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राजपाट- शतरंजी चालें

गनीमत है कि 403 में से एक भी टिकट मुसलमान को नहीं देने का आरोप झेलने के बाद कम से कम मंत्रिमंडल में तो मोहसिन रजा जगह पा गए हैं। बंपर जनादेश के चलते विरोध में कुछ नहीं है।

Author March 20, 2017 4:42 AM
सीएम पद का कार्यभार संभालने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते योगी आदित्यनाथ (Source-ANI)

क्या सवा तीन सौ विधायकों में एक भी मुख्यमंत्री पद के लायक नहीं था। भाजपा भले इस सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हो, पर सवाल तो स्वाभाविक है। मान लें कि मुख्यमंत्री बाहर से लाना अनुकूल हो तो भी दो-दो उपमुख्यमंत्री बनाने का नया प्रयोग भाजपा के चाल और चेहरे के कतई अनुकूल नहीं लगता। दोनों उपमुख्यमंत्री भी ऐसे जो विधान मंडल से नाता नहीं रखते। दिनेश शर्मा लखनऊ के मेयर हैं। जबकि केशव मौर्य और योगी आदित्यनाथ लोकसभा सदस्य। एक तरफ जात-पात की सियासत से ऊपर उठने का दावा, तो दूसरी तरफ असंतोष को थामने के लिए सामाजिक समीकरणों को साधने की विवशता। बहरहाल चर्चा मनोज सिन्हा की और बन गए आदित्यनाथ। जाहिर है कि पर्दे के पीछे दबाव और लॉबिंग की सियासत से बच नहीं पाई अनुशासित पार्टी। योगी तो बागी तेवर दिखाने के मामले में शुरू से ही पराक्रमी रहे हैं। पर धैर्य केशव मौर्य भी कहां रख पाए। जैसे ही नंबर कटा, रक्तचाप इतना बढ़ गया कि अस्पताल जाना पड़ गया। जो भी हो, भाजपा ने अब साफ संकेत दे दिया है कि विकास के बजाए उसकी प्राथमिकता हिंदुत्व है और चिंता अगले लोकसभा चुनाव में 2014 के प्रदर्शन को दोहराने की है। गनीमत है कि 403 में से एक भी टिकट मुसलमान को नहीं देने का आरोप झेलने के बाद कम से कम मंत्रिमंडल में तो मोहसिन रजा जगह पा गए हैं। बंपर जनादेश के चलते विरोध में कुछ नहीं है।

लिहाजा योगी आदित्यनाथ और उनकी टीम के सामने अब असली चुनौती अच्छे प्रदर्शन की रहेगी। मुश्किल यह है कि मंत्रिमंडल में अनुभवी चेहरों की कमी है। मुख्यमंत्री और उनके दोनों उप-मुख्यमंत्री सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं रखते। सूर्य प्रताप शाही, सुरेश खन्ना, राजेश अग्रवाल, धर्मपाल सिंह, रमापति शास्त्री और लक्ष्मी नारायण चौधरी व नंदगोपाल नंदी जरूर अतीत में मंत्री रह चुके हैं। भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ अन्याय किया है। मुख्यमंत्री और दोनों उपमुख्यमंत्री पूरब के हैं। मेरठ और सहारनपुर मंडलों से महज तीन मंत्री बनाए हैं। इनमें भी कैबिनेट स्तर का कोई नहीं। धर्म सिंह सैनी और सुरेश राणा जहां स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री हैं, वहीं गाजियाबाद के अतुल गर्ग को महज राज्यमंत्री बनाया है। मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, नोएडा, बुलंदशहर, बिजनौर और हापुड़ जिलों का नंबर ही नहीं आ पाया। हालांकि फिलहाल मंत्रिमंडल का आकार सूबे की आबादी और सीटों के हिसाब से छोटा ही माना जाएगा। विधान परिषद में पार्टी की स्थिति काफी कमजोर है। ऐसे में जो चार मंत्री किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं, उन्हें छह महीने के भीतर विधान मंडल में लाना पार्टी के लिए अगली चुनौती होगी। सत्ता की बंदरबांट के खेल में कल्याण सिंह सब पर भारी पड़े। वे खुद राजस्थान के राज्यपाल हैं तो बेटे राजवीर सिंह एटा से लोकसभा के सदस्य। अब पौत्र संदीप सिंह पुश्तैनी अतरौली से विधानसभा चुनाव जीत कर मंत्री भी बन गए हैं। जाहिर है कि पिछड़ों का जिस तरह का प्रबल जनसमर्थन इस चुनाव में पार्टी को मिला है, उसे देखते हुए मुख्यमंत्री पद उत्तराखंड की तरह यूपी में भी राजपूत बिरादरी को ही देने वाली पार्टी मंत्री पदों के मामले में यूपी में पिछड़ों की और अनदेखी कर भी कैसे सकती थी।

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