़कर कमलनाथ मुख्यमंत्री बने। शिवराज चौहान तो नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाए गए पर दखल उन्होंने सूबे की सियासत में जारी रखा। यह बात अलग है कि अमित शाह को कैलाश विजयवर्गीय ज्यादा भाए। जो शुरू से दावा करते रहे हैं कि जब चाहें, वे सूबे की कमलनाथ सरकार को गिरा सकते हैं।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह। (फाइल फोटो)

सियासत कहने को लोक कल्याण का माध्यम होती है। पर मकसद जब सत्ता में आना हो तो साम-दाम-दंड-भेद सभी उपाय काम आते हैं। सियासी तिकड़में साजिशों से भी गुरेज नहीं करती। मध्य प्रदेश की कांग्रेसी सियासत इसका ज्वलंत उदाहरण है। सूबे में कमलनाथ की सरकार जैसे-तैसे ही चल रही है। बहुमत तो राजस्थान में भी अशोक गहलोत का ज्यादा नहीं था पर उन्होंने बसपा के छह विधायकों को पार्टी में लेकर और निर्दलियों की मदद से अपनी स्थिति कमलनाथ से बेहतर बना रखी है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस पहले नंबर की पार्टी तो जरूर बन गई पर चुनावी नतीजों में बहुमत से पिछड़ गई। सदन में बहुमत के लिए 116 विधायकों की जरूरत थी पर कांग्रेस को कामयाबी 114 सीटों पर और भाजपा को 107 पर ही मिल पाई।

निर्दलीय, बसपा और सपा के बाकी विधायकों को जोड़कर कमलनाथ मुख्यमंत्री बने। शिवराज चौहान तो नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाए गए पर दखल उन्होंने सूबे की सियासत में जारी रखा। यह बात अलग है कि अमित शाह को कैलाश विजयवर्गीय ज्यादा भाए। जो शुरू से दावा करते रहे हैं कि जब चाहें, वे सूबे की कमलनाथ सरकार को गिरा सकते हैं। मुश्किल यह है कि विपक्ष से ज्यादा कांग्रेस को खतरा अपने भीतर से है। सूबे की इकलौती छिंदवाड़ा लोकसभा सीट कमलनाथ ही बचा पाए। गुना में ज्योतिरादित्य और भोपाल में दिग्विजय दोनों ही हार गए। कमलनाथ के लिए इन दोनों धुरंधरों की मनुहार आसान नहीं। ज्योतिरादित्य का दर्द यही है कि वे कहां तो मुख्यमंत्री पद का ख्वाब देख रहे थे और कहां उन्हें अब पार्टी में कोई पूछ भी नहीं रहा। प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए कब से और कितने जतन कर चुके हैं। पर कमलनाथ अड़ंगा लगाए हैं। ताजा संकट राज्यसभा की दावेदारी से बढ़ा है।

तीन सीटों का चुनाव होना है। कांग्रेस के हिस्से में दो आने के आसार हैं। एक सीट दिग्विजय चाहते हैं तो दूसरी पर कमलनाथ ने प्रियंका गांधी को लाने की मंशा जताई थी। इससे ज्योतिरादित्य का मुंह फूलना स्वाभाविक था। विरोधी खेमा उन्हें मध्य प्रदेश के बजाए छत्तीसगढ़ से राज्यसभा भेजने का सुझाव दे रहा है। पर ज्योतिरादित्य को लगता है कि इसे स्वीकार किया तो सूबे की सियासत से वे बाहर ही हो जाएंगे। इसी चक्कर में ज्योतिरादित्य और दिग्विजय दोनों ही पैंतरेबाजी कर रहे हैं। अपने-अपने कट्टर समर्थक विधायकों के कंधे पर बंदूक रख आलाकमान पर दबाव बनाने की मंशा से। ऊपर से आरोप भाजपा पर कि वह विधायकों की खरीद-फरोख्त कर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश में है। हालांकि अभी तक भाजपा की तरफ से ऐसा कोई खेल होता दिखा नहीं। दरअसल कांग्रेस में जब से राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ा है, अनिश्चितता के बादल छंट ही नहीं पाए। मध्य प्रदेश ही क्यों, और भी कई राज्यों में सतह पर है पार्टी नेताओं की आपसी फूट। उस पर भी आलाकमान की बेबसी काबिले गौर है।

नया दौर
राजस्थान में अब नए नेतृत्व को उभारने के एजंडे पर काम कर रहा है भाजपा आलाकमान। सत्ता से बेदखली के बाद वसुंधरा राजे को अपनी पार्टी के भीतर भी उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। सब वक्त का फेर है। सदा किसी के दिन एक से नहीं रहते। वसुंधरा की तूती बोलती रही सूबे की सियासत में पूरे डेढ़ दशक तक। आलम यह था कि 2014 में प्रधानमंत्री के शपथ समारोह से गैरहाजिर रहने वाले भाजपा नेताओं में वसुंधरा ही अकेली थीं। सूबे का पार्टी संबंधी कोई फैसला उनकी सहमति के बिना मुमकिन था ही नहीं। पर 2018 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपाईयों ने ही नारा लगाया-वसुंधरा तेरी खैर नहीं, पर मोदी से बैर नहीं। तो आलाकमान को अंदाज हो गया कि अब कठोर निर्णय लिया जा सकता है। विधानसभा चुनाव की हार को पार्टी के बजाए वसुंधरा की हार माना गया, क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष का सूपड़ा ही साफ हो गया।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत भी अपनी जोधपुर सीट नहीं बचा पाए। वसुंधरा ने 2013 में 200 में से 163 सीटें जीती थीं। पर पांच साल बाद वे बहुमत भी नहीं जुटा पाईं। प्रकाश जावडेकर ने अंतिम समय संघ और वसुंधरा से नाराज नेताओं-कार्यकर्ताओं को सक्रिय नहीं किया होता तो और बुरी हार होती। बहरहाल आलाकमान ने वसुंधरा का मुंह ताकना छोड़ उनके विरोधी नेताओं को वैकल्पिक नेतृत्व के तौर पर उभारने में दूरगामी हित समझा। वसुंधरा के तमाम प्रयासों के बावजूद उनके पुत्र को वरिष्ठता के बावजूद केंद्र में मंत्री पद नहीं दिया। मोदी मंत्रिमंडल में उन्हें मंत्री बनाया, जो वसुंधरा को नहीं भाते। फिर बची-खुची कसर वसुंधरा की सलाह लिए बिना युवा जाट विधायक सतीश पूनिया को पार्टी की कमान सौंप दी। कोटा के ओम बिरला को लोकसभा अध्यक्ष जैसा अहम दायित्व सौंप वसुंधरा को संकेत दे दिया कि अब उनके दिन लद गए। बदलाव की हवा का रुख भांप अब वसुंधरा खेमे के नेता भी पाला बदल रहे हैं। जो संघ परिवार को ठेंगा दिखा रहे थे वे अब खुद को पुराना स्वयं सेवक बता अपनी निष्ठा साबित कर रहे हैं। साफ है कि किसी एक नेता की अब मोहताज नहीं रहेगी सूबे में भाजपा।

छुपे रुस्तम
ओड़ीशा के मुख्यमंत्री के नाते नवीन पटनायक ने इसी गुरुवार को लगातार 20 साल पद पर बने रहने का रेकार्ड बना दिया। इनके पिता बीजू पटनायक बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। दो बार ओड़ीशा के मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में मंत्री भी। उनका निधन 1997 में हुआ था। तब तक नवीन पटनायक सियासी दुनिया के लिए अनजान थे। पिता की मृत्यु के बाद अचानक उनकी विरासत संभाली। जनता दल टूटा तो 1998 में अपनी अलग पार्टी बीजू जनता दल बनाई। वाजपेयी सरकार में मंत्री बने। फिर विधानसभा चुनाव हुआ तो पहली बार पांच मार्च 2000 को मुख्यमंत्री बने और तब से सत्ता पर मजबूती से कायम हैं। शुरुआत भाजपा के साथ राजग में शामिल रहते की। फिर गठबंधन तोड़ा और अकेले चुनावी जंग में कूदे। विवाह नहीं किया। यहां तक कि शुरू में तो उड़िया भी ठीक से नहीं बोल पाते थे। पर सियासी मंत्र ऐसे पढ़े कि कोई न टिक पाया मुकाबले में।

एक तो आज के चर्चित नेताओं वाली आत्मप्रशंसा की बीमारी नहीं पाली। दूसरे खुद को केवल ओड़िशा के लोगों की सेवा तक सीमित रखा। न केंद्र की सियासत के पचड़े मेंं फंसे और न प्रधानमंत्री पद का ख्वाब ही देखा। सियासी सफर में कई साथी साथ आए तो कई साथ छोड़ गए। पर नवीन ने किसी को जरूरत से ज्यादा भाव नहीं दिया। गरीबों के सच्चे रहनुमा की ऐसी छवि बना रखी है कि खुद को राजनीति का चाणक्य समझने वाले भी उनके चक्रव्यूह को सारे जतन करके भी नहीं भेद पाए।

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