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राजपाटः निराशा का मंजर

राष्ट्रीय, प्रदेश, क्षेत्र और विभाग स्तर तक संगठन मंत्री रखने की पार्टी की परंपरा जनसंघ के जमाने से चली आ रही थी। लेकिन 2014 में भाजपा आलाकमान ने तमाम विभाग संगठन मंत्रियों की छुट्टी कर दी।

उत्तर प्रदेश भाजपा के भीतर सब कुछ सहज नहीं है। देश के सबसे बड़े सूबे में पार्टी ने 2017 में दूसरी बार अपने बूते सरकार बनाई थी।

उत्तर प्रदेश भाजपा के भीतर सब कुछ सहज नहीं है। देश के सबसे बड़े सूबे में पार्टी ने 2017 में दूसरी बार अपने बूते सरकार बनाई थी। पहली बार यों सरकार 1991 में ही बना ली थी पर वह दो साल भी नहीं चल पाई थी। उसके पास इतना बंपर बहुमत भी नहीं था। योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था। चुनाव के वक्त पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य थे। मुख्यमंत्री का चेहरा पेश नहीं किया गया था।

लोकसभा की तरह यह चुनाव भी नरेंद्र मोदी के नाम पर ही लड़ा गया था। सरकार बनी तो मुख्यमंत्री के लिए मनोज सिन्हा और केशव प्रसाद मौर्य दौड़ में आगे लग रहे थे। एक अगड़ा और दूसरा पिछड़ा। बाजी हाथ लगी राजपूत योगी आदित्यनाथ के। जो तब लोकसभा सदस्य थे। भले उनके चयन में संघ परिवार की भूमिका प्रमुख रही हो। योगी ने 2019 के लोकसभा चुनाव तक तो सबकी सुनी पर सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद यूपी में भाजपा अपने सहयोगी अपना दल को मिलाकर 64 सीटें जीत गई तो योगी का कद भी ऊंचा हो गया। शुरू में अटकलें थीं कि प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल का सरकार के फैसलों में दखल है। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी के तमाम छत्रप योगी के मुकाबले बौने हो गए। हां, सत्ता का सुख पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को नहीं मिलने से निराशा जरूर बढ़ गई। आम कार्यकर्ता तो दूर विधायकों और सांसदों तक को सरकार के कामकाज में कोई भाव नहीं दे रहे योगी। उधर पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने वाले नेताओं की निराशा भी बढ़ी है। तभी तो इस हफ्ते लखनऊ में पार्टी के कई दर्जन पूर्व संगठन मंत्रियों ने बैठक कर आलाकमान के रवैये पर ही सवाल उठा दिए। भाजपा में संगठन मंत्री पूर्ण कालिक कार्यकर्ता को बनाया जाता है। ज्यादातर संघी अतीत वाले। जिनका खर्च भी पार्टी उठाती है।

राजपाटः कौन किसका सगा

राष्ट्रीय, प्रदेश, क्षेत्र और विभाग स्तर तक संगठन मंत्री रखने की पार्टी की परंपरा जनसंघ के जमाने से चली आ रही थी। लेकिन 2014 में भाजपा आलाकमान ने तमाम विभाग संगठन मंत्रियों की छुट्टी कर दी। जो छह साल से पार्टी में अपनी भूमिका की तलाश में आरएसएस और भाजपा दोनों के हर दरवाजे पर दस्तक देते देते थक गए तो लखनऊ में बैठक कर आरोप लगाया कि पार्टी को अब कंपनी के अंदाज में चलाया जा रहा है। सूबेदार स्वतंत्र देव सिंह भी इन खांटी कार्यकर्ताओं के सवालों का जवाब नहीं दे पाए। जितेंद्र यादव, केडी तिवारी, राम कृपाल सिंह, दिनेश भाटी, पंकज सिंह और अखिलेश वाजपेयी जैसे समर्पित, अनुशासित और निष्ठावान लोगों ने अगर यह शिकायत की कि आम आदमी और पार्टी कार्यकर्ताओं किसी की भी सुनवाई के लिए न सरकार में कोई व्यवस्था है और न पार्टी में कोई फोरम। आलाकमान इस असंतोष से कोई सबक लेगा, लगता नहीं।

प्रस्तुतिः अनिल बंसल

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