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राजपाट: एलान-ए-जंग

पहले सीबीआइ की कोशिश के खिलाफ कोलकाता में लगातार छत्तीस घंटे धरना देकर उन्होंने सुर्खियां बटोरी थीं। फिर भाजपा नेताओं के हेलिकॉप्टरों को सूबे में उतरने की इजाजत नहीं देकर टकराव को और हवा दी। मकसद विपक्षी महागठबंधन का चेहरा बनने की उनकी महत्त्वाकांक्षा मानी जा रही है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Source: PTI)

दीदी और केंद्र सरकार के बीच जारी जंग थमने का नाम नहीं ले रही। कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी तनातनी बढ़ी है। दीदी यानी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आर-पार की लड़ाई का एलान कर चुकी हैं। उनका कहना है कि केंद्र से भाजपा सरकार की विदाई के बाद ही वे चैन से बैठेंगी। पहले सीबीआइ की कोशिश के खिलाफ कोलकाता में लगातार छत्तीस घंटे धरना देकर उन्होंने सुर्खियां बटोरी थीं। फिर भाजपा नेताओं के हेलिकॉप्टरों को सूबे में उतरने की इजाजत नहीं देकर टकराव को और हवा दी। मकसद विपक्षी महागठबंधन का चेहरा बनने की उनकी महत्त्वाकांक्षा मानी जा रही है। टकराव की राजनीति के जरिए वे संदेश दे रही हैं कि विपक्ष में वही इकलौती जुझारू नेता हैं जो केंद्र सरकार और भाजपा दोनों से दो-दो हाथ करने में सक्षम हैं।

नोटबंदी से लेकर जीएसटी और नागरिकता (संशोधन) विधेयक के खिलाफ सबसे मुखर तेवर भी उन्होंने ही दिखाए हैं। जुबानी हमलों का शिकार प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष ही नहीं यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी बनाया है। केंद्र सरकार पर प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआइ जैसी एजंसियों को विपक्षी नेताओं के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप तो ममता काफी अरसे से लगा रही हैं। टकराव के नतीजे सियासी हत्याओं के दौर में तेजी के रूप में भी दिखने लगे हैं। पिछले दिनों ममता की पार्टी के विधायक सत्यजीत विश्वास की सरेआम हत्या के बाद इस मामले में भाजपा नेता मुकुल राय का नामजद होना आने वाले दिनों में टकराव के और तेज होने का अंदेशा जता रहा है।

मजे में दलबदलू: लोकसभा चुनाव की तारीख के एलान का भी इंतजार नहीं किया अवतार सिंह भडाणा ने। भाजपा से इस्तीफा दे जा पहुंचे अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस में। कमाल की बात है कि हरियाणा के इस गुर्जर नेता की प्रतिभा के सभी सियासी दल कायल हैं। न होते तो देवीलाल की छत्रछाया में सियासी पारी की शुरुआत करने वाले भडाणा को पहले कांग्रेस ने सिर-आंखों पर बिठाया और फिर भाजपा ने भी गुरेज नहीं किया अगवानी करने से। देवीलाल ने भडाणा को विधानसभा का सदस्य न होने के बावजूद अपनी सरकार में मंत्री बना कर सबको चौंकाया था। बाद में भडाणा फरीदाबाद से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंच गए। इससे पहले 1999 में उन्होंने यूपी के मेरठ की लोकसभा सीट कांग्रेसी टिकट पर जीत कर सबको हैरान किया था।

बहरहाल 2017 में जब भाजपा ने भडाणा को मुजफ्फरनगर जिले की मीरापुर सीट से विधानसभा टिकट दिया तो पार्टी के स्थानीय गुर्जर नेता हक्का-बक्का रह गए थे। अपने धनबल और जातिबल के बूते भडाणा जीत तो गए पर योगी सरकार में मंत्री नहीं बन पाने का मलाल सताता रहा। भाजपा की दुविधा यह थी कि गुर्जर बिरादरी के जो पांचों विधायक प्रदीप चौधरी (गंगोह), सोमेंद्र तोमर (मेरठ दक्षिण), तेजपाल नागर (दादरी), नंदकिशोर गुर्जर (लोनी) और भडाणा (मीरापुर) जीते, उनमें से मंत्री लायक काबीलियत किसी में नजर आई। नतीजतन सूबे की एक दर्जन से ज्यादा सीटों को प्रभावित करने वाली गुर्जर बिरादरी के हिस्से राज्यमंत्री तक का पद नहीं आया।

बाद में बिजनौर के अशोक कटारिया को भाजपा ने एमएलसी बनाया तो चर्चा चली कि गुर्जर कोटे का मंत्री पद उन्हें ही मिलेगा। वे भी नाउम्मीद रह गए तो भडाणा का धीरज चुक गया। फरीदाबाद से लोकसभा टिकट की उनकी हसरत आलाकमान ने पूरी की नहीं और यूपी में मंत्री पद योगी ने नहीं दिया तो व्यथित भडाणा इसी गुरुवार को भाजपा और विधानसभा की सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे प्रियंका गांधी की मौजूदगी में जा पहुंचे कांग्रेस के खेमे में। करीबियों को बताया है कि फरीदाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। यूपी में लगातार उपेक्षा झेल रहे भाजपा के गुर्जर नेता मन ही मन हर्षित हैं कि अब तो करनी पड़ेगी पार्टी को उनकी कद्र।

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