राजपाट- वर्चस्व की जंग

राजद के मंत्रियों और नेताओं को पटखनी लगने की दुहाई देने वालों की भी कमी नहीं। पर नीतीश सच से अनजान नहीं हैं। वे जानते हैं कि तारीफ के पुल बांधने वालों में ज्यादातर चापलूस ठहरे जिनका अपना कोई जनाधार नहीं।

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वर्चस्व की जंग
अमित शाह के दौरे में अभी कुछ दिन बाकी हैं। लेकिन मध्य प्रदेश भाजपा पर इस दौरे का खौफ पहले से ही नजर आ रहा है। पार्टी के खाली पदों को आनन-फानन में भरने से खौफ की बात में दम लगता है। सरकार के स्तर पर भी पहले से चल रही योजनाओं और भविष्य की योजनाओं का खाका खींचना इसी अफरा-तफरी की तरफ संकेत कर रहा है। भोपाल के हर वार्ड में अमित शाह के स्वागत के लिए द्वार बनाए जा रहे हैं। यानी कुल 85 वार्ड हैं तो इतने ही द्वार बनेंगे। अरविंद मेनन अमित शाह के दूत की हैसियत से तैयारियों का जायजा भी ले रहे हैं और बैठक भी कर रहे हैं। यों अध्यक्ष आएंगे तो 18 अगस्त को पर सभी सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों को हिदायत मिल चुकी है कि एक दिन पहले ही भोपाल पहुंच कर हाजिरी लगाएं। पार्टी विधायकों के साथ तैयारी तीन निर्दलीयों में से दो सुदेश राय और कल सिंह भाबर को भी बैठाने की है। वैसे खौफ के बावजूद सब कुछ सामान्य नहीं है। मसलन, गुरुवार को अरविंद मेनन की सूबेदार नंदकुमार सिंह चौहान के साथ बहस हुई मीडिया के चक्कर में, जो मेनन से बातचीत के लिए आतुर था पर चौहान ने कह दिया कि बात वे खुद करेंगे।

मेनन राष्ट्रीय पदाधिकारी ठहरे। मतभेद की खबर फैली तो दोनों ही लगे सफाई देने। हालांकि मेनन इसके बाद भोपाल में रुके नहीं। भुवनेश्वर में जरूरी बैठक होने का बहाना बना वे एक दिन के बाद ही भोपाल से दिल्ली लौट गए। शुक्रवार और शनिवार के उनके पहले से तय कार्यक्रम टल गए। मेनन पूर्व में मध्य प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री रह चुके हैं। उधर नंद कुमार सिंह चौहान ने सहकारिता प्रकोष्ठ की कार्य समिति की बैठक में सरकारी भ्रष्टाचार पर ही भड़ास निकाली। दीनदयाल अंत्योदय अवधारणा के नाकाम होने पर चिंता जताई। सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग की मौजूदगी में ही सहकारी बैंकों के भ्रष्टाचार का चिट्ठा खोला। गरीबों के अनाज में भी घोटाला होने का खुलासा करने से वे नहीं चूके। ऊपर से अपनी पीड़ा अलग जता दी कि घोटाला करने वाले उन्हीं की पार्टी के हैं और ऐसे लोगों का अध्यक्ष होने पर वे शर्मिंदा हैं। फिर चेतावनी भरे लहजे में फरमाया कि या तो ऐसे लोग सुधर जाएं अन्यथा अंजाम बुरा होगा। दरअसल मध्य प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में सहकारी बैंक के कई घोटाले सामने आ चुके हैं।

छवि की फिक्र

नीतीश कुमार इन दिनों कुछ ज्यादा ही व्यस्त नजर आ रहे हैं। जाहिर है कि इर्द-गिर्द जिनका घेरा है, वे सब तो तारीफ के ही पुल बांधेंगे। कोई कह रहा है कि क्या धोबीपाट मारा है तो कोई अच्छे दिन आने की दुहाई दे रहा है। राजद के मंत्रियों और नेताओं को पटखनी लगने की दुहाई देने वालों की भी कमी नहीं। पर नीतीश सच से अनजान नहीं हैं। वे जानते हैं कि तारीफ के पुल बांधने वालों में ज्यादातर चापलूस ठहरे जिनका अपना कोई जनाधार नहीं। उन्हें अहसास है कि उनकी छवि पर बट्टा लग गया है। इसलिए छवि को निखारने के लिए कोई न कोई उपाय करना ही पड़ेगा। उन्हें याद है कि एक दौर में उनका उपनाम सुशासन बाबू पड़ गया था। लेकिन पिछले दो-तीन सालों में किसी ने नहीं याद रखा यह उपनाम। लिहाजा वे खुद को फिर सुशासन बाबू के रूप में लोगों की जुबान पर चढ़ते देखना चाहते हैं। सरकारी विभागों के कामकाज की लगातार समीक्षा के पीछे यही मकसद लगता है। अफसरों से घंटों चर्चा कर रहे हैं। तमाम जरूरी निर्देश भी दे रहे हैं कि योजनाओं को अमलीजामा कैसे पहनाना है।

लोगों को गवर्नेंस का अहसास दिलाना है। कल तक जो विभाग राजद के मंत्रियों के पास थे, फिलहाल उन पर ज्यादा फोकस है। कहीं कोई घपला तो नहीं हुआ। कहां कमी रह गई। अपनी जानकारी में रहेगा तो सही अवसर पर उसका खुलासा भी कर पाएंगे। अब उनके डिप्टी के नाते पुराने साथी सुशील मोदी हैं। लिहाजा फिर सुशासन बाबू वाली हैसियत लौट सकती है। मोदी वैसे भी उनसे लगातार चिपके रहते हैं। आजकल नीतीश की प्रशंसा कुछ ज्यादा ही कर रहे हैं। रही नीतीश की बात तो नया जुमला खोजा है कि बीच में उनके सामने कुछ बाधाएं थीं जो अब दूर हो गई हैं। उन्हें भरोसा है कि वे अपने काम के बल पर अपनी छवि को फिर चमका लेंगे। काम कर रहे हैं तो वह लोगों को नजर भी आएगा ही।

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