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राजपाट: गुड़ गोबर

हारे को हरिनाम की सलाह बुजुर्ग भी देते आए हैं। पर यहां तो बगावत भी पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। मसलन, जयपुर शहर में बहुमत के बावजूद पार्टी के पार्षदों ने अनुशासनहीनता का कीर्तिमान बना दिया।

Author Published on: February 2, 2019 6:39 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

भाजपा राजस्थान में विधानसभा चुनाव में मिली पराजय का जख्म भरने की कवायद में जुट गई है। सब कुछ बदल डालो का खेल जारी है। हार की वजह खोजने के बजाए नेताओं को निर्वासित करने की मुहिम छिड़ गई है। हारे को हरिनाम की सलाह बुजुर्ग भी देते आए हैं। पर यहां तो बगावत भी पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। मसलन, जयपुर शहर में बहुमत के बावजूद पार्टी के पार्षदों ने अनुशासनहीनता का कीर्तिमान बना दिया। बीस से ज्यादा पार्षदों की बगावत का असर यह हुआ कि अधिकृत उम्मीदवार तो मेयर का चुनाव हार गया और बागी जीत गया। आलाकमान को भी करारा झटका लगा इस नतीजे से। दरअसल पांच साल के राज में जमीनी कार्यकर्ता उपेक्षित रहा। नतीजतन जयपुर जैसे गढ़ में भी किरकिरी हो गई। नेतृत्व भी कुपित हुआ और पंद्रह जिलों के पार्टी अध्यक्ष एक झटके में बदल डाले। संकेत लोकसभा चुनाव की तैयारी को लेकर गंभीरता दिखाने का है। पर मौजूदा सांसद खुद डरे हुए हैं। कुछ अपने क्षेत्र बदलने की जुगत भिड़ा रहे हैं तो कुछ मैदान छोड़ कर भागने के बहाने खोज रहे हैं।

आम चुनाव में तो भाजपा को सभी पच्चीस सीटों पर फतह हासिल हुई थी। हां, दो सीटें अजमेर और अलवर पिछले साल उपचुनाव में भाजपा ने गंवा दी थी। केंद्र सरकार में पांच मंत्री हैं फिलहाल सूबे के। उनमें से तीन ने तो नए संसदीय क्षेत्रों से उम्मीदवारी चाही है। ज्यादातर भाजपा सांसद सूबे का निजाम बदलने से घबराए हैं। ऊपर से उनकी खेवनहार वसुंधरा राजे खुद संकट से घिरी हैं। विधायक दल का नेता बना कर सूबे की सियासत में जलवा कायम रखने के बजाए आलाकमान ने उन्हें उपाध्यक्ष बना अपनी टीम में शामिल कर लिया। ऊपर से झालावाड़ लोकसभा सीट की उम्मीदवारी का दबाव है उन पर। जहां तीन बार से उनके बेटे दुष्यंत सिंह सांसद हैं।

वसुंधरा समर्थक अब बागी तेवर दिखाने के मूड में आ रहे हैं। गुरुवार को अलवर की रामगढ़ सीट के उपचुनाव के नतीजे ने पार्टी का मनोबल और तोड़ दिया। इस सीट पर बसपा उम्मीदवार के निधन के कारण आम चुनाव के वक्त मतदान टालना पड़ा था। कांग्रेस की साफिया जुबैर ने बारह हजार से ज्यादा वोट के अंतर से भाजपा के सुखवंत सिंह को पटखनी दी तो साबित हो गया कि अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते 2014 जैसे चुनावी नतीजों की कल्पना तो करने से बचना ही होगा भाजपा को। ऊपर से पार्टी के भीतर जिस तरह की उथल-पुथल मची है, उससे मजबूती तो होने से रही। दुर्दशा कहां जाकर थमेगी, कौन जाने?

लड्डू दोनों हाथ: राजस्थान में तो चलो कांग्रेस के राज ने हताशा बढ़ाई है भाजपा के 23 सांसदों की। पर उत्तराखंड को क्या हुआ? यहां तो अच्छी-खासी बहुमत की सरकार चला रहे हैं पार्टी के नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत। तो भी लोकसभा टिकट को लेकर घमासान है। पिछली दफा पांचों सीटों पर पार्टी ने विजय हासिल की थी। इस बार भुवनचंद खंड़ूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी उम्रदराज हो जाने के कारण कई दावेदारों के निशाने पर हैं। लेकिन हार से डरा पार्टी नेतृत्व अब टिकट की अपनी कसौटियों को बदलने से भी गुरेज नहीं करने वाला। सफाई दी जाने लगी है कि उम्र की सीमा मंत्री पद के लिए है, चुनाव लड़ने के लिए नहीं। यानी पचहत्तर पार वाले भी मूंछ पर ताव दे सकते हैं। भाजपा के अगुआ मजबूत सरकार को बेहतर बताते हैं पर जमीनी हकीकत उलट लगती है। विरोधी ही नहीं भाजपा वाले भी यही कामना कर रहे होंगे कि सरकार मजबूर हो तो उनकी पूछ भी बढ़ेगी।

बहरहाल सूबे की टिहरी सीट को लेकर उलझन ज्यादा है। यहां पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपना दावा जता रहे हैं। आलाकमान की गुडबुक में होने का करीबियों से दावा कर रहे हैं। लेकिन मौजूदा सांसद और टिहरी राजघराने की बहू माला राजलक्ष्मी शाह मैदान से हटने को तैयार नहीं। यहां तक कि भाजपा ने टिकट न दिया तो पार्टी बदल कर लड़ सकती हैं। अपनी सीट किसी हालत में नहीं छोड़ने वाली। रही बहुगुणा की बात, उन्होंने भाजपा के तमाम नेताओं को देहरादून में पिछले दिनों भोज पर बुलाया। मुख्यमंत्री से लेकर पार्टी के सूबेदार तक दिखे। टिहरी की सांसद की गैरमौजूदगी ने कौतुहल बढ़ा दिया। भाजपा जहां इस सीट को अपने लिए सबसे सुरक्षित समझती है, वहीं कांग्रेस का संकट यहां उम्मीदवार का टोटा ठहरा। यानी राज लक्ष्मी शाह के दोनों हाथों में लड्डू हैं। भाजपा से तो टिकट का दावा पुख्ता है ही, टिकट न मिला तो कांग्रेस सिर माथे बिठा लेगी।

नई अटकल: हरियाणा की जींद विधानसभा सीट के उपचुनाव के नतीजे ने सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है। गुरुवार को आए नतीजे ने साफ कर दिया कि जाट बनाम गैरजाट का समीकरण भाजपा के लिए संजीवनी बन गया। पिछले चुनाव में ओम प्रकाश चौटाला के इनेलोद के उम्मीदवार हरी चंद मिड्ढा ने जीती थी यह सीट। उनके निधन के कारण उपचुनाव की नौबत आई। भाजपा ने चालाकी दिखा मिड्ढा के बेटे कृष्ण मिड्ढा को उम्मीदवार बनाया था। मुकाबले में विभिन्न दलों के तीनों ही उम्मीदवार जाट होने के कारण इकलौते गैरजाट मिड्ढा की राह आसान बनी। इनेलोद के बंटवारे से बनी नई जननायक जनता पार्टी के उम्मीदवार और ओम प्रकाश चौटाला के पौत्र दिग्विजय सिंह करीब तेरह हजार वोट से हार गए। किरकिरी तो कांग्रेस की ज्यादा हुई। जो आम चुनाव में हरियाणा में फतह के सपने देख रही है। उसके उम्मीदवार और कद्दावर नेता रणदीप सुरजेवाला तीसरे नंबर पर रह गए।

सुरजेवाला फिलहाल कैथल सीट से विधायक हैं। वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी समझे जाते हैं। विधानसभा उपचुनाव में हार से उनके प्रतिद्वंद्वी भूपेंद्र सिंह हुड्डा मन ही मन खुश हुए होंगे। जो भी हो अब यह कयास तेजी से लग रहा है कि भाजपा नेतृत्व लोकसभा चुनाव के साथ ही हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव भी करा सकता है। मकसद लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सहारे इन सूबों को भी बचाने का बताया जा रहा है। वैसे भी इन सूबों की विधानसभा का कार्यकाल अक्तूबर में पूरा होने ही वाला है।

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