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चूकेंगे CM शिवराज सिंह चौहान?

दिल्ली ही नहीं अब तो भोपाल के सियासी गलियारों में चर्चा गरम है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को हटाया जा रहा है।

चूकेंगे CM शिवराज सिंह चौहान?
मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान और महाराष्ट्र की भाजपा नेता पंकजा मुंडे।

सूबे में विधानसभा चुनाव यों अगले साल होंगे। पर भाजपा आलाकमान को लगता है कि नए मुख्यमंत्री को चुनाव से पहले कम से कम एक साल का कार्यकाल तो मिलना ही चाहिए। वैसे भी चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री हैं। नई भाजपा किसी भी क्षत्रप को अधिक दिन तक पांव जमाने का अवसर नहीं देती। तभी तो मुख्यमंत्रियों को ताश के पत्तों की तरह फेंटा जा रहा है। उत्तराखंड हो या असम, त्रिपुरा हो या कर्नाटक, कोई मुख्यमंत्री खुद को स्थायी नहीं मान सकता। यहां तक कि गुजरात में भी आठ साल में तीन मुख्यमंत्री बदले जा चुके हैं।

किस्मत वाले तो हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर निकले। जो पांच साल का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं और भाजपा अगले महीने उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरने जा रही है। उत्तराखंड में तो त्रिवेंद्र सिंह रावत के बाद तीरथ सिंह रावत तो छह महीने भी अपने पद पर नहीं रह पाए। जबकि पुष्कर सिंह धामी को खुद मुख्यमंत्री रहते विधानसभा चुनाव हार जाने के बावजूद पार्टी ने मुख्यमंत्री बनाए रखा है। जहां तक शिवराज चौहान का सवाल है, पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा उनके नेतृत्व में हार गई थी।

लिहाजा उन्हें अलोकप्रिय मान आलाकमान ने नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाया था। उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर यह संदेश दिया गया था कि वे अब सूबे की सियासत का मोह छोड़ें। बिल्ली के भाग्य छींका तो तब टूटा जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ बगावत कर दी। तब भाजपा ने सेहरा शिवराज चौहान के सिर ही बांध दिया था। हालांकि आलाकमान खुश उनसे तब भी नहीं था क्योंकि उनकी महत्वाकांक्षा भी दिल्ली के सिंहासन पर बैठने की दिखने लगी थी।

बहरहाल इस साल हुए पंचायत और शहरी निकाय चुनाव के दौरान भाजपा के खराब प्रदर्शन ने शिवराज की रवानगी की जमीन तैयार कर दी। संघ के प्रमुख नेताओं ने भी पिछले दिनों उनके बारे में संतोषजनक राय नहीं दी तो जेपी नड्डा ने दिल्ली बुलाकर उनसे बंद कमरे में मंत्रणा की। उसी से उन्हें हटाए जाने की अटकलों को बल मिला। फिर वे प्रधानमंत्री से मिले तो इन अटकलों को और बल मिला।

‘आप’ में बधाई
पंजाब में करीब तीन महीने पहले मुख्यमंत्री भगवंत मान की शादी हुई थी। शादी के सिर्फ एक दिन पहले ही सोशल मीडिया पर शादी का आनलाइन न्योता किस्म की खबर आई थी जिसमें लिखा था कि सादगीपूर्ण विवाह समारोह गुरुद्वारा साहिब में होगा। इससे पहले किसी को इस बात की कानों-कान खबर नहीं हुई। इसके ठीक तीन महीने बाद शुक्रवार को संगरूर से आम आदमी पार्टी की सर्वाधिक युवा एवं पहली बार विधायक बनी नरिंदर कौर भराज (28) भी गांव लखेवाल के रहने वाले मनदीप सिंह (29) के साथ शादी के बंधन में बंध गईं।

विवाह समारोह में दोनों के पारिवारिक सदस्यों समेत करीबी जानकार ही मौजूद रहे। नरिंदर कौर और मनदीप सिंह की जान-पहचान स्कूल के समय से ही है। दोनों के गांव की दूरी भी महज दो किलोमीटर है। मनदीप सिंह आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता हैं और जिला प्रेस सचिव भी रह चुके हैं। भराज गांव के लोग इस बात से नाराज हैं कि उन्हें पता ही नहीं कि उनके गांव की बेटी की शादी कब संपन्न भी हो गई।

विधायक के भराज गांव में स्थित घर और संगरूर वाले घर में भी सन्नाटा रहा। गांव वालों को मलाल है कि सब कुछ इतने गुपचुप तरीके से हुआ कि शादी की खबर भी उन्हें मीडिया से पता चली। लोग यह भी कहते सुनाई दिए कि पंजाब की इस ‘युवा’ सरकार में करीब आधे से ज्यादा विधायक कुंवारे हैं। ऐसे में देखते हैं पांच साल पूरे होते-होते जनता को इनकी शादियों की कितनी खुशखबरियां अभी और मिलेंगीं।

बात बदलाव की
पंकजा मुंडे बेचैन हैं। गोपीनाथ मुंडे की बेटी हैं पंकजा। कभी तूती बोलती थी महाराष्ट्र भाजपा में गोपीनाथ मुंडे और उनके साले प्रमोद महाजन की जोड़ी की। पर साला-बहनोई दोनों ही असमय मौत के शिकार हो गए। महाजन की उनके छोटे भाई ने हत्या कर दी तो मुंडे सड़क दुर्घटना में चल बसे। महाजन ने भाजपा के उत्थान में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन प्रमोद महाजन की सांसद बेटी पूनम महाजन को भी नई भाजपा में खास तवज्जो नहीं मिल रही है। यही हाल गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा का है। वे 2014 में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बनी महाराष्ट्र की सरकार में मंत्री थीं। लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में अपनी ही परली विधानसभा सीट पर अपने चचेरे भाई धनंजय मुंडे से हार गई तो पार्टी ने भी उनसे किनारा कर लिया।

इसी दशहरे को बीड में रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने एलान कर दिया कि वे अगला विधानसभा चुनाव परली सीट से ही लड़ेंगी। विधानसभा चुनाव हारने के बाद से पंकजा मुंडे के पास कोई पद नहीं है। लेकिन अपने इरादे से वे दिखा रही हैं कि पद न होने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वे अपना राजनीतिक संघर्ष जारी रखेंगी। पार्टी में जिन्होंने उन्हें बदलाव की सलाह दी थी, पंकजा ने उन्हें भी सलाह दे डाली कि वे तो बदल गई, अब बारी सलाह देने वालों में बदलाव की है।
(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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First published on: 08-10-2022 at 04:06:10 am
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