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राजपाट: जारी है घमासान, साख पर सवाल

लखनऊ में समाजवादी पार्टी का स्थापना दिवस समारोह फटे कपड़ों पर पैबंद लगाने की कोशिश भर बन कर रह गया।

Author नई दिल्ली | November 7, 2016 5:42 AM
राम गोपाल यादव, मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव। (फाइल फोटो)

जारी है घमासान

लखनऊ में समाजवादी पार्टी का स्थापना दिवस समारोह फटे कपड़ों पर पैबंद लगाने की कोशिश भर बन कर रह गया। ऊपर से राजद के मुखिया लालू यादव ने दिखा दी अपनी पैंतरेबाजी। चाचा-भतीजे को तलवार थमा दी। एक को देते तो बात जंचती। दोनों को देने का निहितार्थ विरोधी खिल्ली उड़ा कर निकाल रहे हैं। यानी दिखावा तो लालू ने दोनों की कटुता मिटाने की कोशिश का किया, पर थमा दी उनके हाथों में तलवारें। अभी तक निहत्थे लड़ रहे थे। केवल शब्द बाणों का इस्तेमाल करके। अब भांजनी है तो आपस में तलवार भांजो। लालू के आग्रह पर भतीजे ने चाचा के पैर छूने का उपक्रम भी कर दिखाया।

उपक्रम इसलिए कि यह रस्मी दिखा। स्वाभाविकता नहीं थी। दोनों ने एक दूसरे पर जम कर वार किए। शिवपाल यादव ने अखिलेश के एक समर्थक को जिस दबंगई के साथ माइक से धकियाया, उससे सारा शो तमाशा बन कर रह गया। अलबत्ता कुनबे की इस लड़ाई में कई बंदरों की मौज आ गई। जिन्हें मांगने पर भी मुलाकात का वक्त नहीं मिलता था, उन्हें बाकायदा मिन्नत कर बुलाया गया था। अजित सिंह, शरद यादव, एचडी देवगौड़ा और केसी त्यागी जैसे नेता मूंछ पर ताव देते और यादव परिवार को एकता की नसीहत देते नजर आए। भाजपा निशाने पर थी। रहनी थी भी। पर जिस एका का लखनऊ में प्रायोजित प्रदर्शन हुआ, उसके टिकाऊ होने पर किसी को भरोसा नहीं। अलबत्ता सपा, कांग्रेस, जद (एकी) और रालोद के गठबंधन की अटकलें जरूर तेज हुई हैं। मुश्किल सीटों के बंटवारे की है।

क्या मुलायम 403 में से सवा सौ सीटें छोड़ने का साहस दिखा सकते हैं? इसमें दो राय नहीं कि यह गठबंधन मूर्तरूप ले ले तो चुनावी नतीजे निश्चित रूप से भिन्न होंगे। पर अभी कुछ भी कंकरीट नहीं दिख रहा। वैसे भी लालू मजाक में ही सही कांटे की बात कह गए। उन्होंने शिवपाल और अखिलेश की लड़ाई पर चुटकी लेते हुए कहा कि लड़ना तो समाजवादियों की आदत है। कोई और नहीं मिलता तो आपस में ही लड़ने लगते हैं। बहरहाल लखनऊ के इस शो में तीन लोगों की कमी खली। मुलायम के चचेरे भाई और राष्ट्रीय परिदृश्य पर उनके साथ सदैव कंधे से कंधा मिलाते नजर आने वाले राम गोपाल यादव नहीं थे तो मुलायम के बेहद भरोसेमंद और खुद को सियासत का चाणक्य बताने वाले पार्टी महासचिव अमर सिंह। तीसरी शख्सियत जया प्रदा तो खैर अमर सिंह के बिना आ भी नहीं सकती थीं।
साख पर सवाल
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति बेबस हो गई है। हरियाणा के आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जाट आरक्षण का भरोसा दिया था। पर अदालती अड़ंगेबाजी के चलते हरियाणा सरकार ही नहीं केंद्र की मोदी सरकार भी इस मुद्दे पर पंगु नजर आ रही है। लोकसभा चुनाव में जाटों ने मोदी का खुल कर समर्थन किया था। अब आरक्षण के मुद्दे पर इस वर्ग में भाजपा के प्रति नाराजगी बढ़ी है। अमित शाह ने सहारनपुर की परिवर्तन रैली में शनिवार को जाट नेताओं को मंच पर तरजीह तो जरूर दी, पर आरक्षण के मामले में सरकार या पार्टी का कोई भी जिम्मेवार नेता टिप्पणी करने से बच रहे हैं।

बड़ौत में हुई अजित सिंह की सफल रैली से भी शायद सबक नहीं लिया है। इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाकों में भी अजित और उनके पुत्र जयंत चौधरी की सभाओं में खासी भीड़ जुटना जाटों में खलबली का संकेत है। पर भाजपाई लकीर के फकीर ठहरे। वे अभी भी इसी गलतफहमी में हैं कि तीन साल पहले हुए जाट-मुसलमान दंगे की कड़वाहट स्थाई है। यानी जाट और मुसलमान एक पाले में नहीं आएंगे। रही जाट आरक्षण संघर्ष समिति की बात तो सड़क पर संघर्ष की रणनीति छोड़ अब उसने चुनाव में ही सबक सिखाने की धमकी तक सीमित कर लिया है खुद को। जहां तक सरकार का सवाल है वह आरक्षण के पिटारे को छेड़ने से फिलहाल बच रही है। हां, दिल्ली हाईकोर्ट के स्वर्ण जयंती समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यायपालिका में आरक्षण की वकालत कर जजों की नियुक्ति की कालेजियम प्रणाली को परोक्ष रूप से फिर कठघरे में खड़ा कर दिया।

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