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राजपाट- गुस्सा बरकरार

ममता के मुताबिक तो मोदी सरकार अपनी साख भी गवां चुकी है और जवाबदेही भी।

Author Updated: November 13, 2017 4:59 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (file photo)

गुस्सा बरकरार
नोटबंदी की चर्चा हो और दीदी खामोश रह जाएं ये कतई संभव नहीं। गए हफ्ते एक साल पूरा हुआ तो मोदी सरकार जहां नोटबंदी से हुए फायदों का ढिंढोरा पीटने में जुट गई वहीं कांग्रेस और वामपंथी सरकार के इस फैसले की धज्जियां उड़ाते दिखे। ऐसे में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तेवर भी उग्र रहने ही थे। वे तो हफ्ता भर पहले से ही नोटबंदी को घपला बता इसकी जांच की मांग दोहराने लगीं। साथ ही यह आरोप अलग जड़ दिया कि भाजपा नेताओं ने अपने कालेधन को सफेद बनाने के मकसद से की थी नोटबंदी। चीनी कंपनियों के फलते-फूलते कारोबार के बहाने भी मोदी सरकार पर वार करना नहीं भूलीं। सवाल दाग दिया कि अली बाबा और पेटीएम जैसी कंपनियों के खिलाफ चीन तो जांच कर रहा है पर भारत सरकार इनको बढ़ावा दे रही है।

लगे हाथ गुजरात चुनाव पर भी टिप्पणी कर डालीं। फरमाया कि भाजपा वहां नैतिक रूप से तो पहले ही हार चुकी है। अगर भाजपा से लोगों का वहां वाकई अगाध प्रेम होता तो उसे अपने इस गढ़ में भी पचास रैलियां करने की जरूरत क्यों होती? सारे केंद्रीय मंत्री ही नहीं दूसरे सूबों के मुख्यमंत्रियों तक की जरूरत पड़ गई नरेंद्र मोदी और अमित शाह को गुजरात में। इसीलिए ममता ने निचोड़ निकाल लिया कि गुजरात के लोग अब भाजपा से खुश नहीं और अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव में चपत लगा देंगे। सूरत के लोगों की बेरोजगारी का भी जिक्र कर दिया। ममता के मुताबिक तो मोदी सरकार अपनी साख भी गवां चुकी है और जवाबदेही भी।

जाल में नीकु

नीतीश कुमार क्या करें? संविदा शिक्षकों के मामले में वे अपने ही बुने जाल में फंस गए। इन शिक्षकों की जीत नीतीश के लिए मुश्किल बन गई है। अपनी मांगों को लेकर बिहार के संविदा शिक्षक अरसे से कर रहे थे आंदोलन। नीतीश पर बड़ा भरोसा था। सोचा होगा कि वे एक दिन तो उनकी मांग को पूरा कर ही देंगे। मांग पूरी करने में नीतीश को अड़चन महसूस हुई होगी। वेतन बढ़ाने की मांग किसी की भी हो, सरकारी खजाने पर तो बोझ पड़ता ही है। सो, नीतीश के राज में उन्होंने वेतन बढ़वाने के लिए आंदोलन किया तो बदले में लाठियां खानी पड़ी। मजबूरी में अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने उम्मीद से ज्यादा दरियादिली दिखाई। दो टूक कहा कि नियमित शिक्षकों के बराबर वेतन और सुविधाएं दी जाएं संविदा शिक्षकों को भी।

देर-सवेर अदालत के आदेश को तो मानना ही पड़ेगा। इन संविदा शिक्षकों की नियुक्ति खुद नीतीश सरकार ने ही तो की थी। जब नियुक्तियां की थी तब तो खूब वाहवाही लूटी। साढ़े तीन लाख लोगों को रोजगार देना हंसी खेल होता भी नहीं। सो, नीतीश का गुणगान खूब हुआ था। जाहिर है कि सियासी फायदा भी जरूर मिला होगा। संविदा शिक्षक नीतीश के दीवाने हो गए थे। पर वेतन बढ़ाने और नौकरी पक्की करने की मांग भला वे कब तक न करते। जैसे ही यह मांग उठाई, नीतीश के तेवर तीखे होने लगे। अब अदालत से आदेश हुआ है तो उस पर अमल करने के बाद भी श्रेय कैसे ले पाएंगे नीतीश।

 

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