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राजपाट: सियासतदानों की गतिविधियां

राजनीति में अब न कोई दूध का धुला दिखता है और न अपने कहे पर खुद ही अमल करता है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी इसी परिधि में आते हैं। सूबे में जब पूर्व प्रधानमंत्री और जद (एस) के मुखिया एचडी देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी की सरकार थी तो येदियुरप्पा उन पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते थे। आज यही आरोप कर्नाटक में येदियुरप्पा पर लग रहे हैं।

Author नई दिल्ली | October 3, 2020 12:38 AM
एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत।

सियासी इबारत नई

मध्यप्रदेश अब सियासी अजूबों के मामले में हरियाणा को पछाड़ चुका है। अस्सी के दशक में आयाराम-गयाराम की नई सियासी इबारत हरियाणा ने लिखी थी। अब मध्यप्रदेश दल-बदल की अनूठी कहानियों का केंद्र बना है। शिवराज चौहान महीने भर बिना कैबिनेट मुख्यमंत्री रहे। पहली बार किसी सरकार में चौदह मंत्री ऐसे हैं जो विधानसभा के सदस्य नहीं हैं।

सूबे में 28 सीटों के लिए उपचुनाव की घोषणा हो चुकी है। मतदान तीन नवंबर को होगा और नतीजे आएंगे दस नवंबर को। लेकिन दो मंत्री चुनाव नतीजे आने से पहले ही मंत्री पद गंवा चुके होंगे। जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट और परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत दोनों ही ज्योतिरादित्य सिंधिया के खासमखास ठहरे। तभी तो 21 अपै्रल को जब शिवराज चौहान ने अपने मंत्रीमंडल का पहला विस्तार किया तो पांच मंत्री बनाए। सिंधिया के हिस्से आए दो पद। जो उन्होंने सिलावट और राजपूत के लिए मांगे थे। दोनों की सदन के सदस्य हुए बिना अधिकतम छह माह तक मंत्री रहने की अवधि बीस अक्तूबर को खत्म हो जाएगी।

साफ है कि जब उपचुनाव में वोट मांगेंगे तो मंत्री नहीं रहेंगे। सिलावट को सांवेर सीट पर कांग्रेस के प्रेमचंद गुडडू और राजपूत को सुरखी में पारुल साहू चुनौती दे रही हैं। कुल चौदह मंत्रियों का भविष्य तय करेंगे उपचुनाव के नतीजे।

अब वीएसटी
राजनीति में अब न कोई दूध का धुला दिखता है और न अपने कहे पर खुद ही अमल करता है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी इसी परिधि में आते हैं। सूबे में जब पूर्व प्रधानमंत्री और जद (एस) के मुखिया एचडी देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी की सरकार थी तो येदियुरप्पा उन पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते थे। आज यही आरोप कर्नाटक में येदियुरप्पा पर लग रहे हैं।

खुद 78 साल के होने वाले हैं येदियुरप्पा। भाजपा ने 75 पार के किसी नेता को न मुख्यमंत्री रखा है और न कहीं मंत्री। पर येदियुरप्पा अपवाद ठहरे। खुद मुख्यमंत्री हैं और बड़ा बेटा राघवेंद्र सांसद है। छोटा बेटा विजयेंद्र कहने को तो कर्नाटक प्रदेश भाजपा का उपाध्यक्ष है पर सूबे में उसे सुपर मुख्यमंत्री कहने वालों की कमी नहीं। विरोधी ही नहीं भाजपा के भी सात विधायकों ने पिछले दिनों पार्टी आलाकमान को इस बाबत शिकायत भेजी है। जिसमें खुलासा किया गया है कि येदियुरप्पा तो बस नाम के मुख्यमंत्री हैं।

सरकार तो उनके बेटे विजयेंद्र ही चला रहे हैं। उनकी मर्जी के बिना न किसी को कोई सरकारी ठेका मिलता है, न किसी अफसर का तबादला होता है। आलाकमान विजयेंद्र पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से भी अनजान नहीं है। तभी उन पर कुछ अंकुश भी लगा रखे हैं। मसलन वे न किसी मंत्री का विभाग बदल सकते हैं

और न मंत्रिमंडल का विस्तार कर सकते हैं। खासकर बीएल संतोष के पार्टी में महासचिव (संगठन) बन जाने के बाद लिंगायत नेता येदियुरप्पा के लिए मुश्किलें बढ़ी हैं। चर्चा तो यहां तक है कि आलाकमान मुख्यमंत्री पद से उनका इस्तीफा भी मांग सकता है। शायद इसी खतरे को भांप येदियुरप्पा ने विरोधी दल जद (एस) से दोस्ती बढ़ाई है। देवगौड़ा राज्यसभा सदस्य बने तो कर्नाटक सरकार ने उन्हें महंगी और आरामदेह कार उपलब्ध करा दी। कुमारस्वामी के विधानसभा क्षेत्र में विकास के लिए खासा बजट दे दिया येदियुरप्पा ने। विधानसभा के पिछले सत्र में सरकार को लेकर कुमारस्वामी के बदले तेवर देख कांग्रेसी हैरान थे।

कुमारस्वामी ने आलोचना के बजाए सराहना ही की सरकार की। इसे आलाकमान को दबाव में लेने का येदियुरप्पा का नया दांव माना जा रहा है कि पद से हटाया तो पार्टी तोड़कर जद (एस) की मदद से सरकार बना सकते हैं। विधानसभा चुनाव के वक्त कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर दस फीसद कमीशन की सरकार चलाने का आरोप था। अब कांग्रेसी कह रहे हैं कि जीएसटी की तरह कर्नाटक में 15 फीसद वीएसटी भी लागू है। वीएसटी यानी विजयेंद्र सर्विस टैक्स।

खुशफहमी

मौका था नमामि गंगे की परियोजनाओं के लोकार्पण का। प्रधानमंत्री ने गंगा की महिमा का बखान तो किया ही गंगा स्वच्छता के लिए अपनी सरकार के उठाए कदमों की भी देर तक चर्चा की। पर ज्यादा वक्त उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार की तरफ से सूबे के उपभोक्ताओं को एक रुपए में पेयजल कनेक्शन देने की योजना की सराहना में कसीदे पढ़ने में लगाया। रावत की जमकर पीठ भी थपथपाई।

मुख्यमंत्री का आत्मविश्वास बढ़ा है तो पार्टी के भीतर उनके विरोधियों के चेहरे लटक गए। यानी मुख्यमंत्री हटाओ अभियान का कोई असर होता नहीं दिखा। ऐसे में न कोई विधायक मंत्रिमंडल के विस्तार की मांग कर पा रहा है और न कोई सरकार की पहले की तरह आलोचना कर पा रहा है।

अपने विभागीय अफसर के बारे में पुलिस को गुमशुदगी की शिकायत भेजने वाली इकलौती महिला मंत्री रेखा आर्य की मुखरता भी नदारद है। उल्टे मुख्यमंत्री ने बुलाकर हड़काया तो सफाई देते नजर आई। बाहर निकल मीडिया से भी यह कहकर पीछा छुड़ाती दिखी कि गलतफहमी हो गई थी। प्रधानमंत्री की वाहवाही लूटने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत भला खुशफहमी क्यों न पालें। (प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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