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राजपाट: बागी भी अपने

सूबे की दो सौ में से कम से कम एक चौथाई सीटों पर ये बागी कहीं भाजपा तो कहीं कांग्रेस उम्मीदवार की जीत के समीकरण को बिगाड़ रहे हैं। कहीं त्रिशंकु विधानसभा बनी तो निर्दलियों की तो लाटरी ही खुल जाएगी। इसी आशंका से दोनों दलों का नेतृत्व जीत की क्षमता वाले निर्दलियों पर अभी से डोरे डाल रहा है।

Author December 1, 2018 6:42 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

राजस्थान के विधानसभा चुनाव में इस बार बागियों ने दोनों मुख्य दलों की नींद उड़ा दी है। कुछेक इलाकों को छोड़ दें तो मोटे तौर पर सूबे की सियासत में दो ही दलों भाजपा और कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। यह किवदंती भी रोचक है कि यहां अरसे से हर बार सत्ता परिवर्तन का इतिहास है। दरअसल, भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही टिकट बांटने में जो बंदरबाट की उसकी चपेट में कई दिग्गज भी आ गए। लिहाजा वे बागी बनते ही। सूबे की दो सौ में से कम से कम एक चौथाई सीटों पर ये बागी कहीं भाजपा तो कहीं कांग्रेस उम्मीदवार की जीत के समीकरण को बिगाड़ रहे हैं। कहीं त्रिशंकु विधानसभा बनी तो निर्दलियों की तो लाटरी ही खुल जाएगी। इसी आशंका से दोनों दलों का नेतृत्व जीत की क्षमता वाले निर्दलियों पर अभी से डोरे डाल रहा है। भाजपा के पांच मौजूदा मंत्री और एक दर्जन विधायक टिकट नहीं मिलने के चलते बागी बन बैठे। कुछ तो मजबूती से मैदान में डटे हैं।

सुरेंद्र गोयल, राजकुमार रिणवा, हेमसिंह भड़ाना, धन सिंह रावत और ओम प्रकाश हुड़ला को उनके क्षेत्रों में भाजपा के अधिकृत उम्मीदवारों पर भारी माना जा रहा है। हालात कांग्रेस में भी बेहतर नहीं हैं। महादेव सिंह खंडेला, बाबूलाल नागर, संयम लोढ़ा और विक्रम सिंह शेखावत ने निर्दलीय ताल ठोक कर पार्टी नेतृत्व को चुनौती दे रखी है।

याद कीजिए, 1993 और 2008 को जब किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। भैरोसिंह शेखावत और अशोक गहलोत के सिर ताज तब निर्दलियों की बदौलत ही आया था। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कई सीटों पर तो कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अपने अधिकृत उम्मीदवार के बजाए मजबूती से लड़ रहे अपने ही बागी को जिताते दिख रहे हैं। विरोधी दल के उम्मीदवार की जीत से तो अपने बागी की जीत अच्छी।

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