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राजपाट- अंदाजे लालू

सत्ता मिले या न मिले, लालू को फिक्र नहीं। जो विकास पुरुष और सुशासन बाबू जैसे तमगों से नवाजे जा रहे थे, वे अब लालू की नजर में कुर्सी बाबू बन गए हैं।
Author November 20, 2017 05:50 am
पटना में आरजेडी विधायकों की बैठक में मौजूद आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, और उनके दोनों बेटे तेज प्रताप यादव, तेजस्वी यादव फोटो-PTI

चतुर सुजान
नीतीश कुमार सियासत की नब्ज पहचानते हैं। तभी तो हर बार सोच समझकर कोई न कोई ऐसा मुद्दा उठा देते हैं कि विवाद छिड़ जाता है। उसका श्रेय तो उन्हें ही हासिल होगा ही। लगातार एक ही रट लगा रहे हैं आजकल कि पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक के सभी चुनाव देश भर में एक साथ कराए जाएं। इसके लिए संविधान में संशोधन जरूरी हो तो कर लिया जाए। पंचायत के न भी हों तो लोकसभा और विधानसभा के जरूर एक साथ हों। वैसे एक साथ चुनाव की बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उठाई थी। वे चाहते थे कि इस मुद्दे पर व्यापक बहस हो। उसके बाद बात आई गई हो गई। भाजपा के ज्यादातर मुख्यमंत्री और दूसरे नेता इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे। वैसे भी जब एक बात प्रधानमंत्री ने खुद कह दी तो फिर उनके कहने की जरूरत भी क्या बची। पर नीतीश तो भाजपा के मुख्यमंत्री हैं नहीं। हां, वे किसी भाजपाई मुख्यमंत्री से कम भी नहीं। आजकल राग मोदी कुछ ज्यादा ही अलाप रहे हैं। गुजरात चुनाव में नरेंद्र मोदी के कामयाब होने की भविष्यवाणी पहले ही कर डाली।

इतने आत्मविश्वास के साथ तो किसी भाजपाई मुख्यमंत्री ने भी भविष्यवाणी नहीं की। भाजपाई करते भी तो इतना महत्व नहीं होता जितना गैर भाजपाई मुख्यमंत्री के कहने का होता है। नीतीश ने मोदी की बात को लपक लिया। उनकी योग्यता और क्षमता पर तो खुद नरेंद्र मोदी ने भी कभी संदेह नहीं किया। तभी तो छत्तीस का रिश्ता तिरसठ के रिश्ते में बदल पाया। एक साथ चुनाव का मतलब इस बात की गारंटी माना जा रहा है कि पांच साल तक सब कुछ ठीक ठाक चलेगा। मुख्यमंत्री भला क्यों चाहेंगे कि पांच साल की उनकी सत्ता पहले ही छिन जाए। ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब नीतीश ने सुझाव दिया था कि राज्यसभा को खत्म कर देना चाहिए। हालांकि जैसे ही सवाल विधान परिषद को भी खत्म करने का उठा तो वे दाएं बाएं झांकते नजर आए। आखिर खुद भी तो विधानसभा के बजाए विधान परिषद के सदस्य बने हैं। उसी के चलते मुख्यमंत्री का पद पाया है। हुई न सयानेपन की बात।

 

अंदाजे लालू
पटना से कभी रांची तो कभी रांची से पटना, चक्कर काट रहे हैं कब से लालू यादव। राजद के मुखिया के हौसले की दाद देनी पड़ेगी। केंद्र सरकार की एजंसियों की चौतरफा घेरेबंदी के बाद भी निराश नहीं लगते। संकट अकेले लालू पर ही नहीं है, उनके पूरे कुनबे पर है। लेकिन लालू ने अपने तेवर बरकरार रखे हैं। वैसे उनके बचाव का रास्ता भी और कोई नजर नहीं आता। भाजपा विरोध को मुखर बनाए रखकर ही वे खुद का बचा सकते हैं। हर बिहारी के मन में यह बात घर कर चुकी है कि लालू में भले लाख बुराईयां हों, पर वे धोखेबाज नहीं हैं। भाजपा के विरोधी थे, विरोधी हैं और आगे भी बने रहने का दावा डंके की चोट पर कर रहे हैं। सत्ता मिले या न मिले, लालू को फिक्र नहीं। जो विकास पुरुष और सुशासन बाबू जैसे तमगों से नवाजे जा रहे थे, वे अब लालू की नजर में कुर्सी बाबू बन गए हैं।

जनता दरबार अब नहीं लगाते। उसकी जगह संवाद करते हैं। पटना के फ्रेजर रोड से काफिला गुजरता है तो लगता है कि कोई राजा जा रहा है। लालू इसका भी फायदा उठा रहे हैं। उनकी पार्टी के तमाम नेता और कार्यकर्ता उनके साथ एकजुट हैं। अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को पार्टी की तरफ से बतौर भावी मुख्यमंत्री पेश किया तो पार्टी में विरोध के बजाए स्वागत ही हुआ। लालू की यह खासियत ही मानी जाएगी कि पूरी पार्टी को उन्होंने परिवार बना डाला है। एक भी यादव या मुसलमान नेता राजद छोड़कर जद (एकी) या भाजपा के दरवाजे पर नहीं गया। शायद यही राज है लालू की मुस्कराहट का। अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को कई बार झुंझलाहट में हड़का भी देते हैं। लेकिन अगले ही पल बुलाकर पुचकारने लगते हैं। आत्मीयता दिखाते हुए पुचकारते हैं कि नाराज हो गए क्या। तुम तो अपना भाई हो न। देखते नहीं कि कितना झंझट है। इस तरह इज्जत भी देते हैं और दुख सुख बांटने से भी गुरेज नहीं करते।
घर का भेदी

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