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राजपाट: चमत्कार की आस

कर्नाटक उपचुनाव के हाल के नतीजों ने फिर शुरू करा दी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के नतीजे की अटकलबाजी। भाजपा के सूबे के सबसे कद्दावर नेता वाईएस येदियुरप्पा ने शिमोगा की अपनी सीट तो बेशक बचा ली पर बेल्लारी भाजपा से छिन गई।

Author November 10, 2018 4:22 AM
भाजपा के सूबे के सबसे कद्दावर नेता वाईएस येदियुरप्पा ने शिमोगा की अपनी सीट तो बेशक बचा ली पर बेल्लारी भाजपा से छिन गई।

कर्नाटक उपचुनाव के हाल के नतीजों ने फिर शुरू करा दी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के नतीजे की अटकलबाजी। भाजपा के सूबे के सबसे कद्दावर नेता वाईएस येदियुरप्पा ने शिमोगा की अपनी सीट तो बेशक बचा ली पर बेल्लारी भाजपा से छिन गई। वही बेल्लारी जिसका नतीजा चर्चित रेड्डी बंधुओं के रिमोट से तय होने की दंतकथा सी बन गई थी। विधानसभा के लिए चुने जाने के कारण येदियुरप्पा को शिमोगा सीट से मजबूरी में इस्तीफा भले देना पड़ा पर उपचुनाव में टिकट अपने बेटे को दिला दिया। वंशवाद की विरोधी होने का दम भरने वाली भाजपा कर्नाटक के अपने सबसे कद्दावर नेता की नाराजगी मोल लेने का जोखिम भला क्यों उठाती? बहरहाल, मांड्या और बेल्लारी में भाजपा की हार भारी अंतर से हुई जबकि शिमोगा में कामयाबी कम अंतर से ही मिल पाई। इन नतीजों ने साफ कर दिया कि विपक्ष एक हो जाए तो हर जगह भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। चौंकाने वाला एक और पहलू यह है कि 2014 के बाद लोकसभा के जितने भी उपचुनाव हुए, एक दो को छोड़ हर जगह भाजपा की हार हुई। जबकि धारणा यही रही है कि उपचुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी के उम्मीदवार को चुनना पसंद करते हैं मतदाता। वह जीत कर अपने प्रभाव से इलाके का ज्यादा विकास जो करा सकता है। पंजाब, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक हर जगह उपचुनाव भाजपा को महंगे पड़े हैं।

गुणा भाग उत्तर प्रदेश को लेकर ज्यादा हो रहा है। आखिर अस्सी सीटें हैं। पिछली बार अपना दल समेत पार्टी ने 73 जीती थी। इनमें बहुमत यानी पचास फीसद से ज्यादा वोट लेकर महज 16 सीटों पर ही कामयाबी मिली थी। उपचुनाव में जो तीनों सीटें कैराना, गोरखपुर और फूलपुर गंवाई वे इसी श्रेणी वाली यानी आधे से ज्यादा वोट पाकर जीती हुई सीटें थीं। कट्टर भाजपाई भी मान रहे हैं कि सपा और बसपा का गठबंधन हो गया तो भाजपा के लिए डगर पथरीली हो जाएगी। कुछ नहीं सूझ रहा तो अब भाजपाई एक ही दलील दे रहे हैं कि इन दोनों का गठबंधन हो ही नहीं सकता। विकास के अपने परचम को फहरा कर लोगों का समर्थन हासिल करने की बात अब कोई नहीं कर रहा। अलबत्ता विकास की जगह दूसरे मुद्दों पर फोकस साफ दिखने लगा है। सबको एक ही आस है कि केंद्र की जोड़ी चमत्कार करेगी। लोकसभा चुनाव से पहले ऐसा कुछ कर देंगे कि सारा देश 2014 की तरह 2019 में भाजपा के पक्ष में रहेगा।

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