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राजपाट: रंग बेढंग

ग्लैमर के मोह में सियासी बाना पहनने वाले नामचीन कलाकारों का हाल तो और भी बुरा है। मसलन, जो भोजपुरी गायक मनोज तिवारी आज दिल्ली प्रदेश भाजपा के मुखिया हैं। वे 2009 में साइकिल पर सवार थे। गोरखपुर में भाजपा के योगी आदित्यनाथ के मुकाबले ताल ठोकी थी। पर हार गए।

Author April 20, 2019 10:44 AM
बसपा का साल 2014 में लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खुला था। (एक्सप्रेस फोटोः विशाल श्रीवास्तव)

नेताओं की किसी बात का अब कोई भरोसा नहीं करता। अलबत्ता आम आदमी भी कहता है कि वे रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे रहे हैं। अब अखिलेश यादव को ही लीजिए। मुरादाबाद में सपा के मुसलमान प्रत्याशी को जिताने के लिए जनसभा में खुलासा किया कि कांग्रेस को महागठबंधन में जानबूझ कर नहीं लिया। दो सीटों की पार्टी की अब सूबे में औकात ही क्या है? दरअसल मुरादाबाद में कांग्रेस ने भी एक मुसलमान को ही अपना उम्मीदवार बना रखा है। मुसलमान मतों का विभाजन न हो, इस नीयत से किया अखिलेश ने कांग्रेस का अवमूल्यन। पर भूल गए कि कांग्रेस को तो 2014 में फिर भी दो सीट मिल गई थी पर जिस बहुजन समाज पार्टी से अपने सारे गिले-शिकवे भुला कर बंटवारे में एक सीट फालतू देकर समझौता किया है, उसका तो 2014 में खाता तक नहीं खुल पाया था।

फिर कहां से कांग्रेस हुई बसपा से हल्की पार्टी। रही बात 2009 की तो उस चुनाव में भी यूपी में बसपा ने अगर 20 सीटें जीती थी तो कांग्रेस को कामयाबी 21 पर मिली थी। लेकिन अखिलेश और क्या बहाना बनाते। ग्लैमर के मोह में सियासी बाना पहनने वाले नामचीन कलाकारों का हाल तो और भी बुरा है। मसलन, जो भोजपुरी गायक मनोज तिवारी आज दिल्ली प्रदेश भाजपा के मुखिया हैं, वे 2009 में साइकिल पर सवार थे। गोरखपुर में भाजपा के योगी आदित्यनाथ के मुकाबले ताल ठोकी थी।

पर हार गए। पांच साल बाद भाजपा आ गई तो दिल्ली से लोकसभा में जा पहुंचे। जिन दूसरे भोजपुरी नायक रवि किशन को भाजपा ने अब गोरखपुर से अपना उम्मीदवार बनाया है, वे पिछले चुनाव में जौनपुर से कांग्रेस के उम्मीदवार थे। उनकी निजी लोकप्रियता से अगर मतदाता प्रभावित हुए होते तो जमानत जब्त न होती उनकी। इसी तरह निरहुआ उपनाम वाले भोजपुरी अभिनेता दिनेश यादव ने पिछले लोकसभा चुनाव में सपा का प्रचार किया था। अखिलेश ने भी उन पर खूब कृपा की थी और यश भारती पुरस्कार रेवड़ी की तरह थमा दिया था। कल तक जिस भाजपा को कोसते नहीं अघाते थे आज उसी का गुणगान कर रहे हैं। जया प्रदा भी अलग नहीं। दस साल रामपुर की नुमाइंदगी साइकिल पर चढ़ कर की। पिछले चुनाव में रालोद भा गया था। इस बार भगवा चोला पहन उसी सपा को कोस रही हैं जिसने आंध्र की फिल्म अभिनेत्री को यूपी की सियासत में रमाया।

बदली फिजा
सूबे की सत्ता से बेदखल होने के बाद भाजपा राजस्थान में संभल ही नहीं पा रही। ऊपर से सत्तारूढ़ कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव को लेकर ऐसा चक्रव्यूह रच दिया कि भाजपा उसमें पूरी तरह घिर सी गई। चुनाव का कोई मुद्दा अभी तक उभार नहीं पाई। अलबत्ता एक ही नारा लगा रहे हैं भाजपाई कि उम्मीदवार को मत देखो, समझो कि प्रधानमंत्री उम्मीदवार हैं। ऐसा कहना मजबूरी भी ठहरी। आखिर ज्यादातर उम्मीदवारों का पहले तो पार्टी के भीतर ही खूब विरोध हुआ है। उम्मीद थी कि नए चेहरे दिखेंगे। उधर कांग्रेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सियासी सूरमा माने जाते हैं। खासकर इस मायने में कि उन्हें सूबे की नब्ज की उसी तरह जानकारी है जैसे किसी दौर में भैरोसिंह शेखावत को थी। उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार भाजपा से बेहतर उतारे हैं।

कांग्रेसी भी मान रहे हैं कि राजस्थान में भाजपा को मोदी का ही सहारा है। जबकि कांग्रेस के तमाम धुरंधर चुनावी माहौल में पार्टी का रंग भरने की कवायद कर रहे हैं। जयपुर, अजमेर, कोटा, झालावाड़ और भीलवाड़ा जैसी भाजपा का अभेद्य दुर्ग समझी जाने वाली सीटों पर भी भाजपा को पसीना छूट रहा है। पिछली दफा जयपुर में भाजपा की जीत साढ़े पांच लाख वोट के अंतर से हुई थी। इस बार फिर रामचरण बोहरा को ही मैदान में उतारा तो भाजपा के विधायक ही विरोध में सक्रिय हो गए। ऊपर से कांग्रेस ने बनिया कार्ड खेल दिया। जयपुर की मेयर रह चुकीं ज्योति खंडेवाल को मैदान में उतार दिया। जबकि बनिए भाजपा के परंपरागत मतदाता माने जाते हैं। ज्योति की कमान कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव विवेक बंसल ने संभाली है। जयपुर में बंसल की अच्छी पकड़ है। उन्होंने जयपुर से टिकट चाह रहे बाकी कांग्रेसी नेताओं को भी ज्योति के पक्ष में सक्रिय कर दिखाया है। भाजपा के परंपरागत वोटबैंक में ज्योति सेंध लगा पार्इं तो जयपुर भी फिसल सकता है भाजपा के हाथ से।

जुनूनी जंग
दीदी को स्वीकार नहीं कि उनके गढ़ में कोई उन्हें चुनौती दे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए यों भाजपा सबसे बड़ी विरोधी ठहरी। पर अपने सूबे में तो वे कांग्रेस और वाम मोर्चे के साथ भी कोई नरमी बरतने को तैयार नहीं। सूबे के उत्तर से जैसे ही वे दक्षिण की तरफ बढ़ती हैं, तेवर और तीखे हो जाते हैं। यहां वे कांग्रेस और वाम मोर्चे पर भी जमकर वार कर रही हैं। और तो और कांग्रेस पर तो यह भी आरोप जड़ दिया कि चुनाव जीतने के लिए वह राष्ट्रीय स्वयं संघ तक की मदद लेने से गुरेज नहीं कर रहीं। वे तो कांग्रेस, भाजपा और वाम दलों के गठजोड़ का फलसफा देकर तीनों को पराजित करने की लोगों से अपील कर रही हैं। नागपुर में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा आरएसएस के समारोह में की गई शिरकत का उदाहरण दे रही हैं। साथ ही उनके बेटे और कांग्रेस के उम्मीदवार अभिजीत मुखर्जी को भी लपेट दिया है। फरमाया है कि आरएसएस अब अभिजीत का प्रचार कर रहा है।

बहरमपुर के कांग्रेसी उम्मीदवार अधीर चौधरी पर भाजपा और वाम मोर्चे की मदद से पिछला चुनाव जीत जाने का आरोप लगा ममता इस बार उनकी रणनीति को नाकाम बनाने का दावा कर रही हैं। अमित शाह ने इस सूबे में अपनी पार्टी के लिए 42 में से आधी से ज्यादा सीटें पाने का लक्ष्य तय कर रखा है। पर ममता तो आत्मविश्वास के साथ दम भर रही हैं कि इस बार सारी सीटों पर तृणमूल कांग्रेस जीतेगी। भाजपा पर धर्म के नाम पर लोगों को बांटने के प्रयास का आरोप तो ममता न जाने कब से लगाती आ रही हैं। अपने सूबे में एनआरसी को लागू करने की अनुमति कभी भी नहीं देने का दावा कर रही हैं। ममता लोगों से संघ की साजिश में नहीं फंसने की अपील भी करने से कतई नहीं कतरा रहीं।

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