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राजपाट: सियासत, सियासतदान और सियासी गतिविधियां, नया रिवाज

भाजपा की निगाह पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु पर भी टिकी है। तभी तो अपने सरकारी चेन्नई दौरे का अमित शाह ने सियासी समीकरण बिठाने में पूरा इस्तेमाल किया। जयललिता की मौत के बाद अन्ना द्रमुक में नेतृत्व का संकट किसी से छिपा नहीं है।

Author Updated: November 28, 2020 5:04 AM
Raajpatउत्तराखंड से लेकर तमिलनाडु तक में सियासी समीकरण लगातार बन-बिगड़ रहे हैं।

नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव के दौरान ही यह एलान कर सबको चौंकाया था कि यह उनके सियासी सफर का आखिरी चुनाव है। पर चौबीस घंटे के भीतर ही उनकी पार्टी उनके इस बयान से मुकर गई थी। बहरहाल नीतीश का मकसद पूरा हो गया और वे बिहार के मुख्यमंत्री बने रहे। अब उत्तराखंड में हरीश रावत ने इसी तरह का एलान किया है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे क्योंकि तब राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बन चुके होंगे। पर इस एलान से इतना तो साफ हो ही गया कि 2022 में होने वाले सूबे के विधानसभा चुनाव में उनकी सक्रियता दिखेगी। इसकी उन्होंने घोषणा भी की है। सूबे के बाकी कांग्रेसी नेता तो इसी में खुश थे कि आलाकमान ने उन्हें सूबे की सियासत से बाहर कर दिया। पर हरीश रावत भी मंजे खिलाड़ी हैं। कब, कहां, कितना सक्रिय होने में फायदा है, बखूबी समझते हैं।

नारायण दत्त तिवारी के बाद उत्तराखंड में कांग्रेस का सबसे कद्दावर चेहरा वे ही माने जाते हैं। बाकी ज्यादातर नेता तो पार्टी छोड़ पहले ही भाजपा में जा चुके हैं। रही सूबेदार प्रीतम सिंह और विधायक दल की नेता इंदिरा हृदेश की बात तो पीछे चाहे जो गुल खिलाएं पर सामने तो दोनों में से किसी का माद्दा नहीं हरीश रावत का विरोध करने का। हां, भाजपा के सूबेदार बंशीधर भगत ने फरमाया कि न 2024 में राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन पाएंगे और न हरीश रावत संन्यास लेंगे। इस मामले में एक पहलू और भी है जिसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए विजय बहुगुणा, यशपाल आर्य, हरक सिंह रावत, सुबोध उनियाल और सतपाल महाराज सभी घुटन महसूस कर रहे हैं। विधानसभा चुनाव से पहले ज्यादातर कांग्रेस में लौटना चाहेंगे। हरीश रावत के रहते शायद ही संभव हो पाए उनकी कांग्रेस में वापसी।

बदली हुई फिजा
बिहार की सियासत तेजी से करवट लेगी। रामविलास पासवान के निधन से खाली हुई राज्यसभा सीट पर सबकी निगाहें टिकी हैं। चुनाव आयोग ने इस सीट के उप चुनाव की तारीख 14 दिसंबर तय की है। भाजपा ने अपनी यह सीट रामविलास पासवान को दी थी। अब चिराग पासवान चाहते हैं कि इस सीट से उनकी मां रीना पासवान को उम्मीदवार बनाया जाए। लोक जनशक्ति पार्टी ने इस बारे में प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा है। दुविधा यह है कि बिहार विधानसभा चुनाव में राजग से बाहर रह और जद (एकी) उम्मीदवारों का खुला विरोध कर चिराग पासवान ने भाजपा से अपने रिश्तों को सवालों के घेरे में ला दिया है। भाजपा बिहार के युवा दलित चेहरे चिराग पासवान को खोना भी नहीं चाहेगी पर उन्हें अहमियत देने का मतलब होगा नीतीश कुमार को चिढ़ाना। इतना तय है कि उप चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन की जीत पक्की होती है। इस नाते हो सकता है कि विपक्ष उम्मीदवार भी न उतारे और चुनाव निर्विरोध हो जाए। इस सीट का कार्यकाल अभी साढ़े तीन साल बचा है।

भाजपा के भीतर भी इस सीट पर नजर लगाने वालों में सुशील मोदी और सैयद शाहनवाज हुसैन के नाम लिए जा रहे हैं। सुशील मोदी अभी बिहार विधान परिषद के सदस्य हैं। सूबे की सियासत में फिलहाल वे हाशिए पर हैं। अगर उन्हें केंद्र में मंत्री बनाने की पार्टी की कोई योजना है तो फिर उम्मीदवार वही हो सकते हैं। शाहनवाज काफी समय से पैदल हैं। जहां तक चिराग पासवान का सवाल है वे खुद को आज भी भाजपा का सहयोगी ही बता रहे हैं। चुनाव में तो उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताया ही था। भाजपा से अपने जुड़ाव का सबूत उन्होंने अपने इकलौते विधायक राजकुमार सिंह से विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में भाजपा उम्मीदवार विजय कुमार सिन्हा का समर्थन कराकर भी दे दिया। भाजपा आलाकमान बिहार में अपनी भावी रणनीति को लेकर बदलाव तो कर ही रहा है। तभी तो सात बार के अपने विधायक नंद किशोर यादव को पहले तो मंत्री नहीं बनाया और अब विधानसभा अध्यक्ष के पद को लेकर उनके नाम की अटकलों को भी गलत साबित कर दिया।

कंधे की दरकार
भाजपा की निगाह पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु पर भी टिकी है। तभी तो अपने सरकारी चेन्नई दौरे का अमित शाह ने सियासी समीकरण बिठाने में पूरा इस्तेमाल किया। जयललिता की मौत के बाद अन्ना द्रमुक में नेतृत्व का संकट किसी से छिपा नहीं है। जयललिता की सहेली शशिकला के जेल जाने के बाद पलानीस्वामी ने केंद्र सरकार की मदद से सरकार तो चला ली पर उनके लिए विधानसभा चुनाव में द्रमुक को टक्कर देना आसान नहीं होगा। उन्होंने ओ पनीरसेल्वम से हाथ मिलाकर शशिकला के भतीजे दिनाकरण को फिलहाल भले ही हाशिए पर धकेल दिया हो पर शशिकला के जल्द जेल से बाहर आने की खबर से वे परेशान हैं। तभी एलान किया कि लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव भी भाजपा से मिलकर लड़ेगी अन्ना द्रमुक। द्रमुक के पूर्व सांसद केपी रामलिंगम के भाजपा में शामिल होने को पार्टी की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है। रामलिंगम के जरिए भाजपा द्रमुक नेता स्टालिन के बागी भाई अझागिरी को भी लेने की जुगत में हैं। पूर्व में भी भाजपा का तमिलनाडु में खाता जयललिता के साथ तालमेल से ही खुल पाया था। (प्रस्तुति: अनिल बंसल)

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