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राजपाट- उलटबासी

अजमेर में 2014 के चुनाव में सचिन पायलट और अलवर में भंवर जितेंद्र सिंह हारे थे। 2019 के लिए दोनों पहले से तैयारी में भी जुटे थे कि उपचुनाव की नौबत आ गई।

Author October 2, 2017 6:05 AM
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ट्वीट के जरिये सड़क हादसे में मारे गए आठ लोगो के परिजन के प्रति संवेदना व्यक्त की ।

आमतौर पर चुनाव के दौरान टिकट पाने के लिए खासी दौड़ लगाते हैं उम्मीदवार। भले किसी भी दल का मामला क्यों न हो? राजस्थान की बात तो और भी अलग है। यहां तो दो ही पार्टियों का बोलबाला होने से दोनों के दावेदारों की कतार होती है। पर लोकसभा की दो और विधानसभा की एक सीट के लिए होने वाले उपचुनाव ने तमाम दावेदारों को जैसे सांप सुंघा दिया है। दोनों ही दलों में कोई भी कद्दावर नेता टिकट के लिए हुंकार नहीं भर रहा। विधानसभा के आम चुनाव में अब वैसे भी समय ही कितना बचा है। एक साल बाद तो आम चुनाव ही हो जाएगा। ऐसे में हार का जोखिम कोई क्यों उठाए? लोकसभा की उपचुनाव वाली सीटों में अजमेर और अलवर हैं। भाजपा से ज्यादा बेचैनी कांग्रेस के भीतर दिख रही है। अजमेर में 2014 के चुनाव में सचिन पायलट और अलवर में भंवर जितेंद्र सिंह हारे थे। 2019 के लिए दोनों पहले से तैयारी में भी जुटे थे कि उपचुनाव की नौबत आ गई।

अब दोनों ही कन्नी काट रहे हैं। जबकि कांग्रेस के भीतर इनका विरोधी खेमा चटखारे ले रहा है कि हारे तो अंधेरे में होगा सियासी भविष्य। करीबियों से सचिन और जितेंद्र दोनों ही कह चुके हैं कि वे विधानसभा चुनाव की तैयारियों में उलझे हैं। सो, लोकसभा उपचुनाव नहीं लड़ पाएंगे। दूरी उपचुनाव से भाजपा के धुरंधर भी बना रहे हैं। अजमेर में सांवरलाल जाट के किसी परिजन को ही उतारने का सुझाव दिया जा रहा है तो चांदनाथ का कोई परिजन न होने से अलवर के लिए यह फार्मूला भी लागू नहीं हो सकता। सो, एक पार्टी आइएएस ओपी यादव को कर रही है उतारने की तैयारी। उन्हें सियासत का ग्लैमर दिखा समय से पहले नौकरी छोड़ने की सलाह दी जा रही है। वसुंधरा राजे ने यादव को आबकारी आयुक्त जैसा मलाईदार ओहदा दे रखा है। नौकरी अब बची भी कितनी है। केवल छह महीने की। वैसे भी राजस्थान के भाजपा सांसदों में चार तो नौकरशाही से आए हैं। यादव को उतारने से फंड के बंदोबस्त के झंझट से भी बच जाएगी पार्टी। उन्हें तो सभी राजस्थान की नौकरशाही का कुबेर समझते हैं।.

खुशफहमी

रमेश पोखरियाल निशंक को नरेंद्र मोदी ने निराश ही रखा है। मंत्रिमंडल के पिछले विस्तार में भी मौका नहीं मिला निशंक को शपथ लेने का। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री को अब अमित शाह का बुलावा मिलने से राहत महसूस हुई होगी। शाह ने अपने राज्य गुजरात में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बुलाया है। सौराष्ट्र का चुनाव प्रभारी बना कर। पहले यह काम निर्मला सीतारमण के जिम्मे था। लेकिन वाणिज्य से रक्षा महकमा मिला तो निर्मला के लिए वक्त निकालना मुश्किल था। लिहाजा अमित शाह ने निशंक को बना दिया प्रभारी।

बेचारे इसी में फूल कर कुप्पा हुए जा रहे हैं कि जो जिम्मा उन्हें मिला है, वह अहम है। तभी तो निर्मला सीतारमण संभाल रही थीं। पर भूल गए कि उत्तराखंड की सियासत में उनके धुर विरोधी माने जाने वाले राज्य के मंत्री मदन कौशिक भी बनाए गए हैं गुजरात के ही राजकोट इलाके के चुनाव प्रभारी। साफ है कि अब उत्तराखंड की भाजपाई गुटबाजी का नया मैदान गुजरात बनेगा। यह बात अलग है कि गुजरात के बारे में न निशंक को ज्यादा पता है और न ही कौशिक की कोई पैठ है वहां।

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