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राजपाट- चौपट विकास

विकास की फिक्र है न कानून व्यवस्था के मोर्चे पर हालात संतोषजनक हैं। और तो और प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी आवास योजना तक को अहमियत नहीं दे रही योगी सरकार।

Author October 23, 2017 04:57 am
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। (फोटो पीटीआई)

चौपट विकास
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को सत्ता में आए छह महीने से ज्यादा हो गए हैं। लेकिन कोई खास धमक अभी तक नहीं छोड़ पाए हैं योगी। विकास की फिक्र है न कानून व्यवस्था के मोर्चे पर हालात संतोषजनक हैं। और तो और प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी आवास योजना तक को अहमियत नहीं दे रही योगी सरकार। केंद्र खूब ढिंढोरा पीट रही है कि 2022 तक देश में कोई बेघर नहीं बचेगा। इसके लिए सस्ते मकान जरूरी हैं। कहने को प्रधानमंत्री आवास योजना गरीबों और कम आमदनी वालों को घर का मालिक बनाने की मंशा से लाई गई है। लेकिन उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने अभी तक इसे प्रोत्साहित करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली है। जबकि उत्तराखंड की भाजपा सरकार बाकायदा लिखित आदेश जारी कर चुकी है। इस योजना के तहत सस्ते मकान मुहैया कराने वाले बिल्डरों को विकास शुल्क और मानचित्र शुल्क से माफी है। उनके मानचित्र संबंधित विकास प्राधिकरणों को तत्काल मंजूर करने चाहिए। पर उत्तर प्रदेश के सरकारी प्राधिकरण प्रधानमंत्री आवास योजना को घास नहीं डाल रहे। एतराज उनका बेतुका है भी नहीं।

वे तो राज्य सरकार से बंधे हैं। योगी सरकार कोई आदेश जारी करे तो वे अमल करें। मथुरा के कोसी कलां में 50 एकड़ की यमुना रेजीडेंसी आवास योजना बना कर पांच हजार रुपए महीने की किस्त पर गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों को मकान देने के बिल्डर के सपने को मथुरा विकास प्राधिकरण ने चकनाचूर कर दिया। बिल्डर ने योगी के दरबार में फरियाद लगाई तो निर्माण स्थल पर सील लग गई। योगी ने बिल्डर के प्रयास की सराहना तो की पर प्रधानमंत्री आवास योजना पर अमल का कोई आदेश आज तक जारी नहीं किया। विकास की और भी तमाम योजनाएं फाइलों में ही अटकी हैं। मायावती ने ताज एक्सप्रेसवे बनाया था तो अखिलेश यादव ने आगरा से लखनऊ तक यमुना एक्सप्रेसवे। लेकिन योगी सरकार को तो विकास की कतई फिक्र नहीं। ऊपर से सचिवालय में ऐसे कथित ईमानदार अफसरों का जमावड़ा कर लिया, कामकाज में जिनकी कतई दिलचस्पी नहीं। एक तरह से यथास्थितिवाद में फंस कर रह गई है योगी सरकार।
सियासी पैंतरा
जंग का पहला राउंड दीदी के नाम रहा। पश्चिम बंगाल की दीदी यानी ममता बनर्जी और केंद्र सरकार के बीच चल रही है यह जंग। दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र से केंद्रीय सुरक्षा बलों की वापसी के मुद्दे पर अचानक छिड़ गई थी इस बार यह जंग। केंद्र ने अपने सुरक्षा बलों की 15 कंपनियां जून में तैनात की थीं पश्चिम बंगाल के गोरखा आंदोलन प्रभावित इलाके में। दरअसल ममता बनर्जी की सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में बंगला को अनिवार्य भाषा के रूप में लागू करने का फरमान जारी कर खुद ही सुलगाया था शांत समझे जाने वाले पर्वतीय क्षेत्र को। गोरखा आबादी वाले इस इलाके में भाषा थोपने का विरोध होना ही था। शुरुआत सरकार के फरमान के विरोध से हुई। पर बदल गई अलग गोरखालैंड राज्य की मांग के सवाल में। बहरहाल ममता ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के इस बेमियादी आंदोलन को तो अपनी तिकड़म और पैंतरों से तोड़ दिया पर केंद्र ने आंदोलन की समाप्ति के जनमुक्ति मोर्चे के फैसले के बाद अपने सुरक्षा बलों की वापसी का फरमान सुनाया तो ममता लाल-पीली हो गईं।

चुनाव और त्योहारों का हवाला दिया। सो, पहले 15 में से 10 कंपनियां वापस बुलाने की बात पर अड़ा केंद्र सात कंपनियां बुलाने पर मान गया। वह भी ममता बनर्जी की गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ बातचीत में तल्खी के बाद। ममता ने केंद्र को पत्र लिख सूबे के गोरखा इलाके को संवेदनशील बता अभी सुरक्षा बल वापस नहीं मांगने का आग्रह किया था। केंद्र ने उनकी मांग को अधूरा माना तो नाराज ममता कोलकाता हाई कोर्ट चली गईं। हाई कोर्ट ने केंद्र को फरमान सुना दिया कि 27 अक्तूबर तक कतई वापस न बुलाएं अपने सुरक्षा बल। केंद्र से 23 अक्तूबर को सफाई भी मांग ली। अगली सुनवाई 27 अक्तूबर को होगी। तब साफ होगा कि अदालत क्या रुख अपनाएगी। पर पहला राउंड तो ममता ने जीत ही लिया।

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