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राजपाट- मौकापरस्ती बेमिसाल

नीतीश कुमार ने आखिर साबित कर ही दिखाया कि राजनीति में मित्र भी शत्रु हो जाता है और शत्रु भी मित्र बन जाता है।

Author July 31, 2017 3:58 AM
नीतीश कुमार और पीएम नरेंद्र मोदी (Source: Twitter/PMO)

 

नीतीश कुमार ने आखिर साबित कर ही दिखाया कि राजनीति में मित्र भी शत्रु हो जाता है और शत्रु भी मित्र बन जाता है। हां, कब कौन मित्र होगा और कौन शत्रु, यह भी निश्चित नहीं रहता। इसके पीछे सत्ता ही है। आखिर सियासत की मंजिल तो सत्ता ही है। छोटे भाई ने बड़े भाई को पटखनी दे दी। बड़े भाई को दरकिनार भी कर दिया और अपनी कुर्सी भी बचा ली। छठी बार मुख्यमंत्री बने नीतीश की पुरानी स्थिति लौट आई है। पहले वे भाजपा के साथ सत्ता में थे और मजे में भी थे। लेकिन बीच में तनातनी हो गई तो भाजपा से किनारा कर लिया था। भाजपा को भी मजबूरी में अलग-थलग हो जाना पड़ा। नीतीश को तो नुकसान नहीं हुआ, अलबत्ता भाजपा को नुकसान जरूर हो गया। नीतीश सत्ता में बने रह गए और भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। लेकिन अचानक नीतीश खुद ही भाजपा के साथ हो गए। वे बेरोकटोक सत्ता में ही हैं, फर्क सिर्फ यह है कि उनके साथ अब राजद के बजाय भाजपा सत्ता में आ गई। हां, भाजपा का साथ छोड़ने के बाद सत्ता में तो नीतीश जरूर थे लेकिन थे लालू के दबाव में। हाल तो यह था कि वे अपनी तकलीफ को भी जुबान पर नहीं ला सकते थे। यह सब छिपा हुआ नहीं था। नीतीश भले ही नीति और सिद्धांत व नैतिकता की बात करें। पर हकीकत में तो वह रास्ता ही ढूंढ़ रहे थे कि कैसे सत्ता में भी बने रहें और जिनके साथ हैं, उनसे भी मुक्ति मिल जाए। नीतीश सयाने ठहरे। बोलते कम हैं।

करते वही हैं, जो उन्हें भाता है। कभी भाजपा को उसकी औकात बताई थी। अब राजद को बता दी। भले वे शांति से सत्ता में नहीं रह सकते। बिहार का हित करने का श्रेय उन्हें मिलता रहा है। कई ऐसे काम भी किए हैं, जो कहीं और नहीं हुए। भाजपा के साथ सत्ता में थे तो उन्हें इन कामों का श्रेय मिला था। अब उनके लिए काम करना आसान नहीं होगा। जब वे भाजपा के साथ सत्ता में थे तो राजद ताकतवर नहीं थी, जैसा कि मौजूदा समय में है। राजद चुप नहीं बैठेगी। अड़चन पर अड़चन डालेगी ही। इतना जरूर है कि नीतीश की सत्ता बरकरार है। उनकी सहयोगी भाजपा की केंद्र में सरकार है। उसका फायदा मिलेगा ही। अड़चन होने पर भी केंद्र के सहयोग से कुछ नया कर पाएंगे। कुछ नया करने में उनका सानी नहीं। दूर की सोचते हैं। एक साल बाद ही लोकसभा चुनाव है। उसमें अपनी पार्टी को पहले जैसी यानी 2009 वाली कामयाबी दिला पाए तो फिर क्या कहना। आगे के लिए भी गद्दी सुरक्षित हो जाएगी।

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