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राजपाट- भयभीत पलायन

इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बारे में सियासी पंडित भी पूर्वानुमान लगाने में डर रहे हैं।

Author February 20, 2017 05:15 am
उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में त्रिशंकु नतीजे आ सकते हैं।

इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बारे में सियासी पंडित भी पूर्वानुमान लगाने में डर रहे हैं। एक तो चुनाव सात चरणों में है ऊपर से किसी की हवा है न आंधी। वैसे भी हर इलाके का अपना अलग मिजाज है। अखिलेश यादव को छोड़ और किसी का कोई ठोस चुनावी मुद्दा भी नजर नहीं आता। अभी तीन चरण का ही चुनाव निपटा है कि हर कोई जुट गया है लंबे-चौड़े दावे करने में। अमित शाह ने तो पहले ही चरण में भाजपा की सुनामी देख ली थी। तीन सौ सीटें जीतने का भरोसा है उन्हें। जबकि विरोधियों द्वारा जिनके सियासी वजूद को ही नकारा जा रहा है वे मायावती अपनी सरकार बनाने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त होने का दम भर रही हैं। सपा और कांग्रेस गठबंधन तो मान कर चल ही रहा है कि दोबारा अखिलेश ही बनेंगे मुख्यमंत्री। गनीमत है कि अखिलेश सिर्फ बहुमत की सरकार का दावा कर रहे हैं, तीन सौ से ज्यादा सीटें जीतने का नहीं। चुनावी वादों की बात करें तो तमाम नेता झूठ के हमाम में पूरी तरह नंगे और लबरेज दिखते ही हैं, सीटों के उनके पूर्वानुमान पर भी हंसी आती है। लेकिन जो झूठ बोलने में माहिर होता है वह बेशर्म तो होता ही है। मुद्दों की बात करें तो भी भ्रम कायम है। नोटबंदी का मुद्दा अब उतना मुखर नहीं रहा। हालांकि भाजपा को वही जीत का ब्रह्मास्त्र नजर आता है।

मोदी की गरीबों के मसीहा के नए अवतार के रूप में दलितों-गैर यादव पिछड़ों और अतिपिछड़ों में पुख्ता पैठ दिख रही है भाजपा नेताओं को। 1971 के इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ नारे से तो पहले ही तुलना कर दी थी। इंदिरा ने तो बैंकों का राष्ट्रीयकरण और राजाओं की पेंशन बंद की थी। मोदी ने तो नोटबंदी से गरीबों की तकलीफ ही बढ़ाई है। बहरहाल इसे भी देखने के अलग-अलग नजरिए हैं। भाजपाई कह रहे हैं कि गरीब इस बात से खुश है कि मोदी कालाधन रखने वालों के खिलाफ कड़े तेवर दिखा रहे हैं। उनकी साख बरकरार है। भले लोकसभा चुनाव में किए वादे पूरे न किए हों। तो विरोधी फरमा रहे हैं कि गरीब इसलिए खफा है कि पहले तो अपनी मेहनत की कमाई को बचाने के चक्कर में बैंक की कतार में लगना पड़ा। अब मंदी ने रोजगार छीन लिया। जो भी हो चुनाव में घूम फिर कर कोशिश सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण और जातीय समीकरण बिठाने की ही करते रहे सारे सूरमा। मोदी के मसीहाई अवतार का विरोधियों ने मजाक भी कम नहीं उड़ाया। मसलन, उत्तर प्रदेश में किसानों के कर्ज माफ कर देने का वादा करने वाली पार्टी के पास सबूत के तौर पर कोई तथ्य नहीं है कि देश के जिन राज्यों में उसकी सरकारें हैं, वहां के किसान कितने खुशहाल हैं। उनका कर्ज माफ क्यों नहीं हुआ? उन्हें ब्याजरहित कर्ज देने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की।

अखिलेश ने कांग्रेस से गठबंधन किया तो भाजपा क्यों उसे मुद्दा बनाती घूम रही है। अपने दम पर वोट मांगने से क्यों कतरा रहे हैं प्रधानमंत्री। लोग कितना भी जागरूक क्यों न समझते हों भारत के मतदाताओं को पर वास्तव में हैं वे भोले-भाले। हकीकत में जागरूक होते तो वोट के दावेदारों को सवालों के कठघरे में खड़ा कर पिछले वादों की याद दिलाते। जो नए वादे किए जा रहे हैं, उनको पूरा करने का अर्थशास्त्र पूछते। पर नेता तो ठहरे जुमलेबाज। देवीलाल की चर्चा प्रासंगिक होगी। एक चुनाव से पहले पत्रकारों ने हरियाणा के इस ताऊ से पूछा था कि चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है पर उनका घोषणा पत्र तैयार नहीं। देवीलाल ने बेलाग जवाब दिया था कि सारी पार्टियों के नए पुराने घोषणा पत्रों को सामने रखेंगे। सारी अच्छी बातें लेकर नया घोषणा पत्र फटाफट हो जाएगा तैयार। वैसे भी चुनाव घोषणा पत्रों को चुनाव बाद पढ़ता कौन है। वे तो पार्टियों के दफ्तरों में धूल ही चाटते हैं। यह हकीकत न होती तो फेंकूराम बनने से कुछ तो डरते नेता।

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