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राजपाटः सिर मुड़ाते ओले पड़े

कहावत तो काफी पुरानी है पर भाजपा को इसका कड़वा तजुर्बा हाल ही में फिर हो गया। सिर मुड़ाते ही ओले पड़े वाली स्थिति उसे पश्चिम बंगाल में झेलनी पड़ी है।

Author Published on: January 13, 2018 1:06 AM
सांकेतिक तस्वीर।

कहावत तो काफी पुरानी है पर भाजपा को इसका कड़वा तजुर्बा हाल ही में फिर हो गया। सिर मुड़ाते ही ओले पड़े वाली स्थिति उसे पश्चिम बंगाल में झेलनी पड़ी है। सूबे की एक विधानसभा सीट पर जल्द ही उपचुनाव होगा। भाजपा को कोई और नहीं मिला तो तृणमूल कांग्रेस की एक पूर्व विधायक पर ही लगा बैठी अपना दांव। कहने को तो यह एक बड़ी पार्टी है पर पश्चिम बंगाल में अपने लिए उम्मीदवार तक नहीं जुटा पा रही। भाजा की तरफ से जैसे ही मंजू घोष को नोआपाड़ा सीट से पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया, वैसे ही मंजू ने एलान कर दिया कि वे ममता बनर्जी की निष्ठावान सिपाही ठहरीं। ठोकर मार दी भाजपा के टिकट को। बेचारे भाजपाई मुंह लटका कर रह गए। कोई और नहीं मिला तो अब मजबूूरी में संदीप बनर्जी को बनाया अपना उम्मीदवार।

जहां तक ममता बनर्जी का सवाल है तो उन्होंने मंजू घोष की जगह सुनील सिंह को उतारा है। मंजू दो बार रह चुकी हैं यहां से विधायक। पर 2016 के आम चुनाव में ममता ने उनका टिकट काट दिया था। यह बात अलग है कि तृणमूल कांग्रेस के खाते में फिर भी नहीं आ पाई थी सीट। जीत यहां कांग्रेस-वाममोेर्चा गठबंधन के उम्मीदवार मधु सूदन घोष की हुई थी। उन्हीं के पिछले दिनों हुए निधन से आई है उपचुनाव की नौबत। खिसियाए भाजपा महासचिव सायंतन बसु ने आरोप जड़ दिया कि तृणमूल कांग्रेस की धमकियों के कारण डर गर्इं मंजू घोष। उम्मीदवारी के एलान के कुछ देर बाद ही दर्जनों असामाजिक तत्त्वों ने घेर लिया था उनका घर।

दरअसल मुकुल राय के नजदीक रही हैं मंजू। वे तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर भाजपा का दामन थाम चुके हैं। शायद उन्हीं की सलाह पर पार्टी ने बनाया होगा मंजू को अपना उम्मीदवार। हालांकि, मूल भाजपाई तो खिलाफ ही थे इस फैसले के। अब दांव उलटा पड़ गया तो नुकसान की भरपाई की कवायद शुरू कर दी गई है।

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