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जनसत्ता- सियासी अखाड़ा, घात-प्रतिघात

उत्तराखंड का हरिद्वार शहर कहने को तो देवभूमि है, पर हकीकत में सियासत का अखाड़ा।
Author October 9, 2017 05:14 am
उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत (PTI Photo)

सियासी अखाड़ा
धर्म और राजनीति के रिश्तों पर अक्सर चिंतन-मनन होता रहा है। कुछ लोग जहां सियासत से धर्म का घालमेल अनुचित मानते हैं, वहीं इसके हिमायतियों के पास दलीलों की भरमार है। वे तो यही दलील देते हैं कि जो राजसत्ता धर्मसत्ता से निर्देशित नहीं होती, उसका पतन हो जाता है। बहरहाल, उत्तराखंड का हरिद्वार शहर कहने को तो देवभूमि है, पर हकीकत में सियासत का अखाड़ा। हरिद्वार का उपनगर है कनखल। यहां स्वामी प्रकाशानंद का बनाया जगदगुरु आश्रम धार्मिक गतिविधियों से कहीं ज्यादा सुर्खियों में सियासी गतिविधियों के कारण रहता है। पहले सिर्फ भाजपाई यहां मत्था टेकते थे पर अब तो कांग्रेसियों को भी ऐसा करने से परहेज नहीं रह गया। इस आश्रम के मौजूदा पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर राज राजेश्वराश्रम की गिनती पढ़े-लिखे साधुओं में होती है। भगवा चोला पहनने से पहले संघी थे। तभी तो आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत को यही आश्रम ज्यादा भाता है। हालांकि मत्था टेकने वालों में मुरली मनोहर जोशी से लेकर त्रिवेंद्र सिंह रावत और मनोहर लाल खट्टर तक भी शामिल हैं।

उत्तराखंड का तो कोई नेता बचा ही नहीं। हद तो पिछले दिनों हो गई, जब कांग्रेस के महासचिव और आरएसएस के कट्टर विरोधी दिग्विजय सिंह भी इस आश्रम में आ धमके। पत्रकारों से बातचीत में संघी साधु की तो जमकर तारीफ की पर मोदी और अमित शाह को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने साथ कांग्रेसी साधु प्रमोद कृष्णम को लाए थे दिग्गी। वही प्रमोद कृष्णम जिन्होंने यूपीए सरकार में रामदेव और बालकृष्ण के खिलाफ राष्ट्रपति से शिकायत की थी। दोनों पर संपत्ति के लिए अपने गुरु शंकरदेव को गायब करने का आरोप लगाया था। उन्हीं की शिकायत पर फर्जी तरीके से पासपोर्ट हासिल करने के आरोप में सीबीआइ ने बालकृष्ण को जेल भेजा था। दिग्विजय ने आन तोड़ दी तो कांग्रेस के सूबेदार प्रीतम सिंह ने भी आ टेका जगदगुरु आश्रम में मत्था। मुरली मनोहर जोशी से निकटता रही है राजराजेश्वराश्रम की। नरेंद्र मोदी की नीतियों के तो वे शुरू से आलोचक हैं। फिर क्यों भाजपाई उनके आश्रम में श्रद्धा से शीश नवा रहे हैं।

घात-प्रतिघात
राजस्थान में सियासत के दोनों बड़े खिलाड़ी मैदाने जंग में हैं। कांग्रेस के सूबेदार सचिन पायलट और भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे एक-दूसरे की घेराबंदी का कोई मौका नहीं चूक रहे। पायलट ने झालावाड़ इलाके में किसान पदयात्रा निकालने का एलान किया तो मुख्यमंत्री खेमे में खलबली मच गई। वसुंधरा का अपना इलाका है झालावाड़। पलटवार करने में देर नहीं लगाई। सचिन पायलट को उन्हीं के संसदीय क्षेत्र अजमेर में घेरा सरकार आपके द्वार कार्यक्रम के जरिए। हालांकि पायलट ने तो झालावाड़ में पूरे चार दिन लगाए। जंग की वजह अजमेर संसदीय सीट का उपचुनाव है। पायलट की अपनी सीट रही है अजमेर। लिहाजा उपचुनाव में भी चाहे-अनचाहे उतरना उन्हें ही पड़ेगा। ऐसे में वसुंधरा के लिए यह उपचुनाव अग्निपरीक्षा बन सकता है। सचिन पायलट खुद को गुर्जर समाज का सिरमौर समझते हैं। गुर्जरों की तादाद झालावाड़ में भी कम नहीं।

वसुंधरा खुद इसी इलाके से विधायक हैं और उनका बेटा दुष्यंत सांसद। यों उपचुनाव की अभी तक औपचारिक घोषणा हुई नहीं है। लेकिन दीवार पर इबारत लिखी साफ दिख रही हो तो तैयारी करनी ही पड़ेगी। अजमेर के अलावा अलवर लोकसभा सीट पर भी होगा उपचुनाव। 2014 में भाजपा ने कांग्रेस का सूपड़ा राजस्थान में साफ कर दिया था। ऐसे में दोनों सीटों पर कब्जा बनाए रखना भाजपा के लिए चुनौती बन गया है। सत्ता विरोधी माहौल के चलते पासा पलट भी सकता है। लिहाजा वसुंधरा ने अपने कई मंत्रियों को झोंक दिया है इन दोनों सीटों पर। नोटबंदी और जीएसटी के कारण लोगों में बढ़ी नाराजगी से भाजपा नेतृत्व अनजान नहीं है। यानी जीते तो राज्य सरकार की बल्ले-बल्ले और हार गए तो दोष केंद्र की जनविरोधी नीतियों पर। इस चक्कर में हाशिए पर चल रहे जमीनी कार्यकर्ताओं की कद्र दोनों ही पार्टियों में अचानक बढ़ गई है।

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