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बेपटरी रिश्ता

लगता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अपने पार्टी नेतृत्व और आलाकमान के साथ पटरी नहीं बैठ पा रही है।

बेपटरी रिश्ता

हाल की दो घटनाओं से इस संदेह को बल मिला है कि दाल में कुछ काला तो जरूर है। आखिर मुख्यमंत्री अपने मन की नहीं कर पा रहे। एक तो चहेते आइएएस अफसर अवनीश अवस्थी को योगी सेवा विस्तार नहीं दे पाए। इस सेवा के अफसरों को विस्तार केंद्र सरकार की सहमति से ही दिया जा सकता है।

सपना तो अवस्थी ने योगी राज में मुख्य सचिव बनने का देखा था पर पिछले साल दिसंबर में केंद्र ने अड़ंगा डाल दिंंंया। आलाकमान ने केंद्र सरकार में सचिव उत्तर प्रदेश काडर के ही दुर्गा शंकर मिश्रा को गृहराज्य भेज दिया। जिनको एक हफ्ते बाद सेवानिवृत्त होना था। उन्हें मुख्य सचिव पद मिला तो एक साल की नौकरी स्वत: बढ़ गई। इस बीच अवस्थी 31 अगस्त को सेवानिवृत्त हो गए।

अपर मुख्य सचिव के पद पर सेवा विस्तार की योगी सरकार की सिफारिश को केंद्र ने माना ही नहीं। किरकिरी हुई तो सितंबर में योगी ने उन्हें अपना सलाहकार नियुक्त कर दिया। इसी तरह सूबे के पुलिस महानिदेशक के पद पर नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार से केंद्र खफा है। अवनीश अवस्थी की सलाह पर पिछले डीजीपी मुकुल गोयल को योगी ने दोबारा मुख्यमंत्री बनते ही पद से हटा दिया।

जबकि ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है। यही बात केंद्र सरकार ने योगी को याद दिलाते हुए उनसे गोयल को अचानक पद से हटाने की वजह पूछी हैै। मजे की बात यह है कि देश के सबसे बड़े सूबे की पुलिस का मुखिया पिछले चार महीने से काम चलाऊ है। योगी ने डीएस चौहान को डीजीपी बना रखा है पर संघ लोक सेवा आयोग ने उनकी नियुक्ति पर भी सवाल उठा दिया है।

बिन टिकट सब सून

हिमाचल में विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा व कांग्रेस में टिकटों को लेकर घमासान मचा हुआ है। सत्ता में आने का सपना देख रही कांग्रेस पार्र्टी के उम्मीदवारों की घोषणा अभी हाल ही में लगभग होने ही वाली थी, लेकिन अचानक न जाने क्या हुआ कि यह घोषणा होते-होते रह गई। शाम को यह सब कुछ हुआ और सुबह कांग्रेस पार्टी के एक और कार्यकारी अध्यक्ष हर्ष महाजन दबे पांव भाजपा में शामिल हो गए।

इसके बाद से अब कांग्रेस के उम्मीदवारों का मामला लटक गया है। उधर, टिकट के इच्छुक नेता हैं कि पल-पल इंतजार कर रहे हैं कि कब प्रत्याशियों के नामों की घोषणा हो और वह जनता के बीच अपना प्रचार अभियान शुरू करे। जबकि जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा वह भी चाहते हैं कि टिकटों की घोषणा जल्द हो जाए। उन्हें तो और इस राज को जानने की जल्दी है।

इसका कारण यह है कि अगर उन्हें टिकट नहीं मिला तो वे दूसरी पार्टी में जाने का या कोई दूसरा रास्ता तलाश कर सके। लेकिन न तो कांग्रेस में कुछ हो रहा है और न भाजपा में ही प्रत्याशियों की घोषणा हो पा रही है। कांग्रेस में तो चलो नेता लोग जुबान भी खोल ही रहे हैं। लेकिन भाजपाइयों की स्थिति तो और भी खराब है। वह तो खुल कर दावेदारी तक नहीं जता सकते।

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह तमाम टिकट के अभिलाषियों के नामों की गठरी व उनका पूरा ब्योरा अपने साथ ले गए हैं। लेकिन उन नामों पर क्या हो रहा है इस बाबत किसी को कुछ पता नहीं है। ऊपर से आलम यह है कि कोई किसी से कुछ पूछने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहा है। भाजपाइयों की धारणा है कि टिकटों को लेकर जो कुछ भी करना है वह मोदी व शाह की जोड़ी को ही करना है।

ऐसे में इन दोनों से कुछ भी पूछने की हिम्मत कोई जुटा नहीं पा रहा है। इधर टिकटों की घोषणा नहीं हो रही है और उधर हाथ से समय निकला जा रहा है। हर कोई अपनी किस्मत जानने को बेसब्र है कि उसके साथ क्या होने वाला है। बिन टिकट तो नेताओं का सारा उत्साह ही सूना है। देखते हैं, उनका यह दर्द कब खत्म होता है।

कृपया हिंदी में सवाल पूछें…

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष एम जगदीश कुमार ने एक बैठक शुरू होते ही उनसे हिंदी में ही सवाल पूछे जाने की गुजारिश की। जगदीश कुमार ने कहा कि चूंकि मैं हिंदी अखबार के पत्रकारों से मुखातिब हूं तो आराम से हिंदी में बात कर सकता हूं। उन्होंने अपने बारे में कहा कि उनकी स्कूली शिक्षा तेलुगू भाषा के माध्यम से हुई थी तो एक समय ऐसा भी था जब अंग्रेजी उनके लिए आम बातचीत की भाषा नहीं थी, और वे इसे बोलने में काफी असहज महसूस करते थे।

लेकिन उच्च-शिक्षा में प्रवेश करते ही उनका सामना अंग्रेजी वालों से होता गया और वे बहुत दिनों तक भाषाई अलगाव की समस्या से जूझते रहे। फिर, अंग्रेजी मुख्य अकादमिक भाषा बन गई। मजेदार यह था कि पत्रकार अपने सवालों में अंग्रेजी वाक्य लाते भी तो जगदीश कुमार हिंदी में ही जवाब देते। हिंदी पत्रकारों के सामने हिंदी में बात करते हुए उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में शिक्षण-प्रशिक्षण में भारतीय भाषाओं को अहमियत दी गई है ताकि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक विद्यार्थी अपनी जड़ों से दूर न हों। भाषा से लेकर डिग्री तक के अब तक के औपनिवेशिक काल के बंधन को दूर करने की बात करते हुए उन्होंने कहा-यह जरूरी नहीं कि जिसके पास पीचएडी की डिग्री हो उसके पास ज्यादा ज्ञान हो।
(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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First published on: 01-10-2022 at 01:47:27 am
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