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राजपाट- ढाक के तीन पात

सूबे के चिकित्सा तंत्र का चौपट हो जाना हर किसी को अखर रहा है। और तो और भाजपा के विधायक तक कह रहे हैं कि अब लोगों के बीच जाने में शर्म आती है।

Author Published on: November 13, 2017 4:52 AM
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे

ढाक के तीन पात
राजस्थान सरकार की छवि पर सवाल उठ रहे हैं। सूबे के चिकित्सा तंत्र का चौपट हो जाना हर किसी को अखर रहा है। और तो और भाजपा के विधायक तक कह रहे हैं कि अब लोगों के बीच जाने में शर्म आती है। कोटा में सूबे के चिकित्सा मंत्री कालीचरण सर्राफ ने विभागीय अफसरों और जनप्रतिनिधियों की साझा बैठक बुलाई थी। उसमें विधायकों ने सरकार की पोल खोल दी। भवानी सिंह राजावत तो अफसरों के झूठे आंकड़ों से इतने नाराज हो गए कि बैठक का बहिष्कार कर दिया। प्रह्लाद गुंजल, चंद्रकांता मेघवाल, संदीप शर्मा और विद्या शंकर नंदवाना ने भी खूब खरी-खोटी सुनाई। कालीचरण सर्राफ ही नहीं दूसरे मंत्री प्रभुलाल सैनी भी हैरान रह गए। मंत्रियों को भी नहीं बख्शा। उन पर अफसरों का तोता बन जाने का आरोप जड़ा। जमीनी हकीकत उलट होने का खुलासा भी किया। दरअसल डेंगू ने कोटा के हालात बेकाबू कर रखे हैं।

विधायकों के हिसाब से डेंगू अब तक 160 लोगों की जान ले चुका है। पर अफसर इस आंकड़े को चार से आगे बढ़ाने को तैयार नहीं। कालीचरण सर्राफ को तेज तर्रार मंत्री माना जाता है। चिकित्सा विभाग उन्हें पिछले दिनों ही दिया है वसुंधरा राजे ने। कहने को कोटा है भाजपा का गढ़। लेकिन पार्टी के विधायकों को शासन-प्रशासन में कोई पूछता ही नहीं। कोटा की विधायक चंद्रकांता मेघवाल, उनके पति और समर्थकों की तो पुलिस ने पिछले दिनों थाने में ही धुनाई कर दी। पर दोषी पुलिस वालों का कुछ नहीं बिगड़ा। कोटा के कोचिंग संस्थानों में देश भर के लाखों युवक-युवतियां विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लेकिन बीमारी ने हालात बिगाड़ दिए हैं। शहर की सड़कों का भी बुरा हाल है। कोटा में ही लोग भाजपा सरकार से चिढ़े हैं तो सूबे के बाकी इलाकों का हाल क्या होगा? उधर अमित शाह को अपने संगठन की मजबूती की ही फिक्र चढ़ी है। इसी चक्कर में विधायक भड़ास निकाल रहे हैं कि संगठन भले मजबूत हो पर कार्यकर्ता तो निराश हैं। अगले चुनाव में भुगतना पड़ेगा अंजाम।

छुपे रुस्तम

जिसे धार्मिक, आध्यात्मिक और गैर राजनीतिक बताया था उस यात्रा की सियासी हलकों में ही सबसे ज्यादा चर्चा है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा यात्रा की बात कर रहे हैं हम। जो अभी बदस्तूर जारी है। पर इसके निष्कर्षों को तलाशने में भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी जुटी है। अरुण यादव, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ इसमें शरीक होकर पार्टी के भीतर कोई मतभेद नहीं होने का उपक्रम कर चुके हैं। पार्टी के प्रभारी महासचिव भी शामिल हो सकते हैं। इससे पार्टी के भीतर दिग्गी विरोधी खेमा हैरान है। आरएसएस के हमदर्द रहे स्वामी सत्यमित्रा नंद गिरि के पत्र ने भाजपा और संघ की चिंता बढ़ा दी है। अपने पत्र में उन्होंने न केवल इस यात्रा की तारीफ की है बल्कि खुद भी इसमें शामिल होने की इच्छा जता दी है। इसके बाद इंदौर में संघ प्रमुख मोहन भागवत और स्वामी सत्यामित्रा नंद गिरि की मुलाकात भी हुई। जिसे लेकर लोगबाग अपने-अपने तरीके से निहितार्थ निकाल रहे हैं। छह महीने है इस यात्रा का कार्यकाल। दिग्गी ने खुद यात्रा को निजी और धार्मिक ही रखा है। कोई सियासी चर्चा भी वे इन दिनों नहीं कर रहे। तभी तो अपनी पार्टी का झंडा भी साथ नहीं लेकर चल रहे। भाजपा के पूर्व विधायक राणा रघुराज सिंह तोमर ने इस यात्रा का स्वागत भी किया तो भाजपा आलाकमान की चिंता बढ़ गई होगी। उन्हें गले लगाने में दिग्गी ने कतई गुरेज नहीं किया। और तो और दिग्गी को सत्ता से बेदखल करने वाली भाजपा की केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने भी भोपाल में पत्रकारों से बातचीत में दिग्विजय सिंह को अपना भाई बता दिया। ऊपर से यह पेशकश और कर दी कि वे अगर बुलाएंगे तो यात्रा में जरूर शरीक होंगी।

अपनी मुखरता के लिए दिग्गी अक्सर चौतरफा आलोचना के शिकार होते रहे हैं। लेकिन इस परिक्रमा यात्रा में उन्होंने गजब का धीरज दिखाया है। जब तक यात्रा पूरी नहीं होगी यानी पूरे छह महीने तक नर्मदा का तट छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे वे। तभी तो मुख्यमंत्री शिवराज चौहान की 148 दिन चली नर्मदा सेवा यात्रा से भी कर रहे हैं अब इसकी लोग तुलना। पर चौहान की यात्रा को तो उनके पूर्ववर्ती भाजपाई मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर ने ही शाही यात्रा करार किया था। जो एक तो टुकड़ों में संपन्न हुई थी, ऊपर से सरकारी लाव-लश्कर साथ चला था। पर दिग्गी की यात्रा मध्य प्रदेश और गुजरात दोनों राज्यों से होकर गुजरेगी। विधानसभा क्षेत्रों की गणना करें तो मध्य प्रदेश के 110 और गुजरात के बीस क्षेत्रों से गुजरेंगे दिग्गी। अगले साल मार्च में जब तक यात्रा पूरी होगी तब तक दिग्गी लगभग आधा सूबा पैदल नाप चुके होंगे। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि उसके बाद ही शुरू हो जाएगी सूबे के विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया। अपनी यात्रा के अनुभवों का खुलासा करेंगे तब दिग्गी। जो भी हो कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं के इस यात्रा में शामिल होने से पार्टी की एकता का संदेश तो गया ही है। सूबे की सियासत से भले दिग्गी पिछले पंद्रह साल से अलग रहे हों पर यहां के कांग्रेसी नेताओं पर तो सबसे ज्यादा पकड़ उन्हीं की मानी जाती है। तो क्या यात्रा के बहाने वे विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की तरफ से सूबे की सत्ता के दावेदार बन जाएंगे, इस यक्ष प्रश्न का जवाब अभी कौन दे सकता है?

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