ताज़ा खबर
 

राजपाट: निज हित सर्वोपरि

हरीश रावत को मुख्यमंत्री पद से हटवाना चाहते थे विजय बहुगुणा और उनके समर्थक नेता। सोनिया गांधी ने उनकी मांग नहीं मानी थी तो पार्टी बंट गई थी। विधानसभा चुनाव में इसका खासा नुकसान भी उठाना पड़ा था।

Author February 9, 2019 5:54 AM
कांग्रेस पार्टी का झंडा। (फोटो सोर्स : Indian Express)

सियासत में अटकलें और बेसिर-पैर की खबरें भी अक्सर उथल-पुथल ला देती हैं। उत्तराखंड की सियासत में भी इन दिनों ऐसी ही एक अपुष्ट खबर ने खलबली मचा दी है। खबर यह है कि कांग्रेस से बगावत कर विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में गए कई नेता अपनी पुरानी पार्टी में वापस आने की जुगत बिठा रहे हैं। जाहिर है कि इस खबर से बेचैनी हरीश रावत की ज्यादा बढ़ी है। उन्हीं के खिलाफ तो हुई थी बगावत। हरीश रावत को मुख्यमंत्री पद से हटवाना चाहते थे विजय बहुगुणा और उनके समर्थक नेता। सोनिया गांधी ने उनकी मांग नहीं मानी थी तो पार्टी बंट गई थी। विधानसभा चुनाव में इसका खासा नुकसान भी उठाना पड़ा था। सत्तर में से महज ग्यारह सीटों पर सिमट गई थी कांग्रेस। यों सतपाल महाराज, हरक सिंह रावत, सुबोध उनियाल और विजय बहुगुणा सभी फिलहाल भगवा खेमे में हैं पर कांग्रेस में चुनाव बाद हुए बदलाव से फीलगुड किया था उन्होंने। प्रीतम सिंह को पार्टी का सूबेदार और इंदिरा हृदेश को विधायक दल का नेता बना हरीश रावत के लिए हारे को हरि नाम की सलाह दी गई थी।

फिलहाल सौदेबाजी लोकसभा चुनाव के टिकट को लेकर होने की अटकलें हैं। मसलन सतपाल महाराज को पौड़ी और विजय बहुगुणा को टिहरी का लोकसभा टिकट चाहिए। भाजपा ने नहीं दिया तो कांग्रेस का दरवाजा खटका सकते हैं। दोनों ही अतीत में कांग्रेस की तरफ से इन सीटों की नुमाइंदगी कर चुके हैं लोकसभा में। भाजपा में वैसे भी त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बहुगुणा और महाराज दोनों को हाशिए पर पहुंचा रखा है। जबकि हरीश रावत ने अपने मुख्यमंत्री काल में सतपाल महाराज को खूब चिढ़ाया था। उनके छोटे भाई भोले महाराज को दे रहे थे भाव। भोले महाराज की त्रिवेंद्र सिंह सरकार में भी अच्छी पैठ है। जबकि सतपाल और भोले दोनों महाराज भाई एक-दूसरे को फूटी आंखों देखना पसंद नहीं करते। हरीश रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत और सतपाल महाराज तीनों ही रावत ठाकुर ठहरे। बिरादरी पर वर्चस्व की लड़ाई ने तीनों का वैर बढ़ाया है।

करो या मरो: विधानसभा चुनाव के बाद राजस्थान की सियासी धरती पर तेवर कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेताओं के बदल गए हैं। भाजपा के मौजूदा 23 लोकसभा सदस्यों में से कई को अभी से सता रहा है हार का डर। सो सीट बदलने की मनुहार कर रहे हैं। तीन तो मोदी सरकार में मंत्री ठहरे। कुछ हार सामने देख चुनाव लड़ने से ही कतरा रहे हैं। जयपुर के सांसद रामचरण बोहरा की हालत भी पतली है। उनके संसदीय क्षेत्र में आने वाली आठ विधानसभा सीटों में से पांच पर भाजपा को पिछले चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा था। लिहाजा बेचारे बोहरा का डर गैरवाजिब माना भी नहीं जा सकता। अब उन्हें जयपुर ग्रामीण सीट की दरकार है। उस पर तो राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का कब्जा है। जो मोदी सरकार में मंत्री तो हैं ही, अपने काम के बल पर पार्टी में अच्छा रुतबा भी कायम कर रखा है।

यह बात अलग है कि भाजपा की हालत इस संसदीय क्षेत्र में भी खराब ही मानी जा रही है। खुद राठौड़ भी आलाकमान को आगाह कर रहे हैं कि वसुंधरा की कार्यशैली ने उनके संसदीय क्षेत्र के लोगों को भी पार्टी से नाराज कर दिया था। असली नजारा तो झालावाड़ में मिलेगा देखने को। जहां से वसुंधरा के बेटे दुष्यंत हैं इस समय सांसद। आलाकमान भी समझ रहा है कि दुष्यंत यहां गच्चा खा सकते हैं। लिहाजा दबाव उनकी जगह उनकी मां को चुनाव लड़ाने का है। उधर कांग्रेस में भी माहौल बदला हुआ है। लोकसभा चुनाव को पूरी शिद्दत और ताकत से लड़ना चाहते हैं इस बार राहुल गांधी। भले सूबे की सरकार के मंत्रियों और विधायकों को ही क्यों न बनाना पड़ा उम्मीदवार। यह बात अलग है कि ज्यादातर विधायक यह जोखिम उठाना नहीं चाहते। हार गए तो भद्द पिटेगी। जीत गए तो सूबे की सरकार का मंत्री पद जाएगा। यह बात अलग है कि टिकटार्थियों का टोटा न भाजपा में है और न कांग्रेस में।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App