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राजपाट- बेचारे नीकु

आखिर नीतीश की वजह से भाजपा को मुफ्त में ही बिहार की सत्ता में हिस्सेदारी मिल गई। सो, भाजपा का फर्ज भी बनता है कि वह नीतीश की मददगार हो। पर थोड़े दिन में ही स्थिति असहज दिखने लगी है।

Author October 23, 2017 4:48 AM
छठवीं बार बिहार के सीएम बने नीतीश कुमार। फोटो- पीटीआई

सिर मुंडाते ओले

एक तो नियुक्ति में सवा साल का वक्त लग गया। ऊपर से शुरुआत ही विवादों में घिरने से हो गई इस नियुक्ति की। मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान सरकार ने हाई कोर्ट के रिटायर जज नरेश गुप्ता को आनन-फानन में लोकायुक्त बना दिया। 18 अक्तूबर को हाथोंहाथ राजभवन में शपथ भी दिला दी उन्हें। हर कोई यह जानकर हैरान रह गया कि उप-लोकायुक्त यूसी माहेश्वरी से छह साल जूनियर हैं गुप्ता। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की सहमति भी थी इस नियुक्ति में। नुक्ताचीनी हुई तो सूबे के मंत्री नरोत्तम मिश्र ने चयन में कानूनी प्रक्रिया के पालन की दुहाई दी। उधर उप-लोकायुक्त माहेश्वरी की प्रतिक्रिया मर्यादा के दायरे में ही आई। हां, नए लोकायुक्त नरेश गुप्ता ने जरूर नुक्ताचीनी से आहत होने की बात कही। अजय सिंह की सहमति ने कांग्रेस को ही दोफाड़ कर दिया।

राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने अजय सिंह से ट्विट कर पूछ लिया कि उप-लोकायुक्त से जूनियर को लोकायुक्त बनाने के प्रस्ताव पर उन्होंने सहमति क्यों दी? अजय सिंह ने जवाब दे दिया कि एक ही नाम सामने आया था सो कबूल कर लिया। साथ ही अपनी अज्ञानता को भी स्वीकार कर लिया कि हाई कोर्ट के रिटायर जजों की ग्रेडेशन लिस्ट उनके पास नहीं थी। यह देखने का जिम्मा तो सूबे की सरकार और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का था। कांग्रेस के विधायक बाल बच्चन ने एक और बम फोड़ दिया। उन्होंने खुलासा किया कि शिवराज सरकार तो नरेश गुप्ता को पहले भी चाहती थी लोकायुक्त बनाना। लेकिन कार्यवाहक नेता प्रतिपक्ष की हैसियत से उन्होंने अपनी सहमति नहीं दी थी। अजय सिंह की आलोचना करने वालों में पूर्व लोकायुक्त फैजानुद्दीन भी हैं। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि अजय सिंह जैसे लापरवाह को नेता प्रतिपक्ष होना ही नहीं चाहिए। सरकार ने बेशक कानूनी प्रक्रिया का पालन किया पर नैतिकता को तो धता बता दिया।

बेचारे नीकु
नीतीश की हालत सांप-छछूंदर सरीखी नजर आ रही है। न उगलते बन रहा है और न निगलते। शुरू में ऐसे दिखा रहे थे मानो भाजपा और नरेंद्र मोदी से खूब छनेगी। जद (एकी) का पूरा ख्याल रखा जाएगा। खुद नीतीश की मांगों पर भी गौर करेंगे प्रधानमंत्री और उन्हें मंजूर करने में भी कोताही नहीं बरतेंगे जिससे बिहार का चौतरफा विकास होगा। भाजपा और प्रधानमंत्री दोनों की तरफ से शुरू में तो दिखावा भी इसी तरह का हुआ था। आखिर नीतीश की वजह से भाजपा को मुफ्त में ही बिहार की सत्ता में हिस्सेदारी मिल गई। सो, भाजपा का फर्ज भी बनता है कि वह नीतीश की मददगार हो। पर थोड़े दिन में ही स्थिति असहज दिखने लगी है।

नीतीश की मांगों पर केंद्र का टालू नजरिया सामने आ रहा है। प्रधानमंत्री उन्हें कोई तवज्जो दे ही नहीं रहे। अब तो पटना के सियासी गलियारों में भाई लोग यहां तक कहने लगे हैं कि नरेंद्र मोदी और भाजपा मिलकर नीतीश का फायदा उठा रहे हैं। नीतीश उनसे कोई फायदा नहीं ले पा रहे। ऐसे बुरे फंस गए कि चाह कर भी कड़ा रुख नहीं दिखा पाएंगे। उनके दबाव में तो हैं नहीं भाजपा वाले। अगर अनबन होगी तो घाटे में नीतीश ही रहेंगे। कहने को तो नीतीश हजार बार दोहरा चुके हैं कि उन्हें कुर्सी का कोई लालच नहीं है। उनकी जवाबदेही तो जनता के प्रति है। लेकिन भाजपा से हुई नई दोस्ती के बाद एक बार भी यह भाषा नहीं बोल पाए बेचारे।

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