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राजपाट-पलटू हैं नीकु

अब देखना दिलचस्प होगा कि नीकु की इस मांग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया क्या होगी? केंद्र ने अगर इसे गंभीरता से न लिया तो नीकु की फजीहत तय है।

Author November 13, 2017 4:57 AM
बिहार के सीएम नीतीश कुमार

पलटू हैं नीकु
एक बार फिर खुद को दलितों का हितैषी जताने में जुट गए हैं अपने नीकु भाई। बिहार के मुख्यमंत्री अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि गैर सरकारी प्रतिष्ठानों में भी नौकरी में दलितों को आरक्षण मिलना चाहिए। अतीत में इस तरह की मांग उठती थी तो कभी नहीं बोले नीतीश उसके पक्ष में। तब तो चुप रहने में ही भलाई देखते थे। अब मुखर हो रहे हैं। पाठकों को बता दें कि बिहार में इस तरह की मांग लोजपा के मुखिया राम विलास पासवान और यूपी में बसपा सुप्रीमो मायावती करते रहे हैं। दोनों ने संसद में भी उठाई थी अलग-अलग मौकों पर अपनी मांग। नीतीश दूसरी बार राजग में आए हैं। केंद्र में भी अब बिहार की तरह राजग की ही सरकार ठहरी। अब देखना दिलचस्प होगा कि नीकु की इस मांग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया क्या होगी? केंद्र ने अगर इसे गंभीरता से न लिया तो नीकु की फजीहत तय है।

वे ही तो सुर बदल कर अब अचानक दुहाई देने लगे हैं कि राज्य और केंद्र दोनों जगह एक गठबंधन की सरकार है तो इससे लोगों के हित में ज्यादा काम होगा। साफ है कि अब नीकु की प्रतिष्ठा को बचाना केंद्र के हाथ में है। वहां राम विलास पासवान मंत्री हैं ही। उनसे अब नीकु के रिश्ते मधुर हैं। तो भी पासवान ने मुंह नहीं खोला है। हां, मायावती ने नीकु को खूब खरी-खोटी सुनाई है। सुझाया है कि वे बड़ी-बड़ी बातें कर दलितों को मोदी की तरह झांसा न दें। अगर सच्चे हैं तो हकीकत में उनके लिए कुछ करके दिखाएं। एक तरह से नीतीश को चुनौती दी है कि वे बोलने के बजाए खुद लागू करें। कम-से-कम बिहार के गैर सरकारी प्रतिष्ठानों में लागू करके। एक दौर था जब दलित नेताओं ने नीकु पर दलितों की एकता को तोड़ने का आरोप लगाया था। नीकु ने जब दलित और महादलित का कार्ड खेला था तो खुद पासवान ने भी जमकर आलोचना की है। केवल पासवान की जाति को छोड़ बाकी सभी दलित जातियों को महादलित घोषित कर दिया था। अब महादलित का मुद्दा गौण है। अब तो बस दलित मोह ही दिखा रहे हैं।
बेचारगी महाराज की
सतपाल महाराज ने किस घड़ी में भाजपा में शामिल होने का फैसला किया था। उन्हें वैसा कुछ हासिल नहीं हो पाया इस पार्टी में अब तक जिसकी अपेक्षा पाली होगी। कांग्रेस में कद्दावर नेता के नाते धमक थी। पत्नी अमृता रावत को हरीश रावत की सरकार में मंत्री पद हासिल था। लोकसभा चुनाव से पहले शामिल हुए थे भाजपा में। पर इस पार्टी ने लोकसभा टिकट नहीं दिया। विधानसभा चुनाव से पहले पत्नी को भी भाजपा में शामिल कराना मजबूरी हो गया। पर चुनाव में टिकटों की बारी आई तो अमित शाह ने पति-पत्नी में से एक के लिए किया टिकट का प्रावधान। सतपाल महाराज खुद लड़े। तब सोचा होगा कि शायद भाजपा उन्हें सूबे का मुख्यमंत्री बना दे। लेकिन मुख्यमंत्री पद तो दूर ढंग का अव्वल तो मंत्रालय ही नहीं मिला, ऊपर से मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने धमक भी नहीं बनने दी उनकी। अब तो कांग्रेस के नेताओं के साथ भाजपा के नेता भी उन्हें हाशिए पर धकेलने में जुट गए हैं। उनके क्षेत्र पौड़ी में उनके छोटे भाई भोलेजी महाराज ने एक अस्पताल बनाया। जिसके उद्घाटन समारोह में त्रिवेंद्र सिंह रावत ही नहीं भुवनचंद खंड़ूड़ी, हरीश रावत, प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदेश सभी जा पहुंचे। एक तरह से सतपाल महाराज के खिलाफ सियासत का आधार बन गया यह उद्घाटन।

हरीश रावत जब मुख्यमंत्री थे तो सतपाल महाराज का कद तराशने की मंशा से भोलेजी महाराज को खूब बढ़ावा देते थे। दरअसल दोनों सगे भाईयों में छत्तीस का आंकड़ा ठहरा। जब से उत्तराखंड राज्य बना है, दोनों कभी एक साथ किसी एक मंच पर नजर नहीं आए। सतपाल महाराज के कांग्रेस छोड़ने की एक वजह हरीश रावत का भोलेजी महाराज को तरजीह देना भी रही होगी। त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में मंत्री बनने को तैयार नहीं थे सतपाल महाराज। पर अमित शाह ने मनाया तो मजबूरी में मंत्री पद की शपथ लेनी पड़ी। दरअसल त्रिवेंद्र सिंह रावत को सतपाल महाराज के विरोधियों ने भड़का रखा है। यही कि डोईवाला सीट पर सतपाल महाराज उन्हें विधानसभा चुनाव हरवाना चाहते थे। इस मामले में वे रमेश पोखरियाल निशंक से साठ-गांठ बनाए थे। पर भोलेजी महाराज और उनकी पत्नी मंगला देवी ने यहां उनकी खूब मदद की। भाजपा में अपनी उपेक्षा से त्रस्त सतपाल महाराज के बारे में यह चर्चा आम है कि वे बागी कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत से मिल गए हैं। दोनों ही अंदरखाने मुख्यमंत्री को सबक सिखाने के लिए सही अवसर की तलाश में हों तो इसमें अचरज कैसा?

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