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राजपाटः सियासी शिगूफा

सिद्धू खुद तो चुप्पी साधे हैं पर पत्नी नवजोत कौर ने कह दिया कि भाजपा अगर अकाली दल से नाता तोड़े तो वे भाजपा में वापसी कर सकते हैं। इस शर्त को भाजपा भला क्यों मानेगी?

सिद्धू खुद तो चुप्पी साधे हैं पर पत्नी नवजोत कौर ने कह दिया कि भाजपा अगर अकाली दल से नाता तोड़े तो वे भाजपा में वापसी कर सकते हैं।

अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए कंपनियां बढ़ा-चढ़ा कर दावे करती हैं ग्राहकों को लुभाने के लिए। कानूनी चक्रव्यूह में न फंसे इसके लिए किसी कोने में लगभग अदृश्य शब्दों में लिख देती हैं- शर्तें लागू। पर शर्तें लागू करने का यह सिलसिला अब राजनीति में भी आम हो रहा है। नवजोत कौर सिद्धू ने भी पिछले दिनों इसी तरह का शिगूफा छोड़ दिया। क्रिकेट और अभिनय से राजनीति में आए नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी हैं नवजोत कौर। पति-पत्नी लंबे अरसे तक भाजपा में थे। सिद्धू अमृतसर से सांसद थे तो पत्नी वहीं से विधायक। महत्वाकांक्षी नवजोत सिंह भाजपा में रहते जान गए थे कि पंजाब में यह पार्टी शिरोमणि अकाली दल की पिछलग्गू ही बनी रहेगी यानी मुख्यमंत्री पद कभी मिलने से रहा।

असंतोष की बेला में भाजपा ने 2014 में उनका टिकट काट कर अरुण जेटली को दे दिया तो सिद्धू ने पार्टी से किनारा कर लिया। राज्यसभा की सदस्यता तक से इस्तीफा दे कांग्रेस में शामिल हो गए। हालांकि मोलतोल अरविंद केजरीवाल की पार्टी से भी किया था। बात बनी नहीं। कांग्रेस में भी मुख्यमंत्री तो दूर उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी नहीं मिल पाई और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से मतभेद जल्द ही सतह पर आ गए। मंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया। आम आदमी पार्टी से कानाबाती की चर्चा चली तो पिछले साल सोनिया गांधी ने बातचीत के लिए बुलाया था पर पुनर्वास अभी बाकी है।

सिद्धू खुद तो चुप्पी साधे हैं पर पत्नी नवजोत कौर ने कह दिया कि भाजपा अगर अकाली दल से नाता तोड़े तो वे भाजपा में वापसी कर सकते हैं। इस शर्त को भाजपा भला क्यों मानेगी? लगे हाथ सिद्धू की डाक्टर पत्नी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तारीफ भी कर डाली कि मोहल्ला क्लीनिक का प्रयोग काबिले तारीफ है। नवजोत कौर ने परोक्ष रूप से इसका श्रेय खुद भी ले लिया कि सुझाव उन्होंने ही दिया था केजरीवाल को। मौजूदा परिस्थितियों में तो सिद्धू की दाल कहीं गलती नजर नहीं आ रही।

यश विधि हाथ
अयोध्या के साथ पांच अगस्त को पूरे देश के राममय होने के दावे तो किए गए पर राममंदिर आंदोलन के ज्यादातर पुरोधा या तो नदारद थे या नेपथ्य में। अशोक सिंघल और स्वामी वामदेव इस घड़ी को देखने के लिए दुनिया में ही नहीं रहे जबकि आंदोलन के नायक बजरंगी विनय कटियार थे अवधपुरी में ही और निमंत्रण भी मिला था पर कार्यक्रम में गए नहीं। जाकर पीछे की कतार में दर्शक की हैसियत से बैठते तो कुंठा ही बढ़ती। वैसे भी इस सबसे बड़े रामभक्त को अब न विहिप में कोई पूछता है और न भाजपा में। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह और प्रवीण तोगड़िया भी नदारद थे। गोविंदाचार्य को तो खैर न्योता ही नहीं गया था तो कैसे आते?

आडवाणी, जोशी और कल्याण सिंह को कोरोना संक्रमण से बचाने के नाम पर रोका गया तो विनय कटियार ने खुद कमर दर्द का बहाना बनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत थे शो के असली नायक। हां, साध्वी उमा भारती ने पहले माहौल बनाकर न्योता पा लिया और पहुंची भी जरूर। पर अपेक्षित महत्व नहीं मिलने का मलाल लेकर लौटी होंगी।

(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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