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राजपाट- बेतुका वर्गीकरण, खरगोश-कछुआ दौड़

खुद को अल्पसंख्यक के रूप में पहचान मिलना जैन को अखरता है।

Author Updated: April 17, 2017 4:31 AM
नमाज अदा करते मुस्लिम समुदाय के लोग। ( Photo Source: Indian Express/ Archives)

बेतुका वर्गीकरण
अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक का विवाद भी पुराना है। कौन अल्पसंख्यक है और कौन बहुसंख्यक, कसौटी इसे तय करने की भिन्न हो सकती हैं। मसलन, एक कसौटी भाषा भी है। पर अपने देश में कसौटी सिर्फ धार्मिक ही लागू है इस मामले में। धर्म के आधार पर ही कई समुदाय बना दिए गए हैं अल्पसंख्यक। हालांकि शुरू में मुसलमान, ईसाई, बौद्ध और पारसी ही थे इस श्रेणी में। बाद में अल्पसंख्यक दर्जा पाकर जैन और सिख भी इठलाने लगे जबकि दोनों मूलत: तो बहुसंख्यक हिंदू ही रहे हैं। मध्य प्रदेश के भाजपा सांसद मेघराज जैन ने फिर किया है, इस पर एतराज। राज्यसभा के संजीदा सदस्यों में होती है जैन की गिनती। इसी हफ्ते रतलाम में पत्रकारों के सामने अपनी व्यथा-कथा कह दी। आरोप लगाया कि कांग्रेस ने जैन समाज को अल्पसंख्यक घोषित कर हिंसक लोगों की कतार में खड़ा कर दिया जबकि वे कट्टर अहिंसावादी ठहरे। जैन का संकेत मांसाहार करने वाले मुसलमानों की तरफ था। खुद को अल्पसंख्यक के रूप में पहचान मिलना जैन को अखरता है। इसी तरह सिखों की गणना भी बहुसंख्यक हिंदुओं के रूप में ही होती रही है। जगजाहिर है कि गुरुगोविंद सिंह ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए ही खालसा पंथ की नींव डाली थी। पंज प्यारे के संदर्भ में उन्होंने कहा था कि सवा लाख से एक लड़ाऊं। गुरुद्वारों में गैरसिख भी उसी शिद्दत से मत्था टेकते हैं जिस शिद्दत से केशधारी सिख।
खरगोश-कछुआ दौड़
विचित्र संयोग है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों राज्यों के ही मुख्यमंत्री पर्वतीय मूल के हैं। दोनों ही उत्तराखंड के गढ़वाली राजपूत ठहरे। पर आदित्यनाथ योगी और त्रिवेंद्र सिंह रावत की कार्यशैली में फर्क जमीन आसमान का है। रावत कभी आरएसएस के प्रचारक थे। वहीं से भाजपा के संगठन मंत्री बने। हालांकि योगी गोरखपुर के गोरखनाथ धाम के महंत अवैद्यनाथ के चेले बन उत्तराखंड से यहां पहुंचे थे। अवैद्यनाथ लोकसभा में हिंदू महासभा के उम्मीदवार के नाते जाने जाते थे। पर आदित्यनाथ 1996 से लगातार भाजपा के टिकट पर ही पांचों लोकसभा चुनाव जीते। हम तुलना योगी और त्रिवेंद्र की कर रहे थे। छवि के मामले में त्रिवेंद्र रावत भी कतई उन्नीस नहीं हैं योगी के मुकाबले। अनुभव भी सरकार का उनसे ज्यादा ही है। खंड़ूड़ी की सरकार में वे कृषि मंत्री थे जबकि योगी को सरकार का कोई अनुभव नहीं रहा। योगी जहां मीडिया की सुर्खियों में बने हैं वहीं रावत न केवल सौम्य और सरल स्वभाव के हैं, मीडिया की सुर्खियों में आने की ललक कभी नहीं रही। इस नाते जो लोग केवल मीडिया की खबरों के आधार पर दोनों का मूल्यांकन कर खरगोश और कछुए की संज्ञा दे रहे हैं, वे गलती कर रहे हैं। जो शुरू में तेज दौड़ते हैं, वे लगातार गतिमान नहीं रह पाते। निश्चित गति से चलने वाला नियमित रह सकता है। हां, उत्तराखंड के मीडिया को जरूर त्रिवेंद्र रावत के कारण चटपटी और ब्रेकिंग खबरों से वंचित रहना पड़ रहा है।

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