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राजपाट: गहमा-गहमी, खाओ-पिओ

नशे के कारोबार का मुद्दा तो अभी गरम था ही कि अब पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए सतलुज यमुना संपर्क (एसवाइएल) नहर का मुद्दा और अहम हो सकता है।

SYL Row news, SYL latest news, SYL Supreme Court, SYL Court verdict, Punjab vs haryana, SYL Punjab News, SYL haryana News, Punjab haryana Border, INLD Warning SYLसरयू-यमुना संपर्क (एसवाइएल) ।

गहमा-गहमी

नशे के कारोबार का मुद्दा तो अभी गरम था ही कि अब पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए सतलुज यमुना संपर्क (एसवाइएल) नहर का मुद्दा और अहम हो सकता है। पंजाब सरकार के बनाए कानून को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक बता दिया है। इससे विपक्षी कांग्रेस के तमाम विधायक इस्तीफा देकर लोगों की वाहवाही लूटने का दांव चल चुके हैं। सत्तारूढ़ अकाली दल तो इससे बैकफुट पर आया ही है। सूबे की अकाली सरकार में हरियाणा के हक में आए फैसले के मद्देनजर 16 नवंबर को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया है। जल बंटवारे के तमाम समझौतों को रद्द करने वाला विधेयक लाने का विकल्प सोचा है प्रकाश सिंह बादल ने। पानी के बंटवारे की लड़ाई को संसद तक ले जाना चाहता है अकाली दल। इतना ही नहीं विधानसभा के आगामी सत्र में पार्टी की तरफ से स्थगन प्रस्ताव लाने का एलान भी हुआ है।

चर्चा इस बात पर करने की मांग उठेगी कि न्यायपालिका संविधान से भी ऊपर कैसे हो सकती है? फिलहाल एसवाईएल का मुद्दा उभरना अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है। स्थानीय नेतृत्व की तुलना में जब इस मुद्दे पर मतदान का सवाल सामने होगा तो सूबे के मतदाता दिल्ली से संचालित होने का आरोप झेल रही पार्टी को तरजीह क्यों देंगे। सूबे में वैसे भी पार्टी के पास कोई धारदार नेता है भी नहीं। कांग्रेस ने इस्तीफे का दांव चल कर विरोधियों को धोबीपाट लगा ही दिया है। पार्टी के सूबेदार अमरिंदर सिंह ने बादल पर सूबे के हितों की रक्षा में नाकाम रहने का आरोप जड़ दिया है। नवजोत सिंह सिद्धू भी अब आम आदमी पार्टी में शामिल होने से पहले सौ बार सोचेंगे। कांग्रेस के 42 विधायकों ने ही नहीं लोकसभा से सूबेदार अमरिंदर ने भी इस्तीफा भेज दिया है। हो सकता है कि उपचुनाव में अमृतसर की इसी सीट पर कांग्रेस के उम्मंीदवार बन जाएं सिद्धू।
खाओ-पिओ

डिनर डिप्लोमेसी से तो कई नेताओं के पेट में दर्द शुरू हो गया। राजस्थान के कांग्रेसी नेताओं की एकजुटता के लिए आलाकमान की हिदायत पर शुरू हुई है यह कवायद। आलाकमान को इस सूबे में संभावनाएं दिखती हैं। भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल का फायदा मिल सकता है कांग्रेस को। पर रोड़ा तो पार्टी के नेताओं की आपसी गुटबाजी अटका रही है। वैसे भी विधानसभा चुनाव में अभी दो साल का वक्त है। सो आलाकमान ने तमाम क्षत्रपों को एक मेज पर बैठाने की रणनीति का उपाय बताया है डिनर डिप्लोमेसी। पहला डिनर अशोक गहलोत ने दिया तो उसके बाद बारी सचिन पायलट की थी। डिनर की यह शृंखला अभी बदस्तूर चलेगी। एक दूसरे के घर बैठ कर पार्टी की सत्ता में वापसी की कसरत करेंगे एक दूसरे की टांग खींचने वाले कांग्रेसी। तभी तो भाजपा नेताओं ने खिल्ली उड़ा दी। इससे सचिन पायलट का तमतमाना स्वाभाविक था।

सवाल दाग दिया कि अगर वे डिनर कर रहे हैं तो भाजपा नेताओं के पेट में दर्द क्यों उठ रहा है। भाजपा तो विरोधी ठहरी पर यहां तो बड़े नेताओं को गुफ्तगू करते देख छोटे कांग्रेसी भी परेशान हो रहे हैं। उन्हें ऐसे मौकों पर तवज्जो जो नहीं मिल रही। उनकी पीड़ा दूसरी है। तीस साल तक मौज करते रहे जिन नेताओं की करतूतों से पार्टी सत्ता से बेदखल हुई, वे ही अगले चुनाव की रणनीति बनाएंगे तो नया नेतृत्व कैसे उभर पाएगा। पार्टी के लिए दमखम तो ये लोग ही लगा रहे हैं। कई तो राहुल गांधी से अपने जुड़ाव का दम भी भरते हैं। उनकी शिकायत है कि जिनकी जमीन पहले ही खिसक चुकी है उन्हें तवज्जो देने से भला नहीं होने वाला पार्टी का। पर सचिन पायलट ने पंख फैलाए थे तो खांटी बुजुर्ग नेता अवरोध बन गए। गुटबाजी की हवा बना दी। प्रभारी गुरुदास कामथ को डिनर डिप्लोमेसी की सलाह देनी पड़ गई। बेशक सचिन पायलट भोज के बजाए खोज की राजनीति के हिमायती माने जाते हैं। तभी तो खोज-खोज कर नए नेताओं को ले लिया अपनी टीम में।

SYL पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध; 42 कांग्रेस विधायकों ने पंजाब विधानसभा में सौंपा अपना इस्तीफा

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