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नगर पालिका चुनाव से जुड़ी गोरखालैंड को लेकर ताजा तकरार

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र को अलग गोरखालैंड राज्य बनवाना है मोर्चे का एकमात्र एजंडा।

Author June 12, 2017 05:09 am
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (फाइल फोटो)

अब तीसरा गुट

सुप्रीम कोर्ट खेलों को राजनीति और राजनीति बाजों से मुक्त करने की मंशा कई बार जता चुका है। क्रिकेट पर नेताओं का कब्जा किसे नहीं अखरता। जिन्होंने कभी न बल्ला उठाया और न गेंद पकड़ी, वे बीसीसीआई को नियंत्रित कर रहे हैं। राजस्थान में फिर सीपी जोशी सूबे की क्रिकेट एसोसियसन के अध्यक्ष बन गए। इससे कांग्रेस के सियासी समीकरणों में भी उलट-पलट होने लगी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं इस समय जोशी। मनमोहन सरकार में मंत्री रह चुके हैं। राजस्थान कांग्रेस में जोशी का भी अपना गुट ठहरा। आखिर राहुल गांधी से नजदीकी है तो दरबार क्यों न सजाएं। पार्टी के सूबेदार सचिन पायलट और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलौत दोनों के खेमों में ही बेचैनी बड़ी है। पिछली दफा जब गहलौत मुख्यमंत्री बने थे तो जोशी विधानसभा चुनाव हार गए थे। नतीजतन स्थानीय राजनीति से दूरी बढ़ गई।

पर अब क्रिकेट संघ के चुनाव में ललित मोदी के बेटे रूचिर मोदी को पटखनी देने से कद कुछ तो बढ़ ही गया है। आखिर सियासी लाभ भले कुछ न मिले पर क्रिकेट में पैसा तो खूब है। संघ का आलीशान दफ्तर कांग्रेसियों का अड्डा तो बनेगा ही। अध्यक्ष पद संभाला तो माहौल से झलक साफ नजर आई। समारोह एक दम कांग्रेसमय हो गया। हवाई अड्डे से आरसीए के दफ्तर तक जोशी अपने लंबे काफिले के साथ पहुंचे। सियासी अंदाज में भाषण हुआ और महाभोज भी। समर्थकों ने फूल मालाओं से लादकर ताकत का प्रदर्शन कर दिखाया। जोशी ने भी इशारों इशारों में ही कुछ बातों से समर्थकों में जोश भर दिया। क्रिकेट और सियासत को एक-दूसरे की पूरक बता दिया। बेचारे जोशी अभी तक परेशान थे कि जयपुर में कोई दमदार ठिकाना ही नहीं था उनका। क्रिकेट संघ के दफ्तर ने उन्हें अवसरों की सौगात तो दे ही दी है। अवसर मिला है तो उनका गुट क्यों न बिछाए अपनी सियासी गोटियां।

पुरानी अदावत

तृणमूल कांग्रेस और गोरखा जन मुक्ति मोर्चा में अनबन पुरानी है। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र को अलग गोरखालैंड राज्य बनवाना है मोर्चे का एकमात्र एजंडा। इसीलिए इलाके में पकड़ भी खूब है इस संगठन की। पर तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ठहरी ममता बनर्जी। पश्चिम बंगाल की जब से मुख्यमंत्री बनी हैं, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राज्य सरकार के साथ फिर टकराव तेज हुआ है मोर्चे का। इस बार मुद्दा है बंगला भाषा। दसवीं कक्षा तक ममता सरकार ने स्कूलों में बंगला को अनिवार्य बनाया है। पर्वतीय इलाके को यह बंदिश स्वीकार नहीं। हालांकि ममता बनर्जी ने नजाकत को भांपते हुए एलान कर दिया है कि पर्वतीय क्षेत्र में बंगला की पढ़ाई एच्छिक होगी, अनिवार्य नहीं। लेकिन मोर्चा तो सरकार से दो-दो हाथ करने के मूड में दिख रहा है। ममता के मिरिक दौरे के वक्त मोर्चे ने दार्जिलिंग में रैली कर ममता वापस जाओ के नारे लगाए।

इतना ही नहीं काले झंडे लेकर रैलियां अलग कर दिखाई। दूसरी और ममता ने भी मोर्चे की तरफ से संचालित जीटीए के खर्चों का विशेष आॅडिट कराने की चेतावनी दे दी। हकीकत तो यह है कि ताजा तकरार की जड़ पिछले महीने हुए नगर पालिका चुनाव से जुड़ी है। मिरिक नगर पालिका पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा पहली बार हुआ है। इससे पहले इलाके की तमाम नगर पालिकाओं पर लंबे अरसे से सुबाष घीसिंग की अगुआई वाले जीएनएलएफ का एकछत्र राज था। पर्वतीय इलाके में भी गोरखा जन मुक्ति मोर्चे की बादशाहत को कोई चुनौती दे तो उसे कैसे सहन कर सकता है मोर्चे का नेतृत्व। वह तो नए सिरे से गोरखालैंड की अपनी पुरानी मांग पर लौटने की रणनीति बनाने में जुट गया है। पाठकों को बता दें कि दार्जिलिंग लोकसभा सीट पर मोर्चा पिछले दो चुनाव से भाजपा का समर्थन कर रहा है। 2009 में जसवंत सिंह को जिताकर भेजा था तो 2014 में एसएस अहलुवालिया को चुना था गोरखा मतदाताओं ने। जाहिर है कि जो भाजपा का साथ दे, वह तो ममता को फूटी आंखों भी नही सुहा सकता।

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