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शेर की सवारी

गोरखालैंड राज्य के आंदोलन को लेकर कुछ ऐसी ही गत हो गई है भाजपा की। दार्जीलिंग की एक लोकसभा सीट का लालच अब भारी पड़ रहा है।
Author June 19, 2017 07:26 am

शेर की सवारी
पुरानी कहावत है कि आग से खेलना खतरे से खाली नहीं होता। कई बार ऐसे खिलाड़ी खुद ही जल जाते हैं आग में। गोरखालैंड राज्य के आंदोलन को लेकर कुछ ऐसी ही गत हो गई है भाजपा की। दार्जीलिंग की एक लोकसभा सीट का लालच अब भारी पड़ रहा है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चे से जब दोस्ती का हाथ बढ़ाया था तब तो अंदाज ही नहीं था कि कभी पश्चिम बंगाल में सत्ता पाने का सपना देख सकते हैं। 2009 में अलग गोरखालैंड राज्य की बिमल गुरुंग की मांग का समर्थन कर जसवंत सिंह को लोकसभा में भेजने में कामयाब हो गई थी भाजपा। हालांकि सफाई यही दी थी कि वह तो जनसंघ के जमाने से ही छोटे राज्यों के गठन की हिमायती रही है। 2014 में जसवंत की जगह एसएस अहलुवालिया को दिया था दार्जीलिंग से टिकट। पर बाद में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुुनाव के दौरान जनाधार बढ़ता दिखा तो किनारा करने लगी भाजपा अलग गोरखालैंड राज्य के गठन के अपने वादे से। अब तो गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के नेताओं से मिलने तक को तैयार नहीं होते अमित शाह।

ममता बनर्जी के खिलाफ चल रहे आंदोलन से भी बाहर से भले खुश हों, पर अंदरखाने परेशान हैं। ममता दो टूक कह चुकी हैं कि उनके रहते राज्य का बंटवारा नहीं हो सकता। भाजपा को भी अब यही भाषा बोलने में दीर्घकालिक हित दिखने लगा है। एक लोकसभा सीट के लालच में सूबे की सत्ता का मोह छोड़ना भला कोई बुद्धिमानी होगी। गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के नेता भी अब भाजपा की असलियत पहचान चुके हैं। वे इस तर्क से कतई सहमत नहीं कि अलग राज्य तब तक नहीं बन सकता जब तक पश्चिम बंगाल विधानसभा इसका प्रस्ताव पारित न कर दे। गुरुंग और उनके साथी रोशन गिरि ने भाजपा नेताओं की तेलंगाना के उदाहरण से बोलती बंद कर दी है। आंध्र प्रदेश की विधानसभा ने तो अलग तेलंगाना राज्य के विरोध में किया था प्रस्ताव पारित। तो भी केंद्र की मनमोहन सरकार ने अपने अधिकार का इस्तेमाल कर बना ही दिया अलग तेलंगाना।

 

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