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राजपाट: मौसम के पारखी

अफसरों के टिकट मांगने के किस्से भी कम रोचक नहीं रहे। एक आइपीएस अफसर बीएल मेघवाल ने तो खाजूवाला सीट से कांग्रेस का टिकट अपने लिए पक्का मान वक्त से पहले रिटायरमेंट भी ले लिया। दौड़-धूप करने में भी कसर नहीं छोड़ी। पर टिकट फिर भी किस्मत में नहीं था।

Author December 8, 2018 6:53 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

क्या राजस्थान के नौकरशाह मतदाताओं का मिजाज भांप गए हैं। उनकी चहलकदमी के हर कोई अपने हिसाब से निहितार्थ तलाश रहा है। यों तो सेवारत और रिटायर अफसरों ने विधानसभा टिकट के लिए जिस तरह की भागदौड़ मचाई थी उससे भी मौजूदा वसुंधरा सरकार के फिर सत्तासीन होने को लेकर आशंका होने लगी थी। हर अफसर की पहली पसंद कांग्रेस ही बन गई थी। इतना ही नहीं चुनाव की घोषणा के बाद से ही अफसरों ने चक्कर भी कांग्रेसी नेताओं के घरों के ही लगाना बेहतर माना। जिससे सियासी पंडितों को सूबे की हवा का रुख भांपने में सुविधा हुई। अफसरों के टिकट मांगने के किस्से भी कम रोचक नहीं रहे। एक आइपीएस अफसर बीएल मेघवाल ने तो खाजूवाला सीट से कांग्रेस का टिकट अपने लिए पक्का मान वक्त से पहले रिटायरमेंट भी ले लिया। दौड़-धूप करने में भी कसर नहीं छोड़ी। पर टिकट फिर भी किस्मत में नहीं था। लिहाजा सरकार से नई फरियाद लगाई कि वीआरएस की उनकी अर्जी रद्द कर दी जाए। जो संभव था ही नहीं। बेचारे घर के रहे न घाट के।

मुख्य सचिव स्तर के आइएएस अफसर ओपी सैनी ने भी जयपुर की चौमू सीट के कांग्रेसी टिकट के लिए सारी तिकड़म फिट कर ली थी। अशोक गहलोत की परिक्रमा भी करते रहे। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो ऐन वक्त पाला बदल वसुंधरा की शरण में चले गए। वीआरएस भी मिल गया और करौली सीट से भाजपा का टिकट भी। आइपीएस अफसर सवाई सिंह गोदारा भी नागौर की खींवसर सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार बन गए। जोरदार छक्का लगाया दौसा के भाजपा सांसद हरीश मीणा ने। भाजपा से जैसे ही इस्तीफे का ऐलान किया वसुंधरा और आलाकमान दोनों हैरान रह गए। कांग्रेस में शामिल हो टोंक जिले से विधानसभा टिकट पा गए। हरीश मीणा आइपीएस अफसर रहे हैं। अशोक गहलोत के राज में सूबे के पुलिस महानिदेशक थे। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले नौकरी छोड़ भाजपा टिकट पर कांग्रेस के उम्मीदवार अपने सगे भाई से ही भिड़ गए। उन्हें शिकस्त दे दी। जो खुद मनमोहन सरकार में मंत्री थे। मजे की बात यह है कि अफसरों को टिकट देने में न कांग्रेस को गुरेज रहा और न भाजपा को। देखना है कि चुनावी जंग में कूदे अफसरों में से 11 दिसंबर को किसकी नैया पार लगेगी।

आदत से मजबूर
हरक सिंह रावत इस समय उत्तराखंड सरकार में मंत्री हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अपने इस सहयोगी को लेकर कभी सहज नहीं रह पाए। कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था हरक सिंह ने। विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को श्रद्धांजलि देने खड़े हुए थे। अचानक अतीत में खो गए। फरमाया कि 2005 में भाजपा नेता भगत सिंह कोश्यारी ने प्रमोद महाजन के साथ मिलकर तिवारी सरकार गिराने की साजिश रची थी। लेकिन विजय बहुगुणा के बीच में आ जाने से तिवारी सरकार बच गई थी। पाठकों को याद दिला दें कि 2005 में ही असम की युवती जैनी के प्रकरण में हरक सिंह फंस गए थे। सीबीआइ ने आरोप मुक्त कर दिया तो भी नारायण दत्त तिवारी ने उन्हें मंत्री पद वापस नहीं दिया था। चिढ़कर तिवारी सरकार गिराने की व्यूह रचना उन्होंने खुद रची थी। पर विजय बहुगुणा के हस्तक्षेप से तिवारी को तब जीवनदान मिल गया था।

हरक सिंह के अतीत को खंगालने के प्रयास ने भाजपा और त्रिवेंद्र सिंह रावत दोनों को उलझन में डाल दिया। इससे कांग्रेस के करण माहरा को मौका मिल गया। तपाक से भाजपा पर लोकतंत्र की हत्या करने का आरोप जड़ दिया। उन्होंने तो 2005 ही नहीं 2016 में भी हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को गिराने की साजिश का ठीकरा भाजपा के सिर फोड़ दिया। हरक सिंह रावत के सदन के खुलासे को ही प्रतिपक्ष की नेता इंदिरा हृदेश ने अपना हथियार बना भाजपा सरकार पर हमला बोला। हरक सिंह रावत की साफगोई के लिए खूब तारीफ भी की। यह बात अलग है कि अपने ही मंत्री के बेलगाम व्यवहार को लेकर भाजपा की किरकिरी हो गई और कांग्रेस बल्लियों उछल रही है। ऊपर से यह भी कम रोचक नहीं कि करण माहरा ठहरे हरीश रावत के साले हैं।

नतीजों का इंतजार
पांच राज्यों के चुनावी नतीजों को लेकर शुक्रवार शाम से ही अटकलों और समीकरणों का सिलसिला जोर पकड़ गया। चार दिन तक चकल्लस एक्जिट पोल के बहाने चलेगी। भाजपा के लिए छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान ही अहम हैं। तेलंगाना और मिजोरम में उसका खास जनाधार न पहले था और न उसे अब भी किसी चमत्कार की आस है। राजस्थान को लेकर लगातार वसुंधरा विरोधी माहौल की चर्चा चलती रही। ऊपर से भाजपा और कांग्रेस दोनों के अपने-अपने राग रंग। कांग्रेस का आत्मविश्वास सूबे के मतदाताओं के इस मिजाज ने बढ़ाया कि वे हर बार सत्ता परिवर्तन करते हैं। तो भाजपा ने पुरजोर कोशिश अपने प्रचार में इसी धारणा को तोड़ने की तरफ लगाई। एक बात हर किसी को अखरी कि प्रधानमंत्री ने अपनी किसी भी चुनावी सभा में वसुंधरा राजे का न नाम लिया और न उन्हें फिर मुख्यमंत्री बनाने की अपील ही की। भाजपा को फिर सत्ता में लाने का ही किया हर जगह आग्रह।

बहरहाल राजस्थान को लेकर सत्तारूढ़ दल की सांसें कतई नहीं अटकी। उसे तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से ज्यादा लगाव ठहरा। दोनों ही सूबों में पहले ही 15 साल से सत्ता में रही है पार्टी। चौथी बार सफलता मिली तो कांग्रेस के लिए झटका होगा। उस सूरत में 2019 के लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल कांग्रेस को शायद ही ज्यादा भाव देना चाहेंगे। राहुल गांधी भी चाहेंगे कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों बेशक न सही पर कम से कम एक तो उनकी झोली में जरूर आए। अलबत्ता तेलंगाना को लेकर कांग्रेसी खासे उत्साहित दिखे हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के क्षत्रपों के बीच अंदरखाने चाहे जितनी तल्खी हो पर चुनावी रण में तो एका ही दिखाया उन्होंने। यह नजरिया पूरी तरह हवाई नहीं कहा जा सकता कि पांच राज्यों के चुनावी नतीजे एक तरह से अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल साबित हो सकते हैं।

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