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राजपाट- वजूद की लड़ाई

लालू यादव अब गंभीरता से भविष्य की फिक्र कर रहे हैं। अपनी पार्टी राजद को मजबूत करने के सिवा कोई एजंडा नहीं।

Author October 16, 2017 5:21 AM
पटना में पत्रकारों को संबोधित करते लालू यादव और तेजस्वी यादव (फोटो-पीटीआई )

वजूद की लड़ाई
लालू यादव अब गंभीरता से भविष्य की फिक्र कर रहे हैं। अपनी पार्टी राजद को मजबूत करने के सिवा कोई एजंडा नहीं। उपाय भी सोच रखे हैं। पत्नी राबड़ी को पारंगत कर रहे हैं। छठ पूजा के बाद राबड़ी देवी अपनी ताकत दिखाएंगी। लालू ने पार्टी की मजबूती के लिए कार्यक्रमों की शृंखला तैयार की है। तमाम नेताओं को झोंकने की तैयारी है। पार्टी के यादव नेता ज्यादा मुखर दिखेंगे। विभिन्न मुद्दों को लेकर वे बिहार और केंद्र दोनों ही सरकारों से टकराने के मूड में आ गए हैं। राजद के नेताओं को समझ आ गया है कि नीतीश और भाजपा मिलकर लालू और उनके परिवार को परेशान कर रहे हैं। इस तरह तो यादव सूबे की सियासत में हाशिए पर पहुंच जाएंगे। लालू अब बिहार के यादवों के स्वाभिमान, सम्मान और वजूद के प्रतीक बन गए हैं। लिहाजा इस बार लालू ने भाजपा और नीतीश से आर-पार की लड़ाई लड़ने की ठान ली है। जितना केंद्र सरकार की एजंसियां लालू और उनके परिवार को जांच-पड़ताल के बहाने परेशान करेंगी, उतना ही माकूल जवाब लालू अपनी सियासी ताकत के बल पर देना चाहेंगे।
खतरे की घंटी
गुरदासपुर की हार भाजपा के लिए तो करारा झटका है ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के ग्राफ पर भी सवालिया निशान है। लगातार चार बार जीत कर दी थी विनोद खन्ना ने भाजपा को पंजाब की यह लोकसभा सीट। उनकी पत्नी कविता खन्ना को उपचुनाव में उम्मीदवार बनाया होता तो शायद गत इतनी बुरी नहीं होती भाजपा की। कांग्रेस के उम्मीदवार सुनील जाखड़ को बाहरी बता कर कितना विरोध किया भाजपा और शिरोमणि अकाली दल ने। आमतौर पर लोकसभा में जीत उसी पार्टी की होती है जिसकी केंद्र में सरकार हो। फिर यह तो पहले से ही सीट भाजपा की थी। भाजपा के स्वर्ण सलारिया का स्थानीय बनाम बाहरी वाला मुद्दा पिट गया। एक लाख 93 हजार से हारने के बाद विलाप करते दिखे भाजपाई। सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप जड़ कर खीझ मिटाई। हकीकत तो यह है कि भाजपा को पहले ही अहसास हो गया था कि गुरदासपुर अब उसके हाथ से गया। तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उपचुनाव का रुख नहीं किया। उधर, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की वाह वाह होनी ही थी। वे भी उस्ताद निकले। नतीजा निकलते ही फरमाया कि गुरदासपुर की जीत राहुल गांधी को पंजाब कांग्रेस की तरफ से दिवाली का तोहफा है। भाजपाई इस हार से सबक लेंगे, लगता नहीं। हार की खबर तो हर तरफ से आने लगी हैं। देश के जितने भी विश्वविद्यालयों में पिछले दिनों छात्र संघ चुनाव हुए हैं, लगभग सभी जगह भाजपा का छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद बुरी तरह परास्त हुआ है। और तो और जिस यूपी ने मार्च में भाजपा को बंपर जीत देकर सूबे की सत्ता से डेढ़ दशक का उसका वनवास खत्म किया था, उसी के इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी विद्यार्थी परिषद ढेर हो गई। विश्व विद्यालय छात्र संघों के नतीजे और भी ज्यादा संवेदनशील माने जाएंगे क्योंकि इनसे युवा तबके की नाराजगी झलकती है। 2014 के चुनाव से पहले युवा शक्ति के लिए मोदी एक आदर्श की तरह बन गए थे। पर इसी तबके की साढ़े तीन साल के राज में भी कोई अपेक्षा और आकांक्षा पूरी नहीं होना नाराजगी की वजह बन रहा है। अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इसे खतरे की घंटी मान सकते हैं।

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