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पड़ोसी फर्ज

एक तो दोनों की सीमाएं आपस में सटी हैं। दूसरे दोनों ही पर्वतीय और आकार में छोटे सूबे ठहरे। हां, हिमाचल की उमर जरूर उत्तराखंड से ज्यादा ठहरी।

Author November 6, 2017 5:54 AM
प्रधानमंत्री मोदी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में जनसभा को संबोधित करते हुएं।

पड़ोसी फर्ज

उत्तराखंड से करीबी नाता है हिमाचल का। एक तो दोनों की सीमाएं आपस में सटी हैं। दूसरे दोनों ही पर्वतीय और आकार में छोटे सूबे ठहरे। हां, हिमाचल की उमर जरूर उत्तराखंड से ज्यादा ठहरी। एक और मिजाज भी मिलता है इन सूबों का। दोनों में ही दो दलीय सियासत चलती है- कांग्रेस और भाजपा। उत्तराखंड में पिछली सरकार कांग्रेस की थी, मार्च में उसे बेदखल कर भाजपा सत्ता में आ गई। अब उसका लक्ष्य हिमाचल है। सो उत्तराखंड के नेताओं को भी काम मिल गया है पड़ोसी सूबे में। भाजपा ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की चुनावी सभाएं लगाई हैं तो कांग्रेस की तरफ से उसके सूबेदार प्रीतम सिंह पड़ोसी सूबे की रैलियों में बोल रहे हंै। दोनों राजपूत ठहरे। छवि भी दोनों की ही बेदाग रही है। प्रीतम सिंह का अपना विधानसभा क्षेत्र चकरौता तो हिमाचल की सीमा से ही सटा है। हिमाचल में सगे-संबंधी भी हैं उनके। दोनों ही सूबों में पलायन की समस्या बड़ी है। तभी तो प्रधानमंत्री ने उत्तराखंड के चुनाव में अपनाई भाषा को ही हिमाचल में भी दोहराया है यानी पहाड़ की जवानी और पानी दोनों के सदुपयोग का वादा कर रहे हैं।

उड़नखटोले, मंत्री और धुंध
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार जोरों पर हैं। कांग्रेस व भाजपा में एक-दूसरे पर हमला करने की होड़ लगी हैं। भाजपा ने अपना प्रचार आक्रामक किया हुआ हैं। कांग्रेस को घेरने का भाजपा कोई मौका नहीं चूकने देना चाहती है। चूंकि भाजपा के प्रदेश के नेता चुनाव में कूदे हैं तो दिल्ली से मोदी सरकार के मंत्रियों की ड्यूटी लगाई गई है। बाकी नेता तो हैं ही। राजधानी शिमला के एक महंगे होटल में बाकायदा मीडिया सेंटर खोला हुआ हैं। दिल्ली से मंत्री उड़नखटोले में उड़ कर आते हैं और जुबानी गोला दाग कर चले जाते हैं। पर बीते सप्ताह भाजपा के साथ बुरी हुई। शिमला ग्रामीण से मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पुत्र विक्रमादित्य सिंह बतौर कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं । उनके खिलाफ भाजपा ने मुख्यमंत्री के वफादार रहे प्रमोद शर्मा को टिकट दिया। इससे भाजपा का कैडर खफा भी हुआ। शिमला ग्रामीण में ठाकुर वोट अच्छा खासा हैं तो उन्हें रिझाने भाजपा ने मोदी सरकार में ठाकुर मंत्री गृहमंत्री राजनाथ सिंह की शोघी में रैली रखी। लेकिन फिर वही हुआ।

धुंध ने अड़ंगा डाल दिया। ऐसा ही केंद्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद के साथ भी हुआ। वे कांग्रेस की ओर से जारी घोषणा पत्र का जवाब देने आने वाले थे। सारा इंतजाम भी हो गया था। मीडिया को भी बुला लिया गया था। लेकिन पता चला कि दिल्ली से उड़नखटोला ही नहीं उड़ा। तो दूसरे मंत्री थावर चंद गहलोत मीडिया से रूबरू हुए। तब कहीं जाकर लाज बची। इसके एक दिन बाद केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को आना था। वे भी नहीं आ पाए। पता चला कि जुब्बड़हटटी हवाई पटटी पर धुंध ज्यादा थी तो उड़नखटोला फेरा लगाकर लौट गया। मंत्री जगत प्रकाश नडडा ने जुब्बल कोटखाई में रैली करनी थी। उनके साथ भी ऐसा ही हुआ। तो वहां धूमल रैली कर आए। ऐसे में मीडिया वाले, बोले उफ ये बेईमान धुंध। ऐन मौके पर पर छुरियां चला रही है।

धर्मसंकट में बेटियां

चुनाव हैं कि किसी को भी धर्मसंकट में डाल सकते हैं। सोलन सीट पर कुछ ऐसा ही हुआ है। वीरभद्र सरकार में मंत्री रहे कर्नल धनीराम शांडिल को कांग्रेस ने चुनाव मैदान में उतारा तो भाजपा भी कहां पीछे रहने वाले थी। उनके दामाद राजेश कश्यप को टिकट दे दिया। अब दोनों ससुर -दामाद आ गए आमने सामने। अब मुश्किल में रिश्तेदार। किसके साथ खड़े हों और किसके खिलाफ। पर सबसे ज्यादा मुश्किल में हैं शांडिल साहब की दोनों बेटियां। एक बेटी तो लुके छिपे अपने पति राजेश कश्यप के लिए वोट मांग रही हैं। चूंकि वे सरकारी नौकरी में हैं तो खुल कर ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकतीं।

वैसे उन्हें चुनावों में कैसे काम होता हैं ये बखूबी पता हैं। उनके जेठ वीरेंद्र कश्यप शिमला संसदीय हलके से भाजपा के सांसद हैं। शांडिल साहब की दूसरी बेटी भी धर्मसंकट में हैं कि इस बार जीजा के साथ जाएं या पिता के साथ। पर वे नामांकन से लेकर प्रचार तक पिता शांडिल के साथ हैं। बेटियां तो धर्मसंकट में ही, खुद सुसर व दामाद भी धर्मसंकट में हैं। क्या बोले और क्या न बोलें वाली स्थिति हैं। चुनावों में तो वैसे भी प्रतिद्वंद्वियों के कपड़े उतार दिए जाते हैं। लेकिन यहां घर का मामला हैं तो नजारा अलग हैं। पर बांट तो दिया ही है न परिवार को इस राजनीति ने। इसे ही तो राजनीति कहते हैं।

 

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